प्रश्नकर्ता: आचार्य जी। मैं आइआइटी कानपुर से हूँ, और जीवन के प्रति एक तर्कवादी रवैया रखता हूँ, चीज़ों को समझने की कोशिश करता हूँ। आपको सुनता हूँ और आपका बहुत सम्मान करता हूँ। मेरे कुछ मित्र भी हैं जो आपको सुनते हैं, और और भी आपको सुनने वाले हैं जो कॉमेंट इत्यादि में लिखते हैं।
बहुत ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि उनको आपमें कुछ दिव्य रोशनी वगैरह दिखायी देती है, मुझे नहीं दिखती। क्या इसका मतलब यह है कि मुझमें कोई कमी है, क्या मैं आपको ठीक से देख नहीं पा रहा?
आचार्य प्रशांत: तुममें कोई कमी नहीं है, तुम बिलकुल ठीक हो। मुझे उन लोगों से ताज्जुब है जिन्हें दिव्य रोशनी दिखती है। उन्हें कहाँ और कौनसी रोशनी दिख गयी, मुझे कभी समझ आया नहीं। मैं तो जब भी अपनेआप को देखता हूँ बाहर के आईने में या अन्दर के दर्पण में, मुझे तो कोई दिव्य रोशनी दिखाई देती नहीं। जो देख रहे हैं, उनकी महानता है कि उनको दिख रही है।
प्र: तो क्या इसका यह तात्पर्य है कि एन्लाइटेंड (प्रबुद्ध) नहीं हैं आप?
आचार्य: (हँसते हुए) मैंने कब कह दिया कि एन्लाइटनमेंट (प्रबोधन) जैसा कुछ होता भी है? मैं तो सौ टका अनएन्लाइटेंड हूँ, हूँ भी और आजन्म रहूँगा भी। कोई ऐसी चीज़ होती, जो पाने की थी, तो भई, कुछ सम्भावना बनती भी कि क्या पता वो घटना घट ही जाए। क्या पता वो हमारे बिना चाहे ही घट जाए अकस्मात। यहाँ तो जो बात है वो बिलकुल कपोल कल्पना, दिवास्वप्न है, आकाश महल है। वो हो कहॉं से जाएगा।
तुम्हें शक है कि मैं




