प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अभी जैसा आपने बताया कि आप एक वुमन (महिला) होने से पहले एक कॉन्शियसनेस (चेतना) हैं, तो ये बात मेरे दिमाग में बैठ गयी है। मेरे मन में बहुत शुरू से ही चीज़ें आती थीं कि घर में खाना हम ही क्यों बनायें हमारे हसबैंड (पति) क्यों नहीं बना सकते। ऐसा है कि हम शुरू से ही देखते आये हैं कि घर में या फिर अपने इन लॉज़ (ससुराल वालों) के यहाँ जो घर का काम करती हैं वो औरतें ही करती हैं और अगर औरतें जॉब भी कर रही हैं तब भी घर की सारी रिस्पॉन्सिबिलिटीज़ (ज़िम्मेदारियॉं) उनकी ही होती है। मेरे साथ भी ऐसा ही था, मैं जॉब करती थी और सारी घर की रिस्पॉन्सिबिलिटी (ज़िम्मेदारी) भी मेरी ही थी। जॉब मैंने इसलिए छोड़ा क्योंकि मुझे बर्डन (बोझ) लगता था।
मुझे बाहर का भी करना पड़ता था और घर का भी करना पड़ता था। मैंने चार साल पहले जॉब छोड़ी है — तो मेरे अन्दर एक बहुत ज़्यादा अजीब सा डिप्रेशन (अवसाद) आ गया है, फिर मैंने आपके वीडियोज़ देखना शुरू किये तो मुझे समझ में आया कि शायद मेरे डिप्रेशन का एक ही कारण है, क्योंकि मैं कुछ भी सार्थक काम नहीं कर रही।
तो फिर उसके बाद मुझे लगने लगा कि मुझे कुछ तो ऐसा करना चाहिए जिससे मेरा जीवन अर्थपूर्ण हो। ऐसा लगे कि हाँ, मैंने कुछ तो किया! और असल में मुझे ऐसा लगता है कि परेशानी जॉब की भी नहीं है क्योंकि जॉब तो मैं कर ही रही थी चार साल पहले तक, लेकिन हैप्पीनेस (ख़ुशहाली) तो तब भी नहीं थी।
तो मुझे ऐसा लगता है कि परेशानी जो है वो एक केज (क़ैद) की है, जो एक सिस्टम (प्रक्रिया) है, उसकी है। उसमें, घर में आपको ये करना है, आपको ये कहना है, आपको ये करना है फिर




