शारीरिक संबंध है, पर भावनाएं नहीं! अब क्या करें?

Acharya Prashant

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शारीरिक संबंध है, पर भावनाएं नहीं! अब क्या करें?
हम साइकोसोमैटिक बीइंग्स होते हैं न, हम तो कुछ खाते भी हैं, तो उसका भी असर मन पर पड़ता है। पड़ता है न? और वो शरीर की ही बात है। आप कुछ उल्टा-पुल्टा खा लीजिए, असर पड़ेगा। नशे का भी यही सिद्धांत होता है, आप कुछ ले लीजिए उससे दिमाग़ चक्कर खाना शुरू कर देगा। उसी तरीक़े से ये जो सेक्सुअल यूनियन होता है, ये भी एक फिज़िकल चीज़ है, जिसका मन पर असर पड़ता है। ये भी मन पर निशान छोड़ता है। तो आप इमोशनली भले ही नहीं अटैच हो रही हों, पर क्या आपने परखा है कि इसका मन पर क्या असर पड़ता है? यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। पहले तो बहुत-बहुत थैंक यू आपको, गीता सत्र से जुड़ने के बाद लाइफ़ में काफ़ी क्लैरिटी आई है। मेरा प्रश्न ये था, कि आपको सुनने से पहले मैं बहुत ज़्यादा इमोशनल रहती थी और हर रिलेशनशिप में इमोशनली अटैच हो जाती थी। लेकिन आपको सुनने के बाद समझ में आया कि अटैचमेंट, इमोशन्स ये सब बहुत ही बॉडिली चीज़ हैं और बहुत ही पाशविक हैं। मैंने एक किताब में भी आपकी पढ़ा है।

तो अभी ऐसा हो गया है कि किसी भी लड़के के साथ रिलेशनशिप में आने के बाद, फिज़िकल भी होने के बाद, मुझे कोई अटैचमेंट नहीं होता है, कोई भी इमोशनल अटैचमेंट और मुझे कोई फ़र्क़ भी नहीं पड़ता है। तो मुझे इस चीज़ पर आपकी थोड़ी क्लैरिटी चाहिए थी। मैं अभी कनाडा में हूँ, अपनी पढ़ाई कर रही हूँ, जॉब भी करती हूँ पार्ट-टाइम। सब सही चल रहा है, बट इस पर मुझे थोड़ा सा समझ में नहीं आ रहा था कि ये क्यों हो रहा है और मैं इसको कैसे ठीक करूँ।

आचार्य प्रशांत: क्या चीज़ समझ में नहीं आ रही है? अगर समझे बिना ही आप कह रहे हैं कि सब सही चल रहा है, तो कैसे सही चल रहा है? क्या है जो समझ में नहीं आ रहा?

प्रश्नकर्ता: सही मतलब कि पढ़ाई और जॉब तो सब सही चल रहा है, कॉलेज और सब कुछ। बट ये चीज़ मुझे लगता है कहीं-न-कहीं गलत है। बट जब मैंने आपको सुना, उसमें लगता था कि वैसे भी इमोशनली अटैच नहीं होना चाहिए। तो मुझे लगता है कि फिर इसमें गलती क्या है जो मैं कर रही हूँ?

आचार्य प्रशांत: सही-गलत की बात नहीं है, समझने या न समझने की बात है। आप कह रहे हो, "कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।" कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता तो ये सब ना हो, तो भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए। तो अगर कोई फ़र्क़ सचमुच नहीं पड़ता, तो ये सब है क्यों?

जो भी है, इमोशनल नहीं है, फिज़िकल है। वो भी क्यों है? मैं उसको मना नहीं कर रहा हूँ। मैं यहाँ पर मोरल एंगल तो लेता ही नहीं हूँ। पर जो बोध है, अंडरस्टैंडिंग है — डू वी अंडरस्टैण्ड व्हॉट्स हैपेनिंग ईवन ऐट द फिज़िकल लेवल? एंड, इट माइट बी ऑल राइट, आम नॉट गोइंग टू पुलीस इट। बट डू वी अंडरस्टैण्ड?

बस ये आप थोड़ा देख लीजिए, कि ये एक आफ़त निश्चित रूप से होती है इमोशनल क्लिंगिंग। पर अगर इमोशनल क्लिंगिंग नहीं है, तो सिर्फ़ उसके ना होने से, जो टाइम, एनर्जी, मेंटल स्पेस इन्वेस्ट होता है फिज़िकल एडवेंचरिंग में, क्या वो जस्टिफ़ाई हो जाता है?

मैं फिर कह रहा हूँ, मैं वो पोज़ीशन बिल्कुल नहीं ले रहा हूँ कि किसी इंसान को, ख़ासकर लड़की को अपनी बॉडी की सैंक्टिटी का ख़्याल रखना चाहिए, वग़ैरह-वग़ैरह। वो हटाया। पर कोई भी चीज़ आपसे आप यूँ ही तो किसी फिज़िकल रिलेशनशिप में नहीं आ जाते ना। उसमें भी समय लगता है, किसी को मेंटल स्पेस देना, बात करनी पड़ती है। कुड रेंज फ्रॉम आवर्स टू डेज़ टू वीक्स टू इयर्स, समटाइम्स इट्स अप योर एंटायर लाइफ़। इज़ इट वर्थ इट?

