कब तक हालात को दोष दोगे?

Acharya Prashant

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कब तक हालात को दोष दोगे?
सबसे बड़ा दोष है — कमज़ोरी, जो कहता है हम संकुचित हैं, सीमित हैं जबकि हमारे ऋषियों ने प्रेम में हमें बताया — 'अमृत की औलाद हो तुम, इतनी आसानी से कैसे लड़खड़ा सकते हो?' 'न दैन्यं न पलायनम्' — ना हम छोटे हैं, ना हम मैदान छोड़कर भागते हैं। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: मैंने देखा है, कई बार लोगों के पास ये तर्क होता है कि "देखिए, ये सब कुछ करना तो आचार्य जी के लिए आसान था, वो आचार्य जी हैं। पर हम कहाँ कर सकते हैं?" तो ये जो आप मजबूरी की बात कर रहे हैं, ये जो कुतर्क है इससे कैसे?

आचार्य प्रशांत: देखिए, कुछ भी आसान नहीं था। एकदम आसान नहीं था, एकदम भी आसान नहीं था। पता नहीं क्यों आपको अपने लिए बहाना बनाना है कि मैंने या किसी और ने कुछ कर लिया, तो वो उसके लिए आसान था और आपके लिए मुश्किल है, क्योंकि आपकी मजबूरियाँ हैं और बंधन हैं और परिस्थितियाँ हैं, ये क्या बेकार का बहाना है। कुछ भी नहीं है।

अभी जिन पिताजी की बात कर रहे हैं वो एकदम ग्रामीण परिवेश से आते हैं। उनकी पुरानी कविताएँ हैं, कुछ कविताओं में लिखा हुआ है कि दो दिन से खाना नहीं खाया है, वो ऐसी पृष्ठभूमि से आते हैं। अपने तमाम उन्होंने बंधनों के बीच ही सारी पढ़ाई पूरी करी फिर अधिकारी भी बने, कोई पुश्तैनी ज़मीन-जायदाद नहीं, कुछ नहीं ऐसा। और जब आप एक ऐसे घर से आते हो, तो जैसे आप बोला करते हो ना कि "अरे, माँ-बाप की उम्मीदें हैं बहुत," वैसे ही वो उम्मीदें तो मुझसे भी रखते होंगे ना, कि नहीं रखते होंगे? तो मेरे लिए आसान कहाँ से हो गया भाई।

उनको भी लगता होगा कि जिस तरह की संपन्नता कभी नहीं देखी गई, वैसी संपन्नता ये लड़का लेकर के आएगा, यूएस में किसी इन्वेस्टमेंट बैंक में चला जाएगा और साल के कई लाख डॉलर घर भेजा करेगा। तो आसान कहाँ से हो गया।

फिर कोई चीज़ ना मिली हो ज़िंदगी में, तो वहाँ फिर भी आसान होता है मिली ही नहीं, उसका ना मिलना ही फ़ैसला हो गया, फ़ैसला हो गया ना? पर जो चीज़ मिल गई है, उसका ना मिलना फिर चुनाव होता है। ठीक? कोई चीज़ आपको मिली ही नहीं तो फ़ैसला हो गया, पर मिली हुई चीज़ को छोड़ना एक चुनाव होता है और उस चुनाव में दर्द होता है। मेरे भी दोस्त-यार हैं, परिवार है, और मैं भी कोई आसमान से नहीं उतरा हूँ, साधारण मिट्टी का पुतला हूँ। मेरे भीतर भी कई तरह के संशय उठते थे, कुछ स्पष्टता नहीं थी क्या होगा, क्या नहीं होगा — चलते रहे, चलते रहे।

देखिए, मुझको लेकर के बहाना मत बनाइए कि "इस आदमी के लिए आसान था इसलिए अलग चल लिया, हमारे लिए आसान नहीं है, नहीं चलेंगे।" मुझे बहाना मत बनाइए, बल्कि अगर आपको मेरा इस्तेमाल ही करना है तो मेरी कहानी को सहारा बना लीजिए। मेरी कहानी हर उस आदमी के लिए सहारा बन सकती है, जो अलग चलना चाहता है पर संशय से घिरा हुआ है। और मैं हर तरीक़े से अलग चला हूँ, और उन्हीं परिस्थितियों में होते हुए अलग चला हूँ जिन परिस्थितियों में आप सब हैं। तो कोई बहानेबाज़ी इसमें नहीं चल सकती।

