शरीर की निर्मिति ही ऐसी है कि वासना इसे सताएगी, वासना के बीज इसी में मौजूद हैं। शरीर को आराम दे दो, रोटी दे दो और इसे सेक्स दे दो, इसके अलावा इसे कुछ नहीं चाहिए। जीवन के पल-पल को ऊँचे-से-ऊँचे काम से परिपूर्ण रखो। कोई भी ऐसा काम जिसमें स्वार्थ न हो, जिसमें करुणा हो, रचनात्मकता हो, संगीत हो — ये सब ऊँचे काम हैं। खाली मत रहो, जो खाली होगा, वही फँसेगा।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरे मन में सेक्स से संबंधित बहुत विचार आते हैं तो फिर इनको कैसे कम करें या काबू में करें?
आचार्य प्रशांत: ज़िंदगी यूं ही छोटी है उसमें किसी ऐसे काम के लिए तुम समय कहाँ से निकाल रहे हो जो तुमको पता है कि थोड़ी देर की उत्तेजना के अलावा तुम्हें कुछ नहीं देगा? समय यूं ही कम है तुम्हारे पास, उसमें से भी तुमने समय थोड़ी देर के मसाले को दे दिया अब क्या होगा? समय और कम बचेगा न।
सेक्स में कोई बुराई नहीं थी अगर उससे तुमको मुक्ति मिल जाती। मैं सेक्स के माध्यम से कह रहा हूँ। अगर सेक्स के माध्यम से तुमको तुम्हारे दुखों से, तुम्हारे बंधनों से मुक्ति मिलती होती तो मैं कहता तुम सेक्स के अलावा कुछ करो ही मत, तुम दिन-रात अपनी वासना को ही पूरी करने में मग्न रहो। लेकिन ऐसा होता है क्या?
अरे, सब यहाँ वयस्क बैठे हुए हैं, प्रौढ़ हैं, चढ़ी उम्र के लोग हैं, सब अनुभवी हैं कुछ बोलिए, ऐसा होता है कि तुम जो यौन कृत्य होता है उसमें पचास बार संलग्न हो जाओ, कि पाँच-सौ बार, कि पाँच-हज़ार बार ऐसा होता है कि अब अंत आ गया, अब इसके बाद किसी उत्तेजना की कोई आवश्यकता नहीं, पार पहुँच गए, ऐसा होता है? या ऐसा होता है कि जो अधूरापन पहली बार था, जो अधूरापन बीसवीं बार था, जो अधूरापन दो-सौवीं बार था वही अधूरापन अब भी है। तो कभी-न-कभी तो तुम्हें इमानदारी से इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा न कि यहाँ बात बन नहीं रही है, इस दुकान का माल खरा नहीं है, बहुत आज़मा लिया यहाँ।