आप फिज़िकली अटैच होते हो, ले-देकर के फिर उससे फिज़िकल प्लेज़र मिलता होगा, क्योंकि इमोशनल तो आप कह रहे हो कि कुछ है नहीं। ले-देकर फिज़िकल प्लेज़र ही मिलता होगा। तो वो जो फिज़िकल प्लेज़र है, इज़ इट वर्थ द इन्वेस्टमेंट? बस ये क्वेश्चन है।

डू वी रियलाइज़ द ट्रेड ऑफ़? कितना उसमें जा रहा है और कितना उसमें से मिल रहा है? और ये विचार आपको ख़ुद करना पड़ेगा, क्योंकि आप एडल्ट हैं, आपकी ज़िंदगी है, आपको देखना है, सोचना है। किसी और को हक़ नहीं है इसमें कुछ करने का। लेकिन ये सलाह दी जा सकती है कि, ये बहुत अच्छी बात है नहीं है इमोशनल क्लिंगिंग तो। लेकिन ज़िंदगी तो इतनी ही बड़ी है न (हाथ से थोड़ा से का इशारा करते हुए), उसको कहाँ इन्वेस्ट करना है?

और आप बिल्कुल ऑटोमेटन तो बन नहीं सकतीं कि "मैं इतनी ज़्यादा मैकेनिकल, रोबोटिक हो गई हूँ कि द होल प्रोसेस लास्ट्स जस्ट 10 मिनट्स।" ऐसा तो नहीं हो सकता। इट कंस्यूम्स इट्स ओन शेयर ऑफ़ टाइम एंड एनर्जी एंड एवरीथिंग — अटेंशन। ये सब होता है। तो आपको अपने आप से पूछना पड़ेगा कि किस हद तक ये जस्टिफ़ाइड है। जस्टिफ़ाइड फिर किसी मोरल स्केल पर नहीं, टाइम की स्केल पर, कॉन्शसनेस की स्केल पर।

डू आई अंडरस्टैण्ड व्हाट्स हैपेनिंग? इज़ इट अ जस्टिफ़ाइड इन्वेस्टमेंट ऑफ़ माई टाइम? क्या इस समय में मैं कुछ और नहीं कर सकती थी? और थोड़ा-सा और कड़ा होकर, ईमानदारी से अपने आप से पूछना पड़ेगा, “क्या ये सब कुछ मेरे ऊपर कोई निशान सचमुच नहीं छोड़ रहा है?” शारीरिक निशानों की नहीं बात कर रहा हूँ, मैं मानसिक।

देखिए, शरीर तो ऐसी चीज़ है। हम साइकोसोमैटिक बीइंग्स होते हैं न, हम तो कुछ खाते भी हैं, तो उसका भी असर मन पर पड़ता है। पड़ता है न? और वो शरीर की ही बात है। आप कुछ उल्टा-पुल्टा खा लीजिए, असर पड़ेगा। नशे का भी यही सिद्धांत होता है, आप कुछ ले लीजिए उससे दिमाग़ चक्कर खाना शुरू कर देगा। उसी तरीक़े से ये जो सेक्सुअल यूनियन होता है, ये भी एक फिज़िकल चीज़ है, जिसका मन पर असर पड़ता है। ये भी मन पर निशान छोड़ता है। तो आप इमोशनली भले ही नहीं अटैच हो रही हों, पर क्या आपने परखा है कि इसका मन पर क्या असर पड़ता है? असर तो पड़ता ही है। और अगर रिश्ता सोच-समझकर बनाया हो, तो अच्छा असर भी पड़ सकता है।

अच्छे रिश्ते की पहचान यही होती है कि उसमें मन साफ़ हो जाता है।

तो ये बातें आपको अपने आप से पूछनी पड़ेंगी, कि “मैं जो संबंध बना रही हूँ, वो मेरे मन को साफ़ कर रहे हैं या गंदा कर रहे हैं? और अगर गंदा भी कर रहे है और मेरा समय भी ले रहे हैं, तो ये कैसी डील हुई? कि मैंने अपना समय किस चीज़ में लगा दिया? और गंदा होने में। समय लगाने में भी कोई हानि नहीं है, अगर रिश्ता ऐसा है कि वो आया और एक इंटर्नल क्लेंजिंग हो गई उससे।

बट इज़ दैट हैपनिंग?