ना खानदानी रईस हूँ, ना कोई और व्यवस्था है, ना मैं किसी परंपरा की पीठ पर बैठा हुआ हूँ, ना अपने ऊपर मैंने कोई गॉडफादर कभी स्वीकार किया, ना किसी राजनेता से या राजनैतिक विचारधारा से संबद्ध हूँ। कोई नहीं है मेरा, एकदम कोई नहीं। ना धर्म के क्षेत्र में कोई मेरा है, ना समाज में है, ना राजनीति में है, ना मेरे पीछे कोई फ़ंडिंग लगी हुई है, कुछ नहीं। अकेला खड़ा हूँ जैसे अभी आपके सामने, बिल्कुल ऐसे ही खड़ा हूँ। और कृपा करके कोई कल्पना, कोई कहानी मत बना लीजिएगा कि "किसी ना किसी का तो इनको समर्थन मिला होगा" एकदम किसी का नहीं। और मैं गर्व अनुभव करता हूँ ये कहने में कि मैंने सहारा दिया है जब कुछ नहीं था मेरे पास, तब भी सहारा दे रहा था। आप भी दे सकते हैं।

बहुत साल पहले इसको अंग्रेज़ी में मैंने ऐसे बोला था — “गिव, गिव ऐंड गिव ऐंड गिव फ्रॉम एम्प्टी पॉकेट्स।” जब जेब ख़ाली हो ना, तब देने में और मज़ा आता है। और मज़ेदार बात ये है कि तब देते जाओ तो पता चलता है अरे, जेब में अभी और है, अपने ही छुपे हुए कोष फिर खुल जाते हैं। अपने आप को निर्बल या निर्धन मत मानिए। आपके पास बहुत कुछ है, देना शुरू करिए ना चलना शुरू करिए, आपकी ताक़त अपने आप खुलेगी।

वक़्त की बात है, अभी कह रहा था, "कोई नहीं है साथ में" अगर कोई साथ में है तो आप लोग हैं। और आप लोग भी बस साथ बने रहें और एक झुंड बन जाए, एक समुदाय बन जाए, ऐसी मेरी बिल्कुल इच्छा नहीं है। बल्कि मैं चाहता हूँ कि हमारे संबंध पर एक कड़ी शर्त रहे और वो शर्त ये है कि जब तक आप प्रयासरत हैं, कि आप उठते रहें, जीवन में बेहतर होते रहें और जब तक मैं उस प्रयास में सहयोगी हो पा रहा हूँ, तब तक हमारा-आपका रिश्ता रहे।

जिस दिन आप ऐसे हो जाएँ कि कहें कि "हमें तो बस सुनना है, करना कुछ नहीं। हमें तो बस किताब पढ़नी है, वीडियो देखना है, जीना कुछ नहीं" उस दिन मैं आपको अपने आप से दूर कर दूँ। और जिस दिन मैं ऐसा हो जाऊँ कि मेरे माध्यम से आपकी चेतना को, आपकी मुक्ति को कोई लाभ होना बंद हो जाए उस दिन आप मुझे दूर कर दीजिएगा। ये हमारा रिश्ता होना चाहिए और इस रिश्ते में ये कड़ी शर्त होनी चाहिए। ठीक है ना? ये भी नहीं है कि चलो कोई बात नहीं अकेले चले थे पर अब तो बहुत लोग साथ हैं। ना! साथ वग़ैरह क्या होता है, इंसान साथ के लिए थोड़ी पैदा होता है। बात आ रही है समझ में? रखनी है ये शर्त।

