क्या हमारे धर्मग्रंथ जाति-प्रथा का समर्थन करते हैं?

Acharya Prashant

12 min
295 reads
क्या हमारे धर्मग्रंथ जाति-प्रथा का समर्थन करते हैं?
धर्मग्रंथों को जाति-व्यवस्था के चश्मे से देखने के बजाय उनके मूल संदेश को समझना आवश्यक है। श्रुति का केंद्र जाति, लिंग या सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि अहंकार और उससे मुक्ति है। पारंपरिक व्याख्या से अलग समझ को पुनर्व्याख्या मानकर खारिज करना उचित नहीं। वास्तविक अध्यात्म बाहरी पहचान नहीं, अपनी नीयत, भ्रम और कपट को ईमानदारी से देखने तथा आत्मबोध की ओर बढ़ने का आग्रह करता है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा अगला सवाल ये है कि हमारे धर्म ग्रंथों में, जैसे ऋग्वेद, पुराण, स्मृति, उपनिषदों में जाति-प्रथा का क्लियर मेंशन है और चारों शंकराचार्य आज भी इसे मानते हैं। और आप कहते हैं कि ये सनातन धारा की एक अशुद्धि है। तो मुझे तो जितना अभी तक समझा, यह लगता है कि ये हमारी सनातन धारा का एक अभिन्न अंग है। और अगर ये अभिन्न अंग हमारे ग्रंथों से आ रहा है, तो हम उनको परम ज्ञान का स्रोत…

आचार्य प्रशांत: ये सब कहाँ से ले आ रहे हो आप?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, काफ़ी टाइम से चल रहे थे मन में।

आचार्य प्रशांत: ग्रंथ माने क्या होता है, बेटा? ग्रंथ क्या होता है? एक सौ एक बार हम श्रुति और स्मृति का भेद; कभी नहीं करी चर्चा? तो ये ग्रंथ बोल के आपने दोनों को एक में ही लपेट लिया। उपनिषद् और मनुस्मृति एक हो गए। ये क्या कर रहे हो? क्या बोल रहे हो कि हमारे ग्रंथों में तो जाति का उल्लेख बार-बार आता है। ग्रंथ माने क्या होता है?

स्मृति तो आप भी लिख सकती हैं, पर वास्तविक ग्रंथ तो श्रुति होता है, भाई। सचमुच स्मृति के लिखने पर कोई पूर्ण वर्जना नहीं लगा दी गई है। वो तो होती ही है मानव-कृत और लगातार लिखी जाती रही है, तो आप भी लिखो। कुछ स्मृतियाँ बहुत पुरानी हैं। आप मनुस्मृति ले लोगे, वो बहुत पुरानी है। और रामचरितमानस भी स्मृति में ही आती है, वो बहुत ताज़ी है। अभी कुछ सौ साल पहले की है बस। तो स्मृतियों पर तो कोई प्रतिबंध नहीं लग गया है, स्मृतियाँ तो आज भी लिखी जा सकती हैं।

ग्रंथ माने क्या होता है? ग्रंथ माने श्रुति होता है, बाबा। और श्रुति तुमसे कब कह रही है कि जाति जैसी कोई चीज़ होती है? श्रुति को लेना-देना क्या है तुम्हारी जाति से और लिंग से और क़द से और वर्ण से और वज़न से? श्रुति को इनसे क्या लेना? श्रुति का कुल संबंध किससे है? अरे, मुझे क्या समझाना पड़ रहा है ऋषिकेश में आकर के? श्रुति का कुल संबंध किससे है? अहंकार से।

जाति! ऋषियों के पास जाओगे और कहोगे कि वो, मैं फलाने लिंग की स्त्री हूँ, फलानी जाति की और इतनी मेरी उम्र है, तो मैं इस आश्रम की हूँ, अभी गृहस्थ हूँ। तो ऋषि ऐसे अपनी जटा खुजाएँगे। कहेंगे, ये कौन-सी भाषा, कौन-सी अपरिचित भाषा की शब्दावली ले आई तू, कन्या? पूछेंगे, ये लिंग क्या होता है? ये जाति क्या होती है? ये वर्ण क्या होता है? हम तो इनकी परिभाषा ही भूल गए। श्रुति को इन सब से कोई लेना-देना नहीं है। श्रुति आपको सिर्फ़ और सिर्फ़ घायल, लहूलुहान, प्यासे, लेकिन डरे हुए अहंकार की तरह देखती है। आप क्या हो ऋषियों की नज़र में? किन ऋषियों की बात कर रहा हूँ? जो श्रुतिकार हैं, जो मंत्र-द्रष्टा ऋषि हैं, उनकी दृष्टि में आप सिर्फ़ और सिर्फ़ एक लहूलुहान चेतना मात्र हो और कुछ नहीं।

