सेक्स से इतना घबराता क्यों है धर्म? || आचार्य प्रशांत कार्यशाला (2023)

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी! आदि शंकराचार्य के विषय में ये कथानक है कि जब काशी में मंडन मिश्र के साथ उनका एक शास्त्रार्थ होता है, तो उनकी पत्नी काम (सम्भोग) से सम्बन्धित एक प्रश्न पूछतीं हैं। तो जैसा मुझे पता है कि वो अपने स्थूल शरीर को त्यागकर किसी सम्राट के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और वहाँ से फिर वो उस अनुभव को लेकर आते हैं। तो क्या कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर ऐसा भी कुछ है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, इसका जो उत्तर है वो इतना सीधा, इतना स्पष्ट है कि साधारण बुद्धि भी उसको देख ले, लेकिन धार्मिक बुद्धि उसे नहीं देख पाएगी। क्योंकि जैसे ही धार्मिकता आ जाती है, तो सहजता पर पर्दा पड़ जाता है। ‘धर्म’ जिसको हम कहते हैं वो अधिकांशतः भय पर और वर्जना पर आधारित रहा है, पूरे विश्व में। और भय रहा है, वर्जना रही है इसीलिए अज्ञान और हिंसा उसमें बहुत रहे हैं।
तो धर्म होता तो इसीलिए है कि आपको आत्मा से ही पता चल जाए कि क्या उचित है और क्या अनुचित। यही तो धर्म का अर्थ होता है न? कि आपके स्वयं के अन्दर ही वो बिन्दु आ जाए जो आपको बस प्रेम के नाते सत्य की ओर धकेलता रहे कि “मेरे भीतर ही प्रेम है और मेरा प्रेम ही मुझे सही दिशा में बार-बार प्रेरित-प्रेषित करता रहता है।” पर धर्म ने आत्मा पर, माने ब्रह्म पर, बहुत ही कम ध्यान दिया है। उसकी जगह धर्म ने पूजना शुरू कर दिया, अपनी ही मानसिक कल्पनाओं को।
नतीजा ये कि जब भीतर के बिन्दु की उपेक्षा कर, बाहर के किसी रचयिता को पूजा जाता है, तो वो भीतर का बिन्दु आपके लिए निष्क्रिय हो जाता है। आपको पता चलना बन्द हो जाता है कि क्या सही है और क्या ग़लत।
तो इन्सान फिर क्या करे? और समाज कैसे चले? क्योंकि कुछ तो कहीं से ख़बर आनी चाहिए न, कुछ तो पैमाना होना चाहिए न सही-ग़लत का। भई! सही-ग़लत के निर्णय के बिना न इन्सान चल सकता है और न ही समाज चल सकता है।

![क्या आप आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी [इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग] के भाग हैं?](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-3dc72262-a991-4f45-a9d4-a0397e21022c/30/image.jpg)