मैं अपना चेहरा आपको तभी दिखाऊँ जब मुझे पता हो कि आपके सामने खड़ा होना मैंने अर्जित किया है, जब मुझे पता हो कि परिस्थितियों का सामना करके आपके सामने आया हूँ, कि बीते हुए दिन में पूरी मेहनत करी है मैंने, और काम के साथ इंसाफ़ किया है और इस बूते पर आपके सामने खड़ा हूँ, मुझे पता हो तो ही मैं आपके सामने खड़ा हूँ। और आप भी मेरे सामने तभी आएँ जब आप कह पाएँ कि "जिसके साथ हैं, कम से कम थोड़े-बहुत उसके जैसे हो रहे हैं।" ये शर्त ठीक है कि नहीं है? या आप मेरे लिए गौरव का साधन हैं और मैं आपके लिए मनोरंजन का? और बड़ी हम भी भीड़ इकट्ठा कर सकते हैं, चाहे तो। और फिर ऐसे छाती (तनी हुई), गौरव, इतने बड़े हो गए भाई, और जब आप बड़े हो जाते हो तो कई तरह के लाभ मिलने लग जाते हैं — आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक; लाभ लेने शुरू कर दो।

ये करूँ मैं?

कैसा लगेगा आपको अगर मैं आपको अपने लिए बस गौरव का साधन बना लूँ तो? बोलिए। बोलिए, कैसा लगेगा? और मुझे कैसा लगेगा अगर मैं आपके लिए बस मनोरंजन का साधन बन जाऊँ तो? बोलिए। ना आपको मेरे लिए साधन बनना है, ना मुझे आपके लिए। प्रेम में एक-दूसरे के लिए मनोरंजन का या गौरव का, या इच्छा-पूर्ति का साधन नहीं बनते ना। नहीं बनते ना? प्रेम का क्या अर्थ होता है?

प्रेम माने क्या होता है? एक-दूसरे का हाथ इसलिए पकड़ा है क्योंकि हाथ अगर थामे रहेंगे तो ज़्यादा दूर तक चल पाएँगे और ज़्यादा ऊँचे उठ पाएँगे।

शर्त है, उस शर्त के बिना कुछ नहीं। बात आ रही है समझ में?

मेरे लिए आसान नहीं था। आपकी तरह बिल्कुल इंसान हूँ, एकदम आपकी तरह और आपको भरोसा दिला रहा हूँ, जितने भी दिन जिऊँगा, मैं कभी नहीं बोलने जा रहा कि मुझ में कोई दिव्यता है, अनूठापन है, निराला हूँ, अलग हूँ, अद्भुत हूँ, इनलाइटेंड हूँ, अवतार हूँ। ये मैं कहिए तो लिखकर के दे दूँ। जैसे आज बोल रहा हूँ — मिट्टी का पुतला हूँ ठीक आपकी तरह, वैसे ही जो सच्ची बात है वो बदल कैसे जाएगी यार, आगे दूसरी बात कैसे बोल सकता हूँ।

तो ये समझ लीजिए कि पहले भी आसान नहीं था, एक तरह की चुनौतियाँ थीं। आज भी आसान नहीं है, आज चुनौती ये है कि मैं अपने आप को उन्हीं के जैसा घोषित कर दूँ जो समाज में और धर्म में नेता बनकर घूम रहे हैं, और प्रयास करने लगूँ कि मैं भी उन्हीं की बिरादरी में जाकर बैठ जाऊँ। और वो प्रलोभन तो लगातार मौजूद ही है ना कि नहीं मौजूद है? आते हैं इधर-उधर से न्योते, आमंत्रण, "आप हमारे साथ अब बैठना शुरू कर दीजिए। आप क्यों नहीं हमारे दल में शामिल हो जाते?" और मैं अगर वैसा करने लग जाऊँ तो आपके किसी काम का नहीं बचूँगा। जब मैं किसी दल में शामिल होने से इंकार कर रहा हूँ, तो आपकी दलगत निष्ठा क्यों है, बताइए? आप कैसे राजनीतिक हस्तियों के दीवाने हुए बैठे हैं?