आप उनके सामने अमीर बन के खड़ी हो जाएँगी, उनको अमीरी समझ में आएगी ही नहीं। उनका कंपाइलर इस इनपुट को प्रोसेस ही नहीं कर पाएगा। आप कहोगे, रिच, रिच, रिच। वो कहेगा, सिंटैक्स एरर। हमें समझ में ही नहीं आ रहा, रिच माने क्या होता है। हमें बस एक बात समझ में आती है। तुम्हारे अहंकार की अभी हालत कैसी है? तुम में तड़प कितनी है? वो बस यह पूछते हैं और नहीं पूछते कुछ आपसे।

आप कहोगे, मैं चार बच्चों की अम्मा हूँ। वो कहेंगे, हमें समझ में ही नहीं आ रहा। आप कहोगे, नहीं, मैं विवाहित ही नहीं हूँ। वो कहेंगे, यह भी हमें समझ में नहीं आ रहा। आप कहोगे, अरे, मैं पुण्य आत्मा हूँ। सिंटैक्स एरर। कहते हैं न, बैड इनपुट। आप कहोगे, अरे, मैं दुराचारिणी हूँ, मैं महापापिनी हूँ। वो कहेंगे, हमें यह भी नहीं समझ में आ रहा। आप कहोगे, मैंने जीवन भर शुभ किया है। वो कहेंगे, नहीं समझ में आ रहा। आप कहोगे, मैंने जीवन भर अशुभ किया है। नहीं समझ में। आप कहोगे, मैं सबसे ऊँची जात की, सबसे ऊँचे वर्ण की हूँ। नहीं आ रहा। आप कहोगे, मैं अछूत हूँ। मैं तो वर्ण-व्यवस्था से ही परित्यक्त हूँ। वो कहेंगे, हमें ये भी नहीं समझ में आ रहा।

तो अब आप खीज जाओगे और खीजा कर पूछोगे, तुझे समझ में क्या आता है? वो कहेंगे, बस इतना हमें समझ में आता है कि प्यार है कि नहीं। तुझे इतनी-सी बात बतानी थी हमें और उसकी जगह तूने यह कौन-सा पोथा-पुराण खोल दिया? मेरे पास इतने पैसे हैं। मेरे पास इतने पति हैं। मेरे पास इतने बच्चे हैं। मेरे पास इतनी डिग्रियाँ हैं। ऐसा अनुभव कर दिया। मैंने ऐसे पुण्य संचित करे हैं। तू ये क्या मेरे सामने पोथा खोल के बैठ गई? मैं बस एक बात जानना चाहता हूँ। मत बता कि पैसा नहीं, कितना है? पुण्य कितना है।/? आचरण कैसा है, वर्ण क्या है? इतना बता दे, प्यार है कि नहीं? और प्यार की परिभाषा क्या? अहंकार मिटने को तैयार है कि नहीं? यही प्यार की परिभाषा है।

तो ये कहाँ का प्रोपेगेंडा है कि हमारे तो सारे ग्रंथ जाति से भरे हुए हैं। ये प्रोपेगेंडा वही चला सकते हैं, जिन्होंने श्रुति ग्रंथ कभी खोल के ही नहीं देखे। और बिना पढ़े तुम टिप्पणी करने आ गए। कैसे आदमी हो? और आत्मविश्वास तुम्हारा बड़े ग़ज़ब का है, बड़े ग़ज़ब का है।

एक कोई मेरे पास लेकर आया। बोले, आचार्य जी, देखिए, यहाँ पे क्या बोल रहा है। और वो बोले जा रहा है, बोले जा रहा है, बोल रहा है, “ये आचार्य आजकल सबको कथा उपनिषद् पढ़ा रहे हैं और कथा उपनिषद् में बहुत सारी काल्पनिक बातें हैं, जिनसे अंधविश्वास बढ़ता है। कथा उपनिषद् को पढ़ाना तो बिल्कुल पुरानी ब्राह्मणवादी व्यवस्था को बढ़ाने वाली बात है। कथा उपनिषद् हर तरीके से मान्यताओं, रूढ़ियों, अंधविश्वासों से भरा हुआ है।”

