
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, ईर्ष्या तो मुझे होती है, पर ईर्ष्या मुझे आपसे ही होती है। आपसे माने, अभी जो आचार्य प्रशांत हैं, उनसे नहीं। जो आप बहुत बार गीता सत्रों में कहते हो कि "मैंने 27 की उम्र में सब छोड़-छाड़ के मैंने अपना अद्वैतप्रशांत फाउंडेशन की स्थापना कर ली थी।" तो मैं ख़ुद को देखता हूँ, तो मैं किसी भी बात में उत्कृष्ट नहीं हूँ।
ना मैं ठीक से हिंदी बोल पाता हूँ कभी, ना ही ठीक से अंग्रेज़ी। तो बहुत बार मुझे एहसास होता है, कि ईर्ष्या होती है मतलब बहुत ज़ोर से। तो हर जगह मैं ख़ुद को देख रहा हूँ, तो ख़ुद से ही मतलब घृणा ही आ रही है। और फिर आपको देख रहा हूँ, तो ईर्ष्या का साइकिल चालू ही रह रहा है।
आचार्य प्रशांत: तो तुम मुझे देखते रह जाओ, मैं थोड़ी तुम्हें देख रहा हूँ। मैं दौड़ लगा रहा हूँ, तुम मुझे देखते रहो तुम और पीछे होते जाओगे, कुछ समय बाद मैं दिखना भी बंद हो जाऊँगा।
बात युवावस्था की है आज की नहीं है। ये अपना चुनाव होता है कि और बेहतर होते जाना है या नहीं होते जाना है, आपको तय करना है ना। मुझे क्या देख रहे हो? मेरा पूरा दिन अपने आप को चुनौती देने में बीतता है, और बेहतर होने में बीतता है। मैं अतीत की ओर देखता हूँ, तो मुझे सौ, पाँच सौ, हज़ार बातें दिखाई देती हैं, जिनमें न जाने अभी कितना दोष है। उनको और ठीक करके, शुद्ध करके, बेहतर बनाया जा सकता है, और वो रोज़ हो रहा है।
कोई ऐसा थोड़ी है कि वो 27 साल पहले ही हो रहा था, या 27 की उम्र में ही हो रहा था। और 27 की उम्र में मैंने क्या छोड़-छाड़ दिया था? कुछ नहीं छोड़-छाड़ दिया था, मैं और बेहतर दिशा में चल पड़ा था। कॉरपोरेट से बेहतर कुछ दिखाई दिया था, मैंने वो करा। छोड़ा क्या है?
आज भी मुझसे जो हो रहा है, उससे बेहतर जो हो सकता है, उसको करता हूँ, उसकी ओर बढ़ता हूँ। वही तब भी किया था। जो तब किया था, वही आज भी कर रहा हूँ पर हमारी आदत होती है, चीज़ों को, जीवनों को नाटकीय बनाकर देखने की। हम नौटंकी पसंद लोग हैं न, तो कुछ ड्रामैटिक न भी हो तो भी उसको हम ड्रामैटिक बना देना चाहते हैं।
कुछ नहीं था। लगातार एक आदमी कदम दर कदम चल रहा है, और चलते-चलते वो पहाड़ में एक ऊँचाई पर पहुँच गया। तुम उससे आगे पूछ रहे हो, "बताओ, बताओ तुमने वो छलांग कैसे मारी? नीचे से अचानक उड़ कर के तुम यहाँ कैसे आ गए?" और वो अभी भी सीढ़ी दर सीढ़ी ही ऊपर चढ़ रहा है।
पर आप बार-बार यह बोलते हो, "नहीं, सब कुछ छोड़छाड़ करके अचानक,” चीज़ को ऐसा बना दो कि लगे फ़िल्मी है बिल्कुल! क्या फ़िल्मी है? एक सीढ़ी चढ़ना फ़िल्मी बात है? बहुत नाटकीय बात है? बहुत बड़ी बात है? और वो सीढ़ी जो तब चढ़ रहा था, वही आज भी चढ़ रहा हूँ। उसमें क्या ऐसा है कि कहते हो कि बहुत बड़ा हो गया कुछ, कुछ नहीं बहुत बड़ा हो गया। ये तो अपना दिली प्यार होता है श्रेष्ठता के प्रति, उत्कृष्टता के प्रति। अगर जो आप हो, उससे बेहतर कुछ संभव है तो क्यों न हुआ जाए? क्यों न हुआ जाए?