आप तो दूर से उनके दीवाने हैं, मुझे तो वो बहुत पास से बुला रहे हैं। बोलो? और आपको फिर राजनेताओं का, अभिनेताओं का और बड़े उद्योगपतियों का, सेठों का और यही सब जो प्रभावशाली लोग हैं आपको उनका ही मुरीद होना है तो आप उन्हीं के साथ रहिए। क्योंकि आप एक ऐसे आदमी के सामने खड़े हैं जो समाज में उतरा है उन प्रभावशाली लोगों के लिए नहीं, आपके लिए। और ये तो देखिए बेवफ़ाई होती है जो प्यार में बिल्कुल बर्दाश्त करी जाती नहीं कि "साहब, हम तो आपको समर्पित हैं और आपने दिल कहीं और लगा रखा है।" चलता नहीं ना।

और आपने जहाँ दिल लगा रखा है वो हमारे पीछे है और हम उनको घास नहीं डालते, और आप वहाँ जाकर के जी, जी, जी कर रहे हैं। ये नहीं चलेगा। ये बात भी मैं गौरव बताने के लिए नहीं कर रहा हूँ, इसमें कोई गौरव की बात नहीं है। समाज तो जहाँ भी भीड़ देखता है उसी को श्रेष्ठ मान लेता है, ये तो ज़ाहिर सी बात है होगा ही। मेरे साथ भी होगा और भी कहीं भीड़ हो वहाँ भी होगा, तो इसमें कोई गौरव की बात नहीं है, इसमें सावधानी की बात है।

एक निष्ठा होनी चाहिए, क्योंकि एक सत्य है। और वही एक सत्य है जो जीवन में नवीनता लाएगा — एक ज़िंदगी, एक दिल, एक सत्य, एक प्रेम — दूजा कोई नहीं।

ठीक?

हमने हर चीज़ को मल्टीपल बना रखा है, जहाँ देखो, वहाँ तीसरा, पाँचवाँ, अठारहवाँ पैदा कर रखा है। ज़िंदगियाँ हमें लगता है बहुत सारी हैं, "हमारा ही तो दूसरा जन्म हो जाएगा।" सौ बार समझाया, "आप जो हैं आपका नहीं होगा।" जिसका पुनर्जन्म होता है वो वस्तु दूसरी है, आप जो व्यक्तित्व है इसका कोई पुनर्जन्म नहीं होता। लेकिन “एक ज़िंदगी” ये बात भी हम नहीं मानते आसानी से। बार-बार बोलता हूँ, आपकी तो एक ही ज़िंदगी है।

“एक सत्य” हम वो बात भी नहीं मानते, हम द्वैत में विश्वास रखते हैं। हम कहते हैं, "मैं भी सत्य हूँ, संसार भी सत्य है" तो दो सत्य तो कम से कम हैं ही। और एक तीसरा भी है, "एक भगवान भी है, वो भी सत्य है।" तो दो का तीन भी बना देते हैं, चार-पाँच भी बना सकते हो मर्ज़ी है असंख्य सत्य बना लो।

और मैं कह रहा हूँ, “एक ज़िंदगी, एक सत्य, एक निष्ठा।” हिम्मत है? एक ज़िंदगी का मतलब होता है — एक पल भी बर्बाद नहीं करना, दूसरी नहीं मिलेगी। एक ज़िंदगी का मतलब समझते हैं? सब तरह के विचलन और विक्षेप बाहर, समय ही नहीं है। एक ज़िंदगी है, बीता पल लौटता नहीं और आगे के पल पता नहीं कितने हैं। समय क्या है? क्या बोला था? भ्रम है भैया, नहीं पता।

“एक ज़िंदगी, एक सत्य, एक निष्ठा।”

अगर सत्य एक है तो पाँच से मेरी निष्ठा कैसे हो सकती है, पाँच जगह दिल कैसे लगा सकता हूँ जब सच्चाई एक है तो? बोलो। कि लगाना है? ऐसे को पसंद करोगे जो सत्तर जगह आशिक़ी करते फिरते हैं?

