कोई होगा बहुत ऊँचा, उसको बोलो "अपनी ऊँचाई अपनी जेब में रखे। हमारे पास हमारी ज़िंदगी है, हमारा दुख है और हमें बेहतर होना है।" श्रीकृष्ण कहते हैं कि "योग: कर्मसु कौशलम्" माने बेहतर काम चुनूँगा और उस बेहतर काम को रोज़, क्रमशः बेहतर तरीक़े से करूँगा, क्योंकि कोई चमत्कार नहीं होता। अचानक से उड़कर के, छलांग मारकर कोई ऊँचाई तक नहीं पहुँच सकता। सीढ़ी दर सीढ़ी, लगातार ऊपर चढ़ते हुए ही उत्कृष्टता हासिल करनी पड़ती है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, ईर्ष्या तो मुझे होती है, पर ईर्ष्या मुझे आपसे ही होती है। आपसे माने, अभी जो आचार्य प्रशांत हैं, उनसे नहीं। जो आप बहुत बार गीता सत्रों में कहते हो कि "मैंने 27 की उम्र में सब छोड़-छाड़ के मैंने अपना अद्वैतप्रशांत फाउंडेशन की स्थापना कर ली थी।" तो मैं ख़ुद को देखता हूँ, तो मैं किसी भी बात में उत्कृष्ट नहीं हूँ।
ना मैं ठीक से हिंदी बोल पाता हूँ कभी, ना ही ठीक से अंग्रेज़ी। तो बहुत बार मुझे एहसास होता है, कि ईर्ष्या होती है मतलब बहुत ज़ोर से। तो हर जगह मैं ख़ुद को देख रहा हूँ, तो ख़ुद से ही मतलब घृणा ही आ रही है। और फिर आपको देख रहा हूँ, तो ईर्ष्या का साइकिल चालू ही रह रहा है।
आचार्य प्रशांत: तो तुम मुझे देखते रह जाओ, मैं थोड़ी तुम्हें देख रहा हूँ। मैं दौड़ लगा रहा हूँ, तुम मुझे देखते रहो तुम और पीछे होते जाओगे, कुछ समय बाद मैं दिखना भी बंद हो जाऊँगा।
बात युवावस्था की है आज की नहीं है। ये अपना चुनाव होता है कि और बेहतर होते जाना है या नहीं होते जाना है, आपको तय करना है ना। मुझे क्या देख रहे हो? मेरा पूरा दिन अपने आप को चुनौती देने में बीतता है, और बेहतर होने में बीतता है। मैं अतीत की ओर देखता हूँ, तो मुझे सौ, पाँच सौ, हज़ार बातें दिखाई देती हैं, जिनमें न जाने अभी कितना दोष है। उनको और ठीक करके, शुद्ध करके, बेहतर बनाया जा सकता है, और वो रोज़ हो रहा है।




