ये जो पारंपरिक बात रही है कि अध्यात्म के साथ-साथ कामवासना क्षीण हो जाती है, वो बात अपनी जगह बिलकुल ठीक है। लेकिन उसमें यह बात भी है कि फिर आपकी वासना, आपके मूल्यों का एक प्रतिबिम्ब बन जाती है, एक उद्घोषणा बन जाती है कि मुझे क्या चीज़ पसंद है। पहले आप एक साधारण आदमी थे, जिसके साधारण बल्कि निम्न तल के मूल्य थे। तो उसी तल का आप कोई साथी भी चुन लेते थे। आध्यात्मिक व्यक्ति चूँकि ऊँचाइयों का प्रेमी होता है, उच्चता का। तो इसीलिए वो फिर सेक्स (संभोग) को एक साधारण मनोरंजन की तरह नहीं इस्तेमाल करता।
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प्र: आचार्य जी, एक प्रश्न और था मेरा। जैसे कोई ग्रस्त है अगर, तो अभी वो अध्यात्म की तरफ़ चलना शुरू कर दिया है। तो जो ये शरीर से सम्बन्धित जितने भी क्रिया हैं, मान लीजिए कामवासना है, सेक्स (संभोग) है। तो उसका एक गृहस्थ के जीवन में क्या स्थान रहता है? जैसे मैं अपना ही आपको दे देता हूँ उदाहरण। जैसे आपको सुनना शुरू किया है, तो मैंने थोड़ा सा कामवासना को अवॉइड करने की कोशिश करी। तो अब पत्नी की तरफ़ से फिर विरोध आ जाता है। उसको यह लगता है कि भई, पकड़ जो है, अब ढीली हो रही है, तो किसी और तरीक़े से कोशिश करती है पकड़ को मज़बूत करने की।
आचार्य: देखो, अध्यात्म का मतलब होता है बेहतरी, ऊँचाई इसकी ओर बढ़ना।
तो सीधा सा सवाल जो आपका है कि आध्यात्मिक आदमी की ज़िंदगी में सेक्स बचता है कि नहीं? और वो करता है तो किसके साथ, कैसे, कब, कहाँ, ये सब?
ये जो पारंपरिक बात रही है कि अध्यात्म के साथ-साथ कामवासना क्षीण हो जाती है, वो बात अपनी जगह बिलकुल ठीक है। लेकिन उसमें यह बात भी है कि फिर आपकी वासना, आपके मूल्यों का एक प्रतिबिम्ब बन जाती है, एक उद्घोषणा बन जाती है कि मुझे क्या चीज़ पसंद है। पहले आप एक साधारण आदमी थे, जिसके साधारण बल्कि निम्न तल के मूल्य थे। तो उसी तल का आप कोई साथी भी चुन लेते थे। आध्यात्मिक व्यक्ति चूँकि ऊँचाइयों का प्रेमी होता है, उच्चता का। तो इसीलिए वो फिर