मैंने 40 की उम्र में टेनिस खेलना शुरू करा। जिस कोच के साथ मैं आमतौर पर खेलता हूँ, मुझे अभी बीच में लगा कि उसके साथ ठहराव आ गया है, एक स्तर से ऊपर बात नहीं बढ़ रही है। तो आज, अभी आपके पास आने से पहले, एक दूसरे कोच के साथ बैकहैंड कर रहा था। वही तो ख़ुद को चुनौती देने की बात है।
आप देखते रहोगे, देखते रहोगे दो साल बाद आपको पता चलेगा, कि मैं टूर्नामेंट खेल रहा हूँ, वेटरंस टूर्नामेंट। फिर बोलना, "मैं देख रहा हूँ।" तो आप देख क्यों रहे हो? आप भी आगे बढ़ो। मुझे क्या देख रहे हो? देख लिया न कि क्या? अपना काम करो न। मुझे पकड़ कर क्या करोगे? वैसे ही बना दोगे कि "ये हैं अच्छे आदमी या महान आदमी हैं गुरुदेव हैं, इनकी पूजा करो।" तुम्हें अपनी ज़िंदगी जीनी है न?
होगा कोई बहुत ऊँचा, उसको बोलो अपनी ऊँचाई अपनी जेब में रखे। तुम्हें तो अपनी ज़िंदगी से और अपने दुख से मतलब होना चाहिए न? कोई आकर के बोले कि "मैं हिमालय पर गया था और वहाँ पर मुझे भगवान का वरदान मिल गया, और अब मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ, मैंने इतनी उम्र में घर छोड़ दिया, मैंने ये कर दिया, मेरे पास चमत्कारिक सिद्धियाँ हैं।" जो कुछ है अपनी जेब में रखो। हमारे पास हमारी ज़िंदगी है, हमारा दुख है, और हमें बेहतर होना है।
हमें बेहतर होने के लिए, अगर तुम रोशनी दिखा सकते हो, हौसला दिखा सकते हो, तो ठीक है। नहीं तो हमारे ऊपर चढ़ो मत अपनी महानता दिखा-दिखा के। पर ये चमत्कार की नहीं बात होती, ये बहुत छोटी-छोटी चीज़ों की बात होती है। बहुत छोटी चीज़ें। ये एक जीने का तरीक़ा है कि जहाँ कहीं भी मैं जो कुछ भी कर रहा हूँ, या तो करूँगा नहीं, या करूँगा तो उसमें लगातार और बेहतर और बेहतर होता रहूँगा। या तो छोड़ ही दो और किसी चीज़ में दिल लगाया है, तो उसमें बेहतर हो जाओ।
अहंकार क्या है? एक सीमा। है न? एक सीमा। बार-बार हम बोलते हैं — अपूर्णता का नाम है अहंकार, अपूर्णता। अपूर्णता माने समझ रहे हो? वो जहाँ कहीं भी होता है, पूरा कभी कुछ नहीं होता। वो पेपर देने जाएगा, पूरा नहीं कर पाएगा। उसे कोई काम दो, वो पूरा नहीं कर पाएगा। व्यावहारिक अर्थ पर ये आशय है अहंकार की अपूर्णता से, उसका सब कुछ अपूर्ण ही अपूर्ण होता है। उसको बोलो, अपनी टू-डू लिस्ट दिखाओ। कितना काम कर दिया? अपूर्ण है। ये अहंकार है।
अपूर्ण — एक इनकम्प्लीटनेस। अच्छा, अपने रिश्ते दिखाओ कैसे हैं? सब रिश्ते अपूर्ण हैं। किसी भी रिश्ते में पूर्णता कुछ नहीं है। ये है अहंकार। अच्छा, क्या करते हो? अच्छा, पेंटिंग करते हो? कैसी है तुम्हारी पेंटिंग? आधी-अधूरी। ज़िंदगी आधी-अधूरी, ये अहंकार है। अहंकार की अपूर्णता कोई बस कॉन्सेप्ट नहीं है, वो ज़िंदगी में हर चीज़ में दिखाई देता है। जो अहंकार का विषय है, उसके हर विषय से, उसके संबंध में तुम्हें इनकम्प्लीटनेस ही दिखाई देगी। कम्प्लीट करो न।
अब ज़िंदगी में आपके एक विषय अगर आ गया है, कोई भी विषय आ गया है। टेनिस विषय आ गया है, तो अपनी वहाँ पर जो अपूर्णता है और जो सीमा है, मैं उसको क्यों न रोज़ चुनौती दूँ? मैं टेनिस के माध्यम से अहंकार को चुनौती दे रहा हूँ। क्योंकि अहंकार, वो जो किसी छिछोरी सतह पर भी ख़ुद को संतुष्टि देना जानता है। ये 10 में से 4 नंबर भी आ रहे हैं, तो ख़ुद को बोल देगा, "ठीक तो है, अब इतनी उम्र हो गई, इससे बेहतर क्या खेलोगे?" नहीं! और बेहतर करना है, और बेहतर करना है, और बेहतर करना है!
