कॉलेज के दिन || आचार्य प्रशांत, आई.आई.टी दिल्ली वेदांत सत्र (2022)

आचार्य प्रशांत: एक बार मुझसे पूछा था कि उपनिषद कहाँ से आते हैं। ‘न’ से उठता है उपनिषद्। न से। तो वेदान्त ‘न’ है। ‘न’। नकार — नहीं, नहीं। किसके खिलाफ़ नहीं? ‘ये जो मेरी हालत है, ऐसे नहीं जीना है।’ इसको वेदान्त कहते हैं। और अगर मेरी हालत ऐसी है और मैं ईमानदारी से कह रहा हूँ कि मुझे ऐसे नहीं जीना है तो फिर मैं गहराई से खोज करूँगा कि मेरी हालत ऐसी क्यों है। मैं बहाने नहीं बनाऊँगा, मैं झूठ-मूठ का दूसरों पर दोषारोपण नहीं करूँगा। मैं नहीं कहूँगा, ‘परिस्थितियों ज़िम्मेदार है। मुझे समझ में आएगा कि अपनी हालत का ज़िम्मेदार व्यक्ति अन्ततः स्वयं ही होता है।
‘तो क्या है मेरे भीतर जो मुझे लगातार दुख में रखता है?’ वेदान्त ये सवाल पूछता है। यही जिज्ञासा है, ‘मैं कौन हूँ? मैं जो इतनी विचित्र, इतनी सड़ी हालत में अक्सर पाया जाता हूँ, मैं हूँ कौन? मैं कहाँ से आ गया? मैं हूँ कौन?’ और वेदान्त इस हाथ की बात नहीं कर रहा है (हाथ की ओर संकेत), इन बालों की, इस नाक की बात नहीं कर रहा है। वेदान्त उसकी बात कर रहा है भीतर जो दुख में रहता है। आपका हाथ नहीं दुख में रहता। कोई और है भीतर जो दुखी रहता है, जो इच्छाएँ करता है, जो आशा बाँधता है। जब आशाएँ पूरी नहीं होती तो हताश होता है और हताशा के बाद पुनः हो वो आशा बाँधता है। वो कौन है? वो कहाँ से आता है? और अगर वो इतने इतनी इच्छाएँ, आशाएँ करता है तो उसको वास्तव में चाहिए क्या? कभी इस दिशा भागता है, कभी उसे दिशा भागता है। कभी उसको लगता है इधर चला जाऊँ तो खुशी मिलेगी, उधर चला जाऊँ तो सुख मिलेगा। जिधर भी जाता है कई बार सुख पा भी जाता है लेकिन जब सुख मिलता भी है तो ऐसा जैसे सुबह का तारा अभी है, अब गया।
ये कौन है भीतर जो जीवनभर सुख माँगता रहता है पर सुख कभी पता नहीं। और फिर ऐसी बेईमानी कर जाता है हार-हारकर, निराश होकर कि दुख को ही सुख का नाम देना शुरू कर देता है? कह देता है, ‘मैं तो सुखी हूँ, मैं तो ठीक हूँ। क्यों? क्योंकि पचास बार सुख की कोशिश की, सुख मिला नहीं और जितनी बार सुख की कोशिश की दुख में और ज़्यादा बँधते गये और अब बन्धन इतने सख्त हो गये हैं कि भीतर कोई उम्मीद बच्ची नहीं है कि इन बन्धनों को कभी तोड़ भी पाऊँगा। तो चलो-चलो छोटी सी एक बेईमानी खेलते हैं। क्या? बन्धनों को मुक्ति बोल देते हैं, दुख को सुख बोल देते हैं। ये कौन है भीतर जो दुखी भी है और बेईमान भी? वेदान्त इस तलाश का नाम है।



