एक समूह अपने लिए आचरण के अच्छे-बुरे का जो निर्धारण करता है, उसे नैतिकता कहते हैं। उसमें ज्ञानियों द्वारा दी गई सीख नहीं, केवल बहुमत का ज़ोर होता है। इसीलिए अलग-अलग समाजों में नैतिकता-अनैतिकता के अलग-अलग मापदंड होते हैं और वह समय-समय पर बदलती भी रहती है। नैतिकता एक अंधी-सी चीज़ है। उसमें मनुष्य के विवेक के लिए कोई जगह नहीं होती। सही-गलत का फ़ैसला न समाज करेगा न परंपरा; इसका फ़ैसला सिर्फ़ आपकी आंतरिक जागृति ही कर सकती है।
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प्रश्नकर्ता: नमन, आचार्य जी। मेरे दिमाग में कुछ-कुछ शब्द जो हैं, वो कौंध से गए हैं। जैसे सबसे पहला कौंधा- नैतिकता। मुझे अभी तक भी नहीं समझ में आता कि वास्तविक नैतिकता क्या होती है?
एक उदाहरण देता हूँ, नैतिकता के मारे अगर मैं अपने पिताजी से कहूँ कि भंडारा करवा दीजिए तो वो करवा देंगे। ठीक है। उसमें भी वो उन्हीं लोगों को खिलाएँगे, जिनका पेट पहले से ही भरा हुआ है।
नैतिकता क्या है, असल में मुझे ख़ुद नहीं समझ में आया। और जहाँ तक है, मैं उसके विरुद्ध ही हूँ। अभी तक जितना भी मैं अपने आप को जान पाया, जितना ज़िन्दगी जी पाया हूँ, उसके क़ायदे में कहूँ, तो नैतिकता छोड़कर के या नैतिकता उसमें कम ही रही होगी। नैतिकता मतलब कि दूसरे का दिखावा कम ही रहा होगा, जो मुझे सही लग रहा था, वो मैंने करा।
आचार्य जी, कुछ और उदाहरण हैं जो मैं बोल रहा हूँ। जैसे कि नैतिकता के मारे हम अपने पिताजी के साथ ज़्यादा बैठते नहीं थे। उनसे उतना घुलना-मिलना नहीं था। अगर मैं याद करूँ तो शायद मैं जब कमाने लगा, तो घर-वर बन रहा था तो पिताजी के बगल में मैं जाकर बैठा वो बगल में बुलाए-बिठाए बोले, घर बनना है, कुछ व्यवस्था करो और सब। तो शायद तब उनसे थोड़ी खुलकर बात हो पाई।




