हम साइकोसोमैटिक बीइंग्स होते हैं न, हम तो कुछ खाते भी हैं, तो उसका भी असर मन पर पड़ता है। पड़ता है न? और वो शरीर की ही बात है। आप कुछ उल्टा-पुल्टा खा लीजिए, असर पड़ेगा। नशे का भी यही सिद्धांत होता है, आप कुछ ले लीजिए उससे दिमाग़ चक्कर खाना शुरू कर देगा। उसी तरीक़े से ये जो सेक्सुअल यूनियन होता है, ये भी एक फिज़िकल चीज़ है, जिसका मन पर असर पड़ता है। ये भी मन पर निशान छोड़ता है। तो आप इमोशनली भले ही नहीं अटैच हो रही हों, पर क्या आपने परखा है कि इसका मन पर क्या असर पड़ता है?
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। पहले तो बहुत-बहुत थैंक यू आपको, गीता सत्र से जुड़ने के बाद लाइफ़ में काफ़ी क्लैरिटी आई है। मेरा प्रश्न ये था, कि आपको सुनने से पहले मैं बहुत ज़्यादा इमोशनल रहती थी और हर रिलेशनशिप में इमोशनली अटैच हो जाती थी। लेकिन आपको सुनने के बाद समझ में आया कि अटैचमेंट, इमोशन्स ये सब बहुत ही बॉडिली चीज़ हैं और बहुत ही पाशविक हैं। मैंने एक किताब में भी आपकी पढ़ा है।
तो अभी ऐसा हो गया है कि किसी भी लड़के के साथ रिलेशनशिप में आने के बाद, फिज़िकल भी होने के बाद, मुझे कोई अटैचमेंट नहीं होता है, कोई भी इमोशनल अटैचमेंट और मुझे कोई फ़र्क़ भी नहीं पड़ता है। तो मुझे इस चीज़ पर आपकी थोड़ी क्लैरिटी चाहिए थी। मैं अभी कनाडा में हूँ, अपनी पढ़ाई कर रही हूँ, जॉब भी करती हूँ पार्ट-टाइम। सब सही चल रहा है, बट इस पर मुझे थोड़ा सा समझ में नहीं आ रहा था कि ये क्यों हो रहा है और मैं इसको कैसे ठीक करूँ।