आपको मुझ पर फ़क्र रहे, मुझे आप पर फ़क्र रहे, अच्छी चलेगी ना जोड़ी? आप निराश हो रहे हों, मुझे देखें, चित्त प्रसन्न हो जाए। है ना? आप कई बार लिख के भेजते हैं कि "मन बहुत खिन्न था फिर तभी वीडियो का नोटिफ़िकेशन आ गया, अब बढ़िया हैं।" कई लोग ऐसे भी कहते हैं, "कि आत्महत्या ही करने जा रहा था आपने बचा लिया।" अब मैं आपको बताना चाहता हूँ ये सारे विचार मुझे भी आते हैं, मैं किसकी ओर देखूँ? तो हमारा रिश्ता ऐसा रहे कि मैं आपको देखूँ और मेरा चित्त भी हर्षित हो जाए, तो ठीक रहेगा ना? नहीं तो एक तरफ़ा हो जाती है बातचीत।

आप तो मुझे देखते हैं, तो आपको प्रेरणा भी मिल जाती है, ऊर्जा भी मिल जाती है, उत्साह भी मिल जाता है, होता है ऐसा? हाँ, तो मेरे लिए भी तो आप होने चाहिए ना। या मैं आपको देखूँ और आप बिल्कुल वही ज़माने की लाइन में लगे हुए हैं, तो मुझे अच्छा लग रहा है? या तब और लगेगा, कि छोड़ो यार ऐसे क्या करना है जी के?

सच अनंत होता है, असीम होता है, अजय होता है, लेकिन प्रकृति में वो सदा अल्पमत में होता है। तो आप अगर एक ऊँची, प्रेम-भरी, सही ज़िंदगी जिएँगे तो आप हमेशा अल्पमत में ही होंगे। अल्पमत में रहने की तैयारी कर लीजिए और अल्पमत में रहने को ही सामान्य मान लीजिए। दस के बीच में आप अकेले रहेंगे, इस बात को आप अपना दुर्भाग्य भी मान सकते हैं। बोलो, क्या मानना है?

श्रोता: सौभाग्य।

आचार्य प्रशांत: ये पक्का है कि दस क्या, सौ में आप अकेले रहोगे। इसको आप अपना अकेलापन भी मान सकते हैं और अपना अनूठापन भी। बोलो, क्या मानना है?

श्रोता: अनूठापन।

आचार्य प्रशांत: इतनी मुझे उम्मीद नहीं है कि ये दुनिया ऐसी हो जाएगी कि एक दिन 800 करोड़ में से 700 करोड़ सच्चाई के आशिक़ होंगे, नहीं होने वाला। हम जहाँ तक अपना जीवनकाल देख सकते हैं आप तो अल्पमत में ही होंगे, कभी दस में एक, कभी हज़ार में एक। उसको अपना अनूठापन मानिएगा, वो अनूठापन है आपका। ठीक वैसे जैसे शिखर पर चढ़ा होता है कोई, तो अनूठा होता है ना और अकेला होता है वो। वो अकेलापन अनूठापन है।

आपके बच्चे होते हैं, आप चाहते हैं कि वो कोई प्रवेश परीक्षा पास कर लें, और जो वहाँ पर सलेक्शन रेशियो होता है वो ऐसे ही तो होता है हज़ार में से एक का चयन हुआ। ऐसा ही होता है ना? तो हज़ार में एक निकला आपका बेटा, आपकी बेटी। ये बात सौभाग्य की होती है या दुर्भाग्य की?

श्रोता: सौभाग्य की।

आचार्य प्रशांत: तो आपके बच्चे जब हज़ारों से अलग काम करें, तो अनिवार्य रूप से ये मत मान लीजिएगा कि उन्होंने कुछ ग़लत ही करा है। और आप भी जब पाएँ कि सच का रास्ता आपको हज़ारों से अलग ले जा रहा है, तो कुछ अनिष्ट नहीं घट रहा, कुछ बहुत अच्छा बहुत ऊँचा हो रहा है आपके साथ। समझ में आ रही है बात ये?

