प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अंतर्मुखी होना माने क्या और वो क्यों ज़रूरी है?
आचार्य प्रशांत: ये बहुत गहरा शब्द नहीं है। अध्यात्म की दृष्टि से अंतर्मुखी-बहिर्मुखी सब एक हैं। आमतौर पर आप बहिर्मुखी उसे बोल देते हो जो संसार से ज़्यादा वास्ता रखता है। और जो अपने में ही ज़्यादा सीमित रहता है, उसको आप बोल देते हो अंतर्मुखी। पर अध्यात्म के देखे तो जो बाहर लिप्त है, वो भी लिप्त है और जो अपने ही विचारों और भावनाओं में लिप्त है, वो भी लिप्त है; दोनों में कोई अंतर नहीं।
अंतर्मुखी होना कोई विशेष बात नहीं है, आत्मज्ञानी होना बिलकुल दूसरी बात है। अंतर्मुखी एक है और अंतर्ज्ञानी बिलकुल दूसरा है। अंतर्ज्ञानी का मतलब है कि जो जान गया कि अंदर-बाहर एक है। जो अंतर्मुखी है वो तो अभी यही मान रहा है कि अंदर कोई दूसरी दुनिया होगी और बाहर कोई दूसरी दुनिया है, हम बाहर की दुनिया छोड़कर भीतर की दुनिया में आये हैं। तो अंतर्मुखी होना तो अभी द्वैत का ग्रास ही बने रहने जैसा है।
एक घर है, कोई घर के बाहर ढूँढ रहा है, कोई घर के भीतर ढूँढ रहा है और जिस चीज़ को ढूँढा जा रहा है, वो न घर के बाहर होती है, न घर के भीतर होती है; वो तब होती है जब तुम्हें दीवारों की व्यर्थता समझ में आ जाए।
भीतर माने क्या? मन, और कुछ नहीं। तुमने यही तो भेद करा है न कि बाहर संसार है और भीतर मन है। तो ये जो भीतर है, जो तुम्हारी ही परिभाषा के अनुसार मन है, उसको जान लो, वो अंतर्गमन हुआ। वो कैसे काम करता है? वो क्या चाहता है? क्या उसके ढर्रे हैं? क्या उसके इरादे हैं? क्या उसकी मान्यताएँ हैं? उसको समझ लो, ये अंतर्गमन है।
प्र१: आचार्य जी, आत्मज्ञान कैसे अलग है?