बात टेनिस की, या गिटार की, या नौकरी की, या जो भी आप काम करते हो, उसकी नहीं है बात। बात उस काम के माध्यम से अहंकार को चुनौती देने की है। क्योंकि अहंकार वो जो अधूरेपन में भी अपने को सांत्वना दे लेता है, कि "ठीक है, अधूरे हैं तो भी यहाँ रुक जाओ, अधूरेपन में सुरक्षा तो है।” नहीं। आग जलनी चाहिए न। कल क्या बोल रहे थे श्रीकृष्ण? कि —
असली आदमी वो है जो निरग्नि नहीं है। आग होनी चाहिए।
आग किसके खिलाफ़? क्या जला दोगे? रैकेट जला दोगे? क्या जलाना है? अपनी कमजोरी को जलाना है। और ये रोज़ का काम होता है। बैठे हो, अपनी कमज़ोरियाँ जानते हो। जिस भी क्षेत्र में हो, पहले तो क्षेत्र सही चुनो फालतू चुनना नहीं चाहिए। किसी भी काम में फालतू हाथ डालना क्यों है, बेकार में दुनिया में 10 अरब तरह के काम हो सकते हैं — मैं उन्हें छुऊँ ही क्यों? पर जिस काम को छुआ है, उसमें उत्कृष्टता चाहिए।
गीता को आप अध्यात्म की तरह देखते हो, कोई यह भी कह सकता है एक्सीलेंट लिटरेचर है — तो श्रीकृष्ण माने एक्सीलेंस। उनके लिए है ही नहीं श्रीकृष्ण, जिनको 10 में से 2 नंबर पर भी चैन मिल जाता है। 10 में से 2 नंबर पर आग लग जानी चाहिए!
निठल्ले हैं, उछल्ले हैं, फिसड्डी हैं, दो हड्डी हैं। रोका है, टोका है, हवा का झोंका है, सब ठीक ही है। क्या करने जा रहे हो? "गीता पढ़ने जा रहे हैं।" भग! विवेकानंद ने ऐसों के लिए ही कहा था — वो एक आया था उनके पास, ऐसे ही हवा का झोंका, गिरता-पड़ता कहीं से आ गया वो, गिरता-पड़ता नहीं उड़ता। बोला, "गीता पढ़ेंगे।" कुछ हो रहा होगा, शाम का समय होगा। ये जितने सब थे मॉन्क्स होते थे, ये फ़ुटबॉल वग़ैरह अपना शाम को। तो बोले, "जाओ, पहले तुम फ़ुटबॉल खेलो, थोड़ा तगड़े हो जाओ, खाओ-पियो, शरीर बनाओ, उसके बाद तुम्हें गीता बताएँगे।"
लोग हैरत में हैं बोल रहे हैं, "यह क्या कर रहे हो तुम? फ़ुटबॉल को गीता से ऊपर रख रहे हो?" लोगों को बात नहीं समझ में आई। हर क्षेत्र में आदमी जो फिसड्डी हो, पिछड़ा हो और अपने पिछड़ेपन को चुनौती भी न दे रहा हो — अर्जुन कौन थे? सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे न? तब उन्हें गीता मिली।
आप कुछ तो सर्वश्रेष्ठ हो जाओ। कुछ नहीं साधारण दुकान करते हैं, क्लर्क हैं या कहीं मैनेजर हैं, ऑफिसर हैं, कुछ हैं। क्या करते हो? कुछ बदल रहे हो? बताओ, आज के दिन तुमने कौन-सी चीज़ सीखी? कौन से पुराने काम में बेहतर हुए, बताओ? नहीं, कुछ नहीं जैसे चलता था 10 साल पहले, वैसे ही आज भी चला रहे हो।
बहुत से लोग तो ऐसे होते हैं कि वो जो काम कर रहे हैं, उस काम से संबंधित नई टेक्नोलॉजी भी आ जाए बाज़ार में, तो वो पुराने ही तरीक़े से चलना चाहते हैं। कहते हैं, "नहीं, नई वाली चीज़ हमें पसंद नहीं है।" गृहिणियाँ होती हैं, उन्हें पता भी चल जाए कि अब रिसर्च हो चुकी है कि भारत में जो खाना बनता रहा है पारंपरिक तौर से, वो हृदय रोगों का और मधुमेह का बड़ा कारण है — तो रसोई में तुम्हारी माँ जो बनाती थी, वो बनाना तुम बंद करो। वो वही बनाएँगी।
मैं यह नहीं कह रहा कि रसोई में एक्सॉटिक रेसिपीज़ होनी चाहिए। पर भाई, आप अगर खाना ही बनाती हो, और अब आपको पता चल रहा है कि आप जो बनाती हो वह सेहत के लिए गड़बड़ है, तो कम से कम उसको बेहतर बनाओ न। वो भी नहीं बदलना होता। किसी भी काम में श्रेष्ठता लानी ही नहीं है, तो क्या होगा? बस मंजीरा बजाओगे, क्या करोगे? श्रीकृष्ण मिल जाएँगे?