दो नावों पर एक साथ पाँव रखकर नहीं चल पाएँगे, और छूटेगी कौन-सी नाव ये पहले से पता है। जो बड़ी वाली नाव है, आप उसी में सवार हो जाएँगे। एक तरफ़ है उनका इतना बड़ा टाइटैनिक और दूसरी तरफ़ है हमारी छोटी-सी लाइफ़ बोट। टाइटैनिक और लाइफ़ बोट के आकार में क्या अनुपात होता है? दस हज़ार और एक, या एक लाख और एक, ऐसे ही कुछ। बस इतनी-सी बात है कि एक डूबता है, एक बचता है।

अपने अकेलेपन से प्रेम करना सीखिए नहीं तो बार-बार यहाँ नहीं आ पाएँगे, बहुत अनुभव से बोल रहा हूँ। दूसरे आपको खींच ले जाएँगे। अपने पाठकों, अपने श्रोताओं के साथ क्या, मैंने तो अपने व्यक्तिगत जीवन में भी इस अनुभव का दर्द सहा है। जिन पर समाज की बहुत पकड़ होती है वो बहुत दूर तक मेरे साथ नहीं चल पाते।

प्रश्नकर्ता: सर, आज बहुत कुछ है जो आपसे सुनते हैं, बहुत कुछ है जो आपसे सीखते हैं। पर कोई एक बात है जो आप चाहेंगे कि यहाँ मौजूद हर व्यक्ति उसे अपने साथ लेकर जाए और अंत तक याद रखें।

आचार्य प्रशांत: छोटा मत अनुभव करना कभी, और ये चाहेंगे सब कि छोटा अनुभव करो। ये शब्द है ना, मुझे बहुत प्यारा है — ठसक। ऐसे तन के खड़े रहना है, ये (सिर) थोड़ा-सा पीछे को फेंका रहे।

जो चीज़ अवश्यभावी है, उसकी तैयारी पहले से। जहाँ हर चीज़ में मिलावट है, जहाँ धर्म, संस्कृति इनके नाम पर सिर्फ़ विक्षेप परोसा जा रहा है वहाँ अगर आप एक सही, साफ़-सुथरी ज़िंदगी जिएँगे तो अल्पसंख्यक ही रहोगे। अपने आप को विश्व की सबसे छोटी माइनॉरिटी मानने की तैयारी कर लो। और उसको मालूम है क्या बोलते हैं? उसको बोलते हैं — सचेत व्यक्ति। वो एक की माइनॉरिटी होता है, ऐसा भी नहीं कि दस-बारह लोग का एक झुंड है, एक दल है। एकदम अकेले अल्पसंख्यक हैं और इतने (एक हैं) अकेले हैं। और जो इतना अकेला होता है उसको सब चले आते हैं दबाने के लिए। जो इतना अकेला होता है ना, सब चाहते हैं उस पर चढ़ बैठें।

किसी को हक़ नहीं देना है कि चढ़ बैठे।

समाज के प्रति एक स्वस्थ अनादर का भाव रखो — हेल्दी कंटेम्प्ट। हेल्दी बोला है, ये नहीं कि जो मिला उसी को झाड़ दिया। वो रखना ज़रूरी है क्योंकि अपने आपको वरना बचा नहीं पाओगे।

हर बच्चा एक संभावना लिए पैदा होता है, दुनिया उस संभावना को खा जाती है, दुनिया आपको भी खा जाएगी।

दुनिया है ही इसीलिए कि इंसान को खा जाए। भर्तृहरि कह गए थे ना, “तुम नहीं खाते दुनिया तुम्हें खाती है, तुम सोच रहे हो कि तुम भोग को भोग रहे हो, भोग तुम्हें भोग रहा है। तुम नहीं खा रहे यहाँ पर, तुम पैदा हुए हो खाए जाने के लिए।” ये दुनिया सबको खा जाती है। तैयार रहो, नहीं खाए जाना है।

गरिमा, डिग्निटी — क्या? डिग्निटी। ऐसी गरिमा जो दहाड़ती है, बदतमीज़ गरिमा। हम जिस बदतमीज़ी की बात कर रहे हैं वो अच्छी ही नहीं, वो आवश्यक है। साधारण बदतमीज़ी की बात नहीं कर रहा। ये सिर है ये सिर्फ़ सत्य के सामने झुकता है। क्या? (सत्य)।

और अगर पचास जगह झुकता है उसके बाद सत्य के सामने झुकता है, तो भला है कि सत्य के सामने भी ना झुके — बिका हुआ सिर। सत्य के सामने सिर झुकाने का महत्त्व सिर्फ़ तभी है जब वो सिर कहीं और ना झुका हो। कहीं झुकना नहीं चाहिए, वो गरिमा, वो ठसक बनी रहे। सिर झुके नहीं और हाथ फैले नहीं, याचक नहीं बनना है, भिखारी नहीं हैं हम। सहारा दे देंगे, माँगेंगे नहीं और खूब सहारा देंगे। किसी को सहारा देने में अपना नुक़सान होता हो तो और देंगे सहारा। तभी तो मज़ा है ना, देखिए तो कितनी चोट झेल सकते हैं। जिसको सहारा दे रहे हो वही पलटकर मारे हमें तो भी उसको देंगे सहारा, देखें तो दिल कितना बड़ा है।

आ रही बात समझ में?

सच्चाई का सिपाही संसार के दर पर भिखारी थोड़े ही बनेगा। या बनेगा? “हटो, हटो तुम।” ये भाव रहता है फिर।

प्रेम में तो सब कुछ अर्पित कर देंगे, पर जहाँ डर है, जहाँ लालच है, जहाँ धमकी है, जहाँ दबाव है वहाँ हमसे बस उपेक्षा और अनादर ही पाओगे। ठीक है ना ये? और कभी भी ये भाव उठेगा अगर कि "ये तो हारी हुई चीज़ है, सामने वाला पक्ष बहुत बलवान है, हम छोटे हैं, कमज़ोर हैं।" ऐसी भावना को क्या करना है? दूर हट, छू!

सबसे बड़ा दोष है — कमज़ोरी। अहम् वृत्ति को ऐसे भी परिभाषित कर सकते हो, अपने भीतर का वो भाव जो कहता है कि हम संकुचित हैं, सीमित हैं, क्षुद्र हैं, संकीर्ण हैं उसे अहम् वृत्ति कहते हैं। अपने ही भीतर की संकीर्णता को अहम् वृत्ति कहते हैं। जब भी ऐसा भाव आए, "हमसे क्या हो पाएगा? पर हम क्या कर सकते हैं?" एकदम उसको पत्थर मार के भगा दो।

पढ़ेंगे तो ऊँचे से ऊँचा पढ़ेंगे, देखेंगे तो ऊँचे से ऊँचा देखेंगे। घटिया साहित्य नहीं पढ़ेंगे, घटिया संगति नहीं करेंगे। घटिया जीवन नहीं जिएँगे, घटिया नौकरी नहीं करेंगे। घटिया पेशा भी नहीं अपनाएँगे।

और हम सब जानते हैं कि घटिया किसको कहते हैं। कम से कम अगर मेरे साथ रहे हैं आप, तो आप भली-भाँति जानते हैं घटिया किसको कहते हैं। जानते हुए भी अगर घटिया काम किया तो अपने आप को माफ़ नहीं करेंगे। ठीक है ना? और फिर तन कर जिएँगे। क्योंकि पता है कीमत चुकाई है, खोखला घमंड नहीं कर रहे, ठोस गरिमा है। गरिमा और घमंड में अंतर होता है ना? बाहर वाले लोगों को लगेगा कि घमंडी हो गए हो। वो यही कहेंगे कि “ये तो अपने में चलते हैं, बहुत घमंडी हो गए हैं, अपने आप को तुर्रम खां समझते हैं।” कहने दो। तुम में इतनी समझ ही होती कि घमंड अलग चीज़ है और गरिमा दूसरी, तो तुम कुछ और होते। हम पर आक्षेप नहीं कर रहे होते हमारे साथ होते।

एक-एक चीज़ में चुनाव करेंगे ना, क्या कपड़ा पहन रहे हैं? क्या खाना खा रहे हैं? कहाँ रह रहे हैं? कौन-सी किताबें पढ़ रहे हैं? कौन-सा चैनल देख रहे हैं? किन लोगों का समर्थन कर रहे हैं? किनका विरोध कर रहे हैं? कर सकते हैं कि नहीं कर सकते हैं?