यह पता है ना किसकी बात कर रहे हैं? ये कठ उपनिषद् की बात कर रहे हैं। ये वो हैं, जिन्हें कवर पेज भी पढ़ना नहीं आया। अंग्रेज़ी में कहीं खोल के इन्होंने कठ को K-A-T-H-A पढ़ लिया और उसको ये कथा उपनिषद् बताए जा रहे हैं। और कह रहे हैं, “ये देखो, ये पूरी दुनिया में अंधविश्वास फैला रहे हैं। ये कह रहे हैं कि नचिकेता आसमान में यमराज के पास पहुँच गया। ये तो अंधविश्वास है न। ऐसा होता है क्या? उसके बाद यमराज ने कहा कि मैं तुम्हें पूरी दुनिया दान में दे दूँगा। कोई पूरी दुनिया दान में दे सकता है क्या? यह तो ऐसे ही फ़िज़ूल कहानियाँ हैं। और यह सब लोगों का ब्रेनवॉश कर रहे हैं, कठ उपनिषद् पढ़ा-पढ़ा के।”

ये मोटी बुद्धि नहीं है, ये खोटी बुद्धि है। यहाँ नीयत में खोट है। ये नीयत की खोट है। तुम्हें सिंबॉलिज़्म समझ में नहीं आता, तुम्हें प्रतीकात्मकता का अर्थ कुछ पल्ले नहीं पड़ता। हर चीज़ लिटरल नहीं होती। तुम जैसी बात कर रहे हो, तुम मेरे सामने पड़ोगे, तो मैं तुमसे यही कहूँगा, जा जाकर मर। तो तुम मर तो नहीं जाओगे, क्योंकि तुम जानोगे कि बात प्रतीकात्मक है। अपने लिए तो तुम समझ जाते हो कि हर शब्द का वही अर्थ नहीं होता, जो शाब्दिक है। कुछ बातें संकेतों में कही जाती हैं, मेटाफोरिकल होती हैं।

आजकल उसका दिमाग़ आसमान पर चढ़ा हुआ है। इसका मतलब उसने अपने ब्रेन को स्पेस स्टेशन भेज दिया है। नचिकेता यमराज के पास गया। इसका मतलब ये थोड़ी है कि यमराज कोई पर्टिकुलर लोक होता है, किसी गैलेक्सी में वो चला गया। बात सांकेतिक है। और ऐसा नहीं है कि तुम नहीं जानते संकेतों का अर्थ। संकेतों का अर्थ नहीं जानते तो फिर जब तुम्हें आँख मारती है, तो ख़ुश क्यों हो जाते हो? फिर तो तुम्हें यही सोचना चाहिए कि उसकी आँख में कुछ बीमारी है, दवाई लेकर चले जाओ।

जानते तुम भी भली-भाँति हो कि जीवन संकेतों पर चलता है। पर श्रुति जब संकेतों में बात करती है, तो तुम उसको लिटरली लेना चाहते हो। ये खोटी बुद्धि है, ये नीयत की ख़राबी है। तुम एजेंडा चला रहे हो, तुम्हारे पास प्रोपेगेंडा है। और कोई बात नहीं है। आपको नहीं कह रहा हूँ। कहिए और कुछ है?

प्रश्नकर्ता: सर, इसी पर फ़ॉलो-अप क्वेश्चन है। गीता में श्रीकृष्ण जी ने कहा है कि “स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः।” पारंपरिक भाष्यकार भी इसे जन्म के जाति से जोड़ते हैं। आप इसे स्वभाव और गुण से जोड़ते हैं। तो आचार्य जी, कौन-सी व्याख्या मूल संदर्भ के ज़्यादा क़रीब है? और मैं ये जानना चाहती हूँ कि आप इसे पुनर्व्याख्या कहेंगे, बजाय कि असली अर्थ श्लोक का?

आचार्य प्रशांत: पुनर्व्याख्या करने की क्या ज़रूरत है? पुनर्व्याख्या माने क्या होता है? व्याख्या पर किसी का विशेषाधिकार होता है क्या? आप थोड़ी देर पहले बोल रही थीं कि सब लोग जाति मानते आए हैं। शंकराचार्य लोग जाति मानते आए हैं। तो? कोई कुछ मानता हो, कोई कुछ व्याख्या करता हो, मेरा विवेक जो मुझे बताएगा, वो है न। यहाँ हम अंधे पैदा हुए हैं? हमारे चेतना नहीं है? शंकराचार्य क्या भगवान उतर कर के यहाँ बोलें, कि जाति-भेद करो, छुआछूत करो, मैं तो न मानूँ।

ये बार-बार क्या बात है कि आप जो व्याख्या दे रहे हैं, वो पारंपरिक व्याख्या से अलग है। अलग है, तो ताली बजाओ न, मैं कुछ नया कर रहा हूँ। जो बात उपलब्धि की होनी चाहिए थी, उसको आपने अभियोग बना दिया। जो बात इज़्ज़त की होनी चाहिए थी, उसको आपने इल्ज़ाम बना दिया। जो मैं आपसे कह रहा हूँ, वो सिर्फ़ नया ही नहीं है। उसमें कृतज्ञता है, उसमें कहे गए शब्द की मौलिकता के प्रति निष्ठा है। मैं कितना भी विद्रोही हो जाऊँ, जिसने जो बात कही है दिल से सच्ची, इतना बड़ा मैं कभी नहीं हो जाऊँगा कि मैं उसके सामने सर न झुकाऊँ। और मैं उसकी बात को विकृत कर जाऊँ, कभी नहीं।