पर लोकधर्म माने यही, लोकधर्म तुमसे पूछता ही नहीं है कि तुम किस औकात के आदमी हो। कहते हैं, बैठ जाओ तुम मंजीरा बजाओ और बाबाजी का चरणामृत पियो, तो मोक्ष पा जाओगे।
अच्छा बताओ, अब वही युद्ध-स्थल है और एक वो ढाई रुपए वाला प्यादा — वो जो उल्टे कटोरे यहाँ (सिर पर) हेलमेट की तरह लगाकर लड़ते थे, सैनिक। बी.आर. चोपड़ा की महाभारत में। ऐसा एक आता, और श्रीकृष्ण बैठे हुए हैं पार्थसारथि के रूप में। और वो कहता — "एक्सक्यूज़ मी, मुझे एक एक्ज़िस्टेंशियल डाउट आ गया है। मेरा फूफा, जीजा और सौतेला भाई उस तरफ़ है, मैं उससे क्यों लड़ूं?" वही स्थिति जो अर्जुन। तो श्रीकृष्ण क्या उसे गीता सुनाते?
"भाग यहाँ से, कटोरा!"
चलो कटोरे हैं हम, कोई बात नहीं। हम सभी किसी न किसी अर्थ में कटोरे हैं। पर कम से कम तरक्की तो करो रोज़ाना। चलो ठीक है बेहोशी थी, परिस्थितियाँ थीं, संयोग थे, परवरिश थी, जो भी था। प्यादे ही रह गए, कटोरे ही रह गए। पर अब गीता आ रही है, कम से कम अब कटोरे मत रहो। रोज़ थोड़ा-थोड़ा-थोड़ा-थोड़ा और बेहतर होते चलो।
और काम बड़ी खास बात होती है भाई। काम दिन में बहुत 10 घंटे, 15-15 घंटे करते हो। काम में अपने जो बेहतर नहीं हो रहा उसको तो गीता एकदम ही नहीं मिलने की। काम में लपड़गंजू और चाहिए भगवद्गीता, ऐसे नहीं होता। और सबके लिए नहीं है, ये तो साहब भी बता गए थे: क्या?
