प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अभी क्षमा की बात चल रही है तो मेरे पास एक कॉन्फेशन (पाप स्वीकरण) है करने के लिए। आचार्य जी, दिसम्बर दो-हजार-इक्कीस के सत्र में आया था मैं ऋषिकेश में, तो तब मैंने एक जिज्ञासा की थी सेक्स सम्बन्धित। तब मेरा अनुभव नहीं था उसका, तो आपने समझाया था कि जैसे खाने से तुम मुक्त नहीं हो सकते तो उससे भी तुम मुक्त नहीं हो सकते।
तो तब मेरा समाधान हो गया था। पर अगले दो-तीन महीनों में कुछ परिस्थितियाँ ऐसी हुईं कि मैं एक लड़की से मिला और उसके बहुत क़रीब आ गया और हमारे बीच सेक्स सम्बन्ध भी बने। पर उसके बाद मुझे बहुत बुरा लगा, बहुत ग्लानि का अनुभव हुआ कि सब सही-सही आपने बताया था फिर भी मैं फिसल गया।
और फिर उसी वक़्त आपने यह भी बोला था कि जो आप होकर करते हो, वही आप और हो जाते हो। तो मुझे यह लगा कि मैंने तो कितना बड़ा इसके साथ ग़लत किया। मैं एक अच्छे तल से, एक अच्छे तरीक़े से रिश्ते की शुरुआत कर सकता था लेकिन काफ़ी निचले तल पर शुरू किया।
पर मैंने सम्बन्ध स्थापित करने से पहले और बाद में भी उसे बता दिया था कि मैं इस वजह से क्लोज़ (करीब) आ रहा हूँ लेकिन फिर मैंने देखा कि वह इतनी भोली है कि उसको कुछ एहसास नहीं हो रहा है। और वो उल्टा मुझे ही समझा रही है कि सब ठीक है।
तो बात सेक्स की नहीं है बात यह है कि आपने मुझे समझाया था उसके बाद भी मैंने उसका उल्लंघन किया। मैं ख़राब शिष्य रहा।
आचार्य: यू हैव बीन अ बैड स्टूडेंट नॉट बिकॉज़ यू वॉयलेटेड बट बिकॉज़ यू नेवर अंडरस्टुड इन द फर्स्ट प्लेस (तुम ख़राब शिष्य इसलिए नहीं हो कि तुमने कुछ उल्लंघन किया, पर इसलिए क्योंकि सबसे पहले तो तुमने समझा ही नहीं बात को)। बैठो भाई!




