सबसे बड़ा दोष है — कमज़ोरी, जो कहता है हम संकुचित हैं, सीमित हैं जबकि हमारे ऋषियों ने प्रेम में हमें बताया — 'अमृत की औलाद हो तुम, इतनी आसानी से कैसे लड़खड़ा सकते हो?' 'न दैन्यं न पलायनम्' — ना हम छोटे हैं, ना हम मैदान छोड़कर भागते हैं।
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प्रश्नकर्ता: मैंने देखा है, कई बार लोगों के पास ये तर्क होता है कि "देखिए, ये सब कुछ करना तो आचार्य जी के लिए आसान था, वो आचार्य जी हैं। पर हम कहाँ कर सकते हैं?" तो ये जो आप मजबूरी की बात कर रहे हैं, ये जो कुतर्क है इससे कैसे?
आचार्य प्रशांत: देखिए, कुछ भी आसान नहीं था। एकदम आसान नहीं था, एकदम भी आसान नहीं था। पता नहीं क्यों आपको अपने लिए बहाना बनाना है कि मैंने या किसी और ने कुछ कर लिया, तो वो उसके लिए आसान था और आपके लिए मुश्किल है, क्योंकि आपकी मजबूरियाँ हैं और बंधन हैं और परिस्थितियाँ हैं, ये क्या बेकार का बहाना है। कुछ भी नहीं है।
अभी जिन पिताजी की बात कर रहे हैं वो एकदम ग्रामीण परिवेश से आते हैं। उनकी पुरानी कविताएँ हैं, कुछ कविताओं में लिखा हुआ है कि दो दिन से खाना नहीं खाया है, वो ऐसी पृष्ठभूमि से आते हैं। अपने तमाम उन्होंने बंधनों के बीच ही सारी पढ़ाई पूरी करी फिर अधिकारी भी बने, कोई पुश्तैनी ज़मीन-जायदाद नहीं, कुछ नहीं ऐसा। और जब आप एक ऐसे घर से आते हो, तो जैसे आप बोला करते हो ना कि "अरे, माँ-बाप की उम्मीदें हैं बहुत," वैसे ही वो उम्मीदें तो मुझसे भी रखते होंगे ना, कि नहीं रखते होंगे? तो मेरे लिए आसान कहाँ से हो गया भाई।
उनको भी लगता होगा कि जिस तरह की संपन्नता कभी नहीं देखी गई, वैसी संपन्नता ये लड़का लेकर के आएगा, यूएस में किसी इन्वेस्टमेंट बैंक