“हाथ सुमरनी, पेट कतरनी, पढ़त भगवत गीता।"
तो क्वालिफिकेशन, पात्रता की शर्त तो लगी हुई है और आज से नहीं, पहले से ही लगी हुई है।
मैं आपके सामने आकर के इसलिए अपना दिल खोल कर रख पाता हूँ, क्योंकि पूरे दिन मैंने संघर्ष किया होता है। मैं कुरुक्षेत्र में ही हूँ। मैं दिनभर जाकर के कहीं ऐय्याशियाँ काटूँ, तो यहाँ आकर कुछ नहीं बोल पाऊँगा। मैं दिनभर जाकर के इधर-उधर सिर पटकता हूँ, और जिन युद्धों में हूँ, उन सबका तो मैं आपसे खुलासा भी नहीं कर सकता। क्योंकि धीरे-धीरे करके आप उस स्थिति में आ रहे हो जहाँ आप समझ पाओगे कि जीवन-संघर्ष का अर्थ क्या होता है। धीरे-धीरे आ रहे हो, धीरे-धीरे समझोगे।
पर अभी के लिए इतना ही जान लो कि अभी यहाँ से निकलूँगा, तब से लेकर के अगले सत्र में आपके सामने आऊँगा, तब तक मैं लडूँगा ही। और चूँकि मैं ख़ुद लड़ता हूँ, इसीलिए लड़ाई के मैदान में जो गीता कही गई, उसे मैं आप तक ला पाता हूँ। मैं यहाँ से जाकर लड़ जाता हूँ, आप यहाँ से जाकर पड़ जाते हो।
“तेरा मेरा मनवा कैसे एक होई रे।”
गीता क्या है? कोई स्कूल का सिलेबस है? क्या है? ऐसे ही बस एक किताब भर है? वो जीने का एक प्रज्वलित तरीक़ा है। वो जीने का एक नया, सुंदर केंद्र है — जीने का। तो ज़िंदगी में कुछ बेहतर करना पड़ेगा ना। और ज़िंदगी ऐसे ही पकड़े रहोगे जैसी है? वैसे ही ढाक के तीन पात? बहुत सारे मुहावरे: "मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक," कि जैसा चल रहा था, फ्रॉम पोस्ट टू पिलर सब वैसा ही चल रहा है।
और एक के बाद एक अध्याय पूरे हो गए, छठा भी शुरू हो गया। इधर रूमी भी आ गए हैं। ये सब अपना बीतता जा रहा है, बीतता जा रहा है, सब बीतता जा रहा है। हम वैसे के वैसे ही खड़े हुए हैं। तुम कब बीतोगे? हमें तुम्हारे गुज़रने का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार है। खुशखबरी सुनाओ, क्या? झुन्नू लाल गुज़र गए। अरे गुज़र मत जाना, मुझे बड़ा खटका लगा रहता है। गुज़रने से मतलब है — नया हो जाना, कुछ कर मत लेना।
थोड़ा व्यवहारिक होकर सोचो, तुम क्या करोगे? बेहतर होने के लिए क्या करोगे? तुम बेहतर होने के लिए, अब अटलांटिक समुद्र तो तैर के पार करोगे नहीं, या करोगे? उसी में तो बेहतर होओगे ना, जो अभी तुमने चुन रखा है। उसमें दो तरह की बेहतरी होती है: कि जो चुन रखा है वो चुनाव ही बेहतर कर लो, कि काम ही ढंग का चुना। और दूसरा, अगर ढंग का काम चुन रखा है तो उसमें और श्रेष्ठता दिखाओ।
"योग: कर्मसु कौशलम्।" यही तो दो बातें होती हैं। बेहतर काम चुनूँगा और उस बेहतर काम को बेहतर तरीक़े से करूँगा।
बस, यही दो बातें होती हैं। तो जो भी काम कर रहे हो उसमें और बेहतर हो के दिखाओ ना; रोज़-रोज़, थोड़ा-थोड़ा, इंक्रीमेंटली। कोई चमत्कार नहीं होता। फिर कह रहा हूँ, कोई नाटकीय घटना नहीं होती।
यह भी जो हम सुनते हैं, कि बुद्ध जा रहे थे और वह वहाँ पर युवा महोत्सव था और उनको एक बूढ़ा आदमी, बीमार आदमी, मरा आदमी ये सब दिख गए और अचानक उन्होंने कहा कि क्या मैं भी मरूँगा? उनका सारथी बोलता है, हाँ महाराज मरोगे। वो अचानक वहाँ चले गए — ऐसा नहीं हुआ था ऐतिहासिक रूप से। वह भी एक क्रमबद्ध घटना थी, बुद्ध ने भी एक प्रक्रिया के तहत वानप्रस्थ लिया था। अचानक से नहीं।
जो हमें बताते हैं ना कि रातों रात वो वहाँ पत्नी-बच्चे को छोड़ के चले गए, ऐसा नहीं था। काव्य में ऐसा कहना ठीक है और कविता में ऐसा ही कहा गया है, और बड़ा नाटकीय लगता है, बड़ा प्रभावी लगता है। पर ऐतिहासिक रूप से जो हुआ था, वह इससे भिन्न था। वह कम नाटकीय था। उसमें एक प्रोसेस था, ग्रेजुअल। प्रोसेस ऑफ डिसएंगेजमेंट, कि रोज़-रोज़-रोज़, वह भी और बेहतर होते जा रहे थे। और बेहतर होने की ही प्रक्रिया में एक दिन उन्होंने कहा कि मुझे अपने आप को, अपनी बेहतरी के लिए एक और बेहतर जगह देनी है।
और वो बेहतर जगह उन्होंने क्या पाई? बोले — ये जो इंसानों की, ये पूरी बस्ती है, इससे बाहर जो है, वह मेरी बेहतरी के लिए बेहतर जगह है। तो ये धीरे-धीरे, रोज़-रोज़। तो आप अगर वेदांत के साथ हैं, अष्टावक्र के, उपनिषद् के, गीता के साथ — तो ये थोड़ी है कि बस आपको भजन-कीर्तन करना है और श्लोक रट लिए हैं।
मुझे आपकी ज़िंदगी देखनी है भाई — ज़िंदगी दिखाओ। मजबूत, सख्त आदमी चाहिए। नहीं? हमने कल क्या कहा था? हाँ, सख्त औरत भी चाहिए। ये थोड़ी कि कमसन कली बनके पहले की तरह घूम रही हो। जितनी कलियाँ होती हैं, सब बूटों तले रौंदी जाती हैं अंततः। यही तो होता है, और कली का क्या होता है? कली को यहाँ (सिर पर) भी लगा लो, दो-चार घंटे बाद उसका क्या होना है?
