धर्मग्रंथों को जाति-व्यवस्था के चश्मे से देखने के बजाय उनके मूल संदेश को समझना आवश्यक है। श्रुति का केंद्र जाति, लिंग या सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि अहंकार और उससे मुक्ति है। पारंपरिक व्याख्या से अलग समझ को पुनर्व्याख्या मानकर खारिज करना उचित नहीं। वास्तविक अध्यात्म बाहरी पहचान नहीं, अपनी नीयत, भ्रम और कपट को ईमानदारी से देखने तथा आत्मबोध की ओर बढ़ने का आग्रह करता है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा अगला सवाल ये है कि हमारे धर्म ग्रंथों में, जैसे ऋग्वेद, पुराण, स्मृति, उपनिषदों में जाति-प्रथा का क्लियर मेंशन है और चारों शंकराचार्य आज भी इसे मानते हैं। और आप कहते हैं कि ये सनातन धारा की एक अशुद्धि है। तो मुझे तो जितना अभी तक समझा, यह लगता है कि ये हमारी सनातन धारा का एक अभिन्न अंग है। और अगर ये अभिन्न अंग हमारे ग्रंथों से आ रहा है, तो हम उनको परम ज्ञान का स्रोत…
आचार्य प्रशांत: ये सब कहाँ से ले आ रहे हो आप?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, काफ़ी टाइम से चल रहे थे मन में।
आचार्य प्रशांत: ग्रंथ माने क्या होता है, बेटा? ग्रंथ क्या होता है? एक सौ एक बार हम श्रुति और स्मृति का भेद; कभी नहीं करी चर्चा? तो ये ग्रंथ बोल के आपने दोनों को एक में ही लपेट लिया। उपनिषद् और मनुस्मृति एक हो गए। ये क्या कर रहे हो? क्या बोल रहे हो कि हमारे ग्रंथों में तो जाति का उल्लेख बार-बार आता है। ग्रंथ माने क्या होता है?