अरे भाई, श्रुति नहीं मानती जाति को। मेरे आसपास का समाज मानता है जाति को, बिल्कुल मानता है जाति को। पर मेरी इतनी औक़ात नहीं कि मैं अपने पूर्वाग्रह ले जाकर के श्रुति के ऊपर डाल दूँ। ये नहीं करने वाला मैं, कभी भी नहीं करने वाला। इतनी कृतज्ञता सब में होनी चाहिए।

यही प्रश्न था या कुछ और था?

प्रश्नकर्ता: यही था, आचार्य जी। कुछ और प्रश्न हैं, अगर आपकी इजाज़त हो?

आचार्य प्रशांत: मेरी, तो है ही। पर इन लोगों की पूछ लीजिए, ये ख़फ़ा ना हो रहे हों। अच्छा, एक और पूछ लीजिए, बाक़ी मौक़ा मिले तो कल ले आइएगा।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप दावा करते हैं कि आपके पास एक ऐसे सत्य की पहुँच है, जो भाषा, मन और इंद्रियों से परे हैं।

आचार्य प्रशांत: मेरे पास? मेरे पास ठीक से पीने के लिए चाय भी नहीं है। आज मैं आप लोगों के पास 5:30 आना चाहता था। 6:00 बजे बताओ क्यों आया? मेरी पैंट फाड़ दी। जिसके पास पतलून नहीं है उसके पास एक विशेष सत्य कहाँ से होगा, भाई? मज़ाक नहीं कर रहा हूँ, सचमुच। ली और दो लोगों ने मिलकर के उस पर एकदम, बिल्कुल, एक ने इधर से, एक से इधर से गोरिल्ला वॉरफेयर कर दिया। पेट कुछ कम हो गया है, तो वो ढीली पड़ रही थी। तो एक इधर से खींचने लग गया, उसमें बेल्ट एक इधर से तोड़ ही दिया। उसके बाद इधर से-उधर से जाकर के सेफ़्टी पिन माँगा रहे हैं। पता नहीं क्या कर रहे हैं, खोस रहे हैं। मैंने कहा, तुम रहने ही दो यह पोशाक। मैं अपनी साधारण काली पैंट में चला जाऊँगा।

मैं साधारण आदमी, मैं कहाँ से कोई विशेष सत्य ले आऊँगा या उस पर अपने स्वामित्व का दावा करूँगा? जिन्होंने मुझे ज़रा भी सुना है वो जानते हैं कि सत्य की तो बात करने से मना करता हूँ मैं। मैं कहता हूँ, छोड़ो न सच्चाई को। हमारा सरोकार झूठ से है, सच से नहीं है। क्योंकि हमारी ज़िंदगी में क्या भरा हुआ है?

श्रोता: झूठ।

आचार्य प्रशांत: कभी बोला कि मैं तुम्हें सच ला के दूँगा? मुझे ही नहीं है, आपको कहाँ से लाऊँ? ये सब खेल हम नहीं खेलते बाबा, कि मेरे पास सत्य है और भक्त जनों, अभी यहाँ से उठा के ऐसे...। ये कितना भी गिर जाऊँ, इतना नहीं गिरने वाला ये। कभी नहीं करूंगा। अरे, हम सीधा-सादा काम कर रहे हैं, भाई। ईमानदारी, अपनी ज़िंदगी जैसी है, उसको वैसा देखो और पाओ कि उसमें भ्रम भरा है, कपट भरा है, कोहरा है बहुत सारा, सब धुँधला ही धुँधला है। और कोहरा अगर छँटने लगता है, तो हम उसे छँटने नहीं देते, क्योंकि हमारी नीयत ख़राब है।

मैं तो बार-बार आपके आगे आकर के अपनी विवशता खड़ी कर देता हूँ। कह देता हूँ, मैं असहाय हूँ। क्योंकि प्रेम सिखाया नहीं जा सकता।

नीयत अपनी निजी बात होती है। किसी के भीतर नीयत का इंजेक्शन नहीं लगाया जा सकता। और मैं आपसे जो कुछ भी कह रहा हूँ, उससे कोई लाभ नहीं होगा, अगर आपकी अपनी नीयत नहीं बन रही।

हो गया।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद, आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: कुछ मनन करिएगा और उसके बाद भी प्रश्न बचे हों, तो कल आ जाइएगा।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories