हमारी धार्मिकता तो ये है कि बोल दिया, चुपचाप मान लो और जैसा कहा जाए, करो। समझो, समझाओ, जानो तब मानो — ये तो धर्म में चलता ही नहीं है। तो धर्म ने बिना समझाए आपको बोल दिया है कि ये छी!छी! चीज़ है, छिच्छी! और ये होने मत देना। धर्म ने तो बोल दिया, ‘होने मत देना’, पर वो होकर रहेगी। और जब होकर रहेगी तो आप क्या हो जाओगे? शर्मसार, आप अपराध भाव से भर जाते हो। और जैसे ही अपराध भाव से भरते हो, आपको लग जाता है आप गुनहगार हो, आप लज्जित हो जाते हो।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। अपोजिट सेक्स (विपरीत लिंगी) से जब अट्रैक्शन, बातचीत करने का बिंदु आता है तो हम शेमफुल (शर्मिंदगी) क्यों फील (महसूस) करते हैं? इतना कि जब रियल (वास्तव) में मैंने किसी से बात की तो अपनी एक्चुअल फीलिंग (वास्तविक भावना) बताने की जगह आपकी वीडियोज़ या गीता की बातें कन्फेस कर दीं। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: नहीं! अच्छा ही है! एक्चुअल फीलिंग क्या था, वो बताकर कचरा ही डाल देते दूसरे के ऊपर। वो एक्चुअल फीलिंग क्या होती है, वो तो ऐसे ही बस! खैर जो भी है!
शेमफुल क्यों फील करते हैं? उसमें ज़्यादा बड़ा हाथ ये जो रिलीजियस मोरैलिटी (धार्मिक नैतिकता) है, सोशल मोरैलिटी (सामाजिक नैतिकता), उसका है। धर्म का नहीं, धर्म के ठेकेदारों का है।
देखो, किसी मज़बूत इंसान को अगर काबू में लाना हो न, उसे ये अहसास करा दो कि वो गुनाहगार है। उसके भीतर की सारी ताकत मर जाती है, वो खुद-ब-खुद आपके सामने झुक जाता है।




