वामपंथ या दक्षिणपंथ का ठप्पा क्यों लगवाना है? तुम किसी पंथ के लिए थोड़े ही पैदा हुए हो, तुम मुक्ति के लिए पैदा हुए हो। सच के पारखी बनो, विचारधारा के अनुयायी नहीं। ज्ञान सब विचारधाराओं का होना चाहिए, क्योंकि उससे इतिहास की धारा का पता चलता है। लेकिन किसी भी विचारधारा का अनुयायी नहीं बनना है। विचारधारा आपको खुलकर सोचने, देखने और जीने नहीं देती, जैसे आप खूँटे से बँध गए हों। समद्रष्टा रहो—ज्ञान सबका रहे, पर ठप्पा कोई न रहे।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। आचार्य जी, एक वेदांती होने के नाते आप लेफ़्टिस्ट (वामपंथ) और राइटिस्ट (दक्षिणपंथ) विचारधारा में से किस विचारधारा को ज़्यादा सही मानते हैं?
आचार्य प्रशांत: जब वेदांत है, तो लेफ़्ट-राइट की क्यों बात करें? क्यों तुम्हें जानना है कि ये ज़्यादा सही है कि वो ज़्यादा सही है? माने चुनना कुछ और ही है। हम बात केंद्र की करते हैं न? केंद्र माने सेंटर, आत्मा माने केंद्र। बस बात खत्म।
वामपंथ अगर समानता की बात करता है, सामाजिक न्याय की बात करता है तो समानता शरीर में तो हो नहीं सकती, मन में भी नहीं हो सकती, परिस्थितियों में नहीं हो सकती और कुछ भी समान नहीं हो सकता; एक ही चीज़ समान हो सकती है — आत्मा। जितनी भी विचारधाराएँ हों उनका जो सच होता है, वो तो वेदांत में है न? और जो विचारधारा जितना अपने आप को सच मानेगी, उतना वो कट्टर होती जाएगी और सच से दूर होती जाएगी। समझ में आ रही है बात?
प्रश्न ही विचित्र है। ऐसी सी बात है कि शिखर के अनुसार कौन-सी घाटी बेहतर है। अरे, जब तुम शिखर को जानते ही हो तो घाटियों की बात क्यों करनी है? कोई घाटी एक दृष्टि से बेहतर होगी, कोई दूसरी दृष्टि से बेहतर होगी। किसी एक समय पर कोई एक विचारधारा ज़्यादा उपयोगी हो सकती है, किसी दूसरे समय पर दूसरी। पर एक चीज़ है जो समय से मुक्त है, समयातीत है, सनातन सत्य है, तुम उसके साथ रहोगे न? या कुछ होना ही है? घाटी एक, घाटी दो, कुछ चुनना ही है? कोई मजबूरी है?




