नाम जप तभी उपयोगी साधना बनता है जब जपे जाने वाला नाम किसी छवि, व्यक्ति, कहानी या सांसारिक विषय की ओर संकेत न करे। सामान्य नाम मन में इच्छाओं और अहंकार से जुड़े विषयों को मजबूत करते हैं, जबकि निर्गुण नाम मन को उन विषयों के बोझ से हल्का कर सकता है। इसलिए नाम जप का उद्देश्य किसी कल्पित रूप की पूजा करना नहीं, बल्कि अपनी सीमित पहचान से आगे जाने की आकांक्षा, यानी मुमुक्षा, को जगाना है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, दंडवत प्रणाम। मैं 2020 से आपको सुन रहा हूँ। आज पहली बार आपके सेशन में आया हूँ। मैं नाम जप के बारे में आपसे जानना चाहता हूँ। बहुत से हम यूट्यूब पर ऐसे संतों को सुनते हैं, जो यह बात कहते हैं कि हमारे हेडेक था, लीवर या किडनी फेल, हम सुनते हैं, हम उनको मानते हैं। हम उनसे सुनते हैं कि 20 साल अगर डॉक्टर ने कह दिया था, दो साल हम जीवित रहेंगे, बट 20 साल हम जीवित हैं। एंड वो संसार में अच्छी शिक्षा भी देते हैं। अल्कोहल, नो मीटिंग, नो गैंबलिंग, ऑल दोज़। वो कुछ पैसे भी नहीं लेते हैं। सो एक उस डायरेक्शन में भी ट्रस्ट बिल्ड होता है कि नाम जप से या सिमिलर सुपरस्टिशन अगर ये है, तो इस पर आपकी क्लेरिटी चाहता हूँ, आचार्य जी, कि क्या है ये?
आचार्य प्रशांत: आप 2020 से सुन रहे हो। आप गीता सत्रों में हो?
प्रश्नकर्ता: नहीं, आचार्य जी।