हम जो रिश्ते बना रहे हैं, क्या उनसे भीतर ही कोई लाभ हो रहा है? जिसको हम कहते हैं चेतना का उत्थान — एसेन्शन ऑफ़ कॉन्शसनेस। क्या ऐसा कुछ हो रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये एन्काउंटर्स मुझे भीतर से थोड़ा-थोड़ा और गंदा करके छोड़ जाते हैं? हो सकता है, नहीं भी हो सकता है। मैं नहीं जानता, आपको पूछना पड़ेगा।

एंड इन दिस यू हैव टू लुक एट योरसेल्फ अगेन, इन अ कॉन्शस वे। इसमें वो सब नहीं है कि, गिल्ट और समाज क्या बोलता है, और मैं इंडियन ओरिज़िन की हूँ तो मुझे अपने एक ख़ास "संस्कारी तरीक़ों" से सोचना है। उस सब की कोई ज़रूरत नहीं है। पर हम इंसान हैं, हम कहीं पर भी अपनी एनर्जी लगा रहे हैं, कुछ हम अपने शरीर के और मन के साथ होने दे रहे हैं, तो हमें पूछना पड़ेगा न? एक ही ज़िंदगी है, उसमें भी अभी आप जवान हैं। जवानी तो और छोटे पीरियड के लिए होती है, तो हम उसको किसमें इन्वेस्ट कर रहे हैं? बस ये सवाल है।

इज़ इट रीचिंग द राइट प्लेस? आप यही पूछ रहे थे?

प्रश्नकर्ता: हाँ, यही मैं पूछ रही थी। पर मुझे लगता है कि ऐसा भी हुआ है कि पास्ट में मेरे काफ़ी ख़राब एक्सपीरियंस रहे। तो उसकी वजह से भी मुझे आगे कोई होप ऐसी है नहीं कि किसी के साथ में भी ऐसा कुछ होगा। तो भी मुझे लगता है शायद ये भी रीज़न होगा कि मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है।

आचार्य प्रशांत: फ़र्क़ आपको इसी अर्थ में नहीं पड़ता न कि आप इमोशनली अटैच नहीं होते। यही तो आप कह रही हो न कि इमोशनली अटैच नहीं होते, टाइम तो लग रहा है न।

आप कॉन्शियसली नहीं कह रही हो, "मुझे अटैच होना है"। पर मन बहुत गहरा होता है, मन को आप उतना ही जानते हो जितना आइसबर्ग का हिस्सा बाहर दिखाई देता है 1/10। पुराने जो मन के लिए मॉडल्स भी दिए गए थे, आप अगर उनको याद करेंगे कि कॉन्शियस माइंड कितना होता है? सबकॉन्शियस माइंड कितना होता है? फिर इड, ईगो, सुपरईगो — ये सब मॉडल्स आपने पढ़े होंगे कॉलेज में। उसमें सब में यही था न कि बहुत हमारा छोटा-सा हिस्सा होता है जो हमें पता होता है।

तो मुझे अपने उस छोटे-से हिस्से का पता है कि मैं अटैच नहीं हुई किसी के साथ, पर भीतर ही भीतर कुछ हो गया है, उसका मुझे पता है क्या? थैट्स द क्वेश्चन टू आस्क — डू आइ रियली अंडरस्टैंड व्हैट्स हैपनिंग टू मी ऐज़ अ रिज़ल्ट ऑफ़ दीज़ एसोसिएशन्स? और बिल्कुल हो सकता है कि आप जो कर रहे हैं, वो आपके लिए सबसे अच्छी बात हो। आइ एम नोबडी टू नो राइट नाउ ऑर जज राइट नाउ। पर वो सवाल पूछना पड़ेगा।

सिर्फ़ एक ब्लैंकेट डिक्लेरेशन कि "इससे मुझे कोई फ़र्र्क़ नहीं पड़ रहा है" मेरे ख़्याल से काफ़ी नहीं है। फ़र्क़ पड़ रहा है या नहीं, आपको जाँचना पड़ेगा, शायद पड़ रहा हो। और फ़र्क़ नहीं भी पड़ रहा है, तो टाइम लग रहा है। वो भी जाँचना पड़ेगा कि जितना टाइम, जितनी एनर्जी लग रही है, वो किसी और चीज़ में लग सकती थी क्या? शायद लग सकती थी, शायद नहीं लग सकती थी, पता नहीं।

बी मोर कॉन्शियस। आस्क मोर क्वेश्चन्स। बी मोर डिटैच्ड टुवर्ड्स योरसेल्फ — व्हैट्स गोइंग ऑन। यही पूछिए बार-बार। जब आप एक डिसीजन लें, पूछिए कि व्हाट एक्सैक्टली वेंट इंटू द डिसीजन? मैंने क्या सोचकर के "हाँ" बोला है?

क्या? मैं बोल तो रही हूँ कि कोई इमोशनल एंगल नहीं है, कोई डिज़ायर नहीं है, तो ये "हाँ" कहाँ से आ रही है फिर? ये सब और ये सब किसी पर्पज़ से नहीं करना है। ये मैं आपको इसलिए नहीं बोल रहा हूँ कि आप जो कर रही हैं रुक जाए। हो सकता है कि आप जैसे जा रही हैं, वही सबसे अच्छा हो आपके लिए, पर हमें पता होना चाहिए। जो भी हो रहा है, मुझे पता होना चाहिए कि क्या हो रहा है।

ठीक है?

प्रश्नकर्ता: जी।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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