श्रोता: मुर्झा जाएगी।
आचार्य प्रशांत: अब एक बेहतर होने के लिए एक जगह बता देता हूँ — कम्युनिटी। कम से कम इतनी बेहतरी कर लो कि वहाँ पर वर्तनी गलत मत लिखा करो। "हूँ" होता है, "हूं" नहीं होता। "मैं" होता है, "मे" नहीं होता। और देवनागरी में लिख रहे हो, वहाँ पाँच अक्षर देवनागरी में होंगे और फिर लिखना होगा कि "इस तरह" (is trh)। अरे यार, कितनी जल्दी में हो! कौन सी तुम्हारी फ्लाइट छूट रही है कि तुम देख भी नहीं पा रहे कि तुमने क्या पोस्ट कर दिया?
ना जाने कितनों की तो एडिटिंग बाद में मैं करता हूँ, क्योंकि मेरी आँखों को खटकता है। और कुछ नहीं है, बस सौंदर्य की बात है कि यार, लिख रहे हो तो तमीज़ से लिखो ना।
कई होंगे, लिख देंगे इतना बड़ा लिख देंगे, उसमें पैराग्राफ का ब्रेक नहीं देंगे। ये सब बेहतर होने की चीज़ें हैं। इतना सारा लिख दिया, उसमें पैराग्राफ छोड़ दो उसमें बीच में कहीं पर भी पूर्णविराम भी नहीं है, फुल स्टॉप भी नहीं है, कॉमा भी नहीं है। और जिन्होंने ऐसा पोस्ट करा, उन्होंने बीच-बीच में देखा होगा कि वो फिर 2 घंटे बाद चमत्कारिक रूप से एकदम सुंदर हो जाता है, सुव्यवस्थित हो जाता है।
वो कौन कर रहा है? "आपका सेवक।"
जब नज़र पड़ गई, जब समय हुआ तो कर दिया, क्योंकि नहीं अच्छा लगता कुछ भी गलत क्यों पड़ा हुआ है। जो चीज़ जैसी है, उसको वैसा होना चाहिए ना। इसी को न्याय कहते हैं, इसी को सम्यकता कहते हैं — जिस चीज़ की जो जगह है, जो रूप है, जो स्थान है उसको दो।
ये बहुत हो गया, अधजगा जीवन, मीडियोक्रिटी हर बात में औसतपन, हर जगह पिछड़े हुए। बहुत हो गया, ख़त्म करो। उठो, ख़ुद को चुनौती दो। कुछ नहीं रखा है तुम्हारे अतीत में और पुराने ढर्रों में कि उनसे चिपके बैठे हो। सब पीछे छोड़ो। समझदारी और मज़बूती को गले लगाओ, अलग इंसान बनो। आ रही है बात समझ में?
और उल्टे-पुल्टे टुच्चों की संगति बिल्कुल छोड़ दो। ये इतने महापुरुष क्यों जीकर के गए हैं? हमारे लिए। ताकि हम उनकी ज़िंदगी से सीखें, ताकि हमें भी ये भरोसा रहे कि अगर एक आदमी वैसे जी सकता है, तो हम भी वैसे जी सकते हैं। और रातों-रात किसी चमत्कार की उम्मीद मत करो।
"एक्सीलेंस" — "उत्कृष्टता" माने रोज़, क्रमशः बेहतर होना। ऐसे... ऐसे... ऐसे… (ऊपर चढ़ते जाना)।
ठीक है?