प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सेक्स (संभोग) की सामाजिक अस्वीकृति को लेकर ग्लानि का अनुभव होता है। कृपया मार्गदर्शन प्रदान करें।
आचार्य प्रशांत: अगर तुमको लाज ही आती है, शर्म ही आती है, तुममें अपराध भाव ही उठता है, तो अपराध भाव तुममें उठना चाहिए तब, जब तुम किसी का इस्तेमाल देह की तरह करो। एक गलती तो कर ही बैठे हो, वो गलती है, ‘मैं देह हूँ।’ और अब उस गलती के ऊपर दूजी गलती करोगे कि तू देह है। और पहली गलती कर दो तो दूसरी तुरंत हो भी जाती है। तो अगर किसी बात को तुम अपराध या पाप ही कहना चाहते हो तो पाप है अपने को देह समझना और उसके पश्चात दूसरे को भी देह मानना। जब तुम दूसरे को देह मानते हो, तब तुम सेक्स नहीं बलात्कार करते हो। बात समझ में आ रही है?
इस बात पर शर्म खाया करो। बहुत प्रेमी हैं, वो कहते हैं, ’वी आर मेकिंग लव’ (हम प्यार कर रहे हैं)। सेक्स करने को कहते हैं, ‘वी आर मेकिंग लव।’ पर वो कुछ नहीं होता, एक-दूसरे की देह भोग रहे हैं। ‘मैं भी देह, तू भी देह’, और भोगा-भोगी चल रही है। ये पाप हो गया। ये पाप है, चाहे ये शादी से पहले हो, या शादी के बाद हो। शादी से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। तुमने विधिवत विवाह किया हो, अग्नि के तुमने सात की जगह चौदह फेरे लिये हों, उसके बाद भी अगर तुम अपनी पत्नी को सिर्फ़ भोग की वस्तु समझते हो, तो ये बलात्कार ही है, और ये पाप ही है।
तुम हो सकता है दो बच्चों के अब्बा हो, लेकिन बीवी को ऐसे ही देखते हो कि बस ये है बिस्तर गर्म करने की मशीन, तो ये पाप है। इसमें बात शादी की नहीं है, इसमें बात दृष्टि की है। तुम दूसरे व्यक्ति को देख कैसे रहे हो? और मैंने कहा कि जब तुम अपनेआप को देह मानते हो तो दूसरे को देह मानना तुम्हें बड़ा सहज लगता है। दूसरे का इस्तेमाल भोग्य पदार्थ की तरह करना छोड़ो। वही पाप है।
प्र: आचार्य जी, आपने बताया था कि शरीर को सिर्फ़ भोजन, सेक्स और नींद की ज़रूरत होती है। तो प्रेम की ज़रूरत किसे होती है?