श्रोता: कर सकते हैं।

आचार्य प्रशांत: और जब करेंगे, तो हैं ताक़तें जो विरोध करेंगी, उनको झेलेंगे ना? हाँ, झेलेंगे। और जब झेलेंगे तो पता चलेगा, “अरे, तो झेल सकते थे, इतना भी मुश्किल नहीं था। चोट लगी लेकिन बर्दाश्त कर सकते थे। पहले भी बर्दाश्त कर सकते थे, आज तक क्यों नहीं बर्दाश्त किया?” चोट लगी, दर्द हुआ, और जब लगती है चोट तो तिलमिलाता है आदमी। तिलमिलाएँगे आप, एक बार को क़दम लड़खड़ाएँगे। लेकिन लड़खड़ा रहे हों क़दम आप सँभाल लीजिएगा, सँभाल सकते हैं, है हम में इतना दम, सब में होता है।

हमारे पुरखे, हमारे पूज्य, हमारे प्रेम में ही हमें बता गए हैं ना कि “अमृत की औलाद हो तुम, तुम इतनी आसानी से कैसे लड़खड़ा सकते हो।” ऋषियों ने वो बात सिर्फ़ अपने लिए नहीं बोली थी, हम सबके लिए बोली थी ना — "अमृतस्य पुत्राः।" करेंगे प्रयोग हर बार, जब भी लगेगा कोई मजबूरी आ रही है कहेंगे, “कोशिश करके तो देखते हैं, अंजाम क्या निकलेगा हमें पता नहीं।” प्रयास करने में भी कोई बंधन है? परिणाम पर हमारा बस नहीं, क्या प्रयास भी हमारे हाथ में नहीं? बोलिए, प्रयास करेंगे पूरी ईमानदारी से, करेंगे ना?

एक बार भी अर्जुन को नहीं कहा कि तुम जीतोगे, लेकिन बार-बार कहा कर्म पर अधिकार है, कर्म से कैसे पीछे हट रहे हो। कौन-सा कर्म? निष्काम कर्म। जो कहाँ से आता है? अपने भीतर के अंधेरे को जानने से और उससे लड़ने से आता है। जानेंगे कि हमारे ही भीतर हमारा दुश्मन है, उससे लड़ लिए तो बाहर के दुश्मन, क्या दम है इनमें?

गीता उतरेगी एक-एक पल में, पक्का नहीं पर प्रयास तो करेंगे। करेंगे ना? करेंगे।

"न दैन्यं न पलायनम्" — ना हम छोटे हैं, ना हम मैदान छोड़कर भागते हैं, चोट लगती है चोट सहते हैं। मौत आती है मौत सहते हैं। मौत भी कोई हमें पहली बार आ रही है क्या? मौत भी बहुत पुरानी है, नया तो वो जीवन है जिसके लिए प्रयास कर रहे हैं। हज़ार बार पहले मरे एक बार और मर लेंगे, पर नए जीवन के लिए प्रयास तो करेंगे ना? करेंगे ना?

ये बात बिल्कुल अधूरी छोड़कर जा रहा हूँ, क्योंकि बात कभी पूरी नहीं होती, पूरा तो ज़िंदगी को ही होना होता है। ज़िंदगी को आपको पूरा करना है।

कभी बिल्कुल आस टूटने लगे, भरोसा मिटने लगे, लगे कि घुटने टेक ही दें और बाक़ी सब उपाय काम ना आ रहे हों, तो एक उपाय ये और कर लीजिएगा। याद कर लीजिएगा कि एक व्यक्ति है जो कम से कम अभी घुटने नहीं टेक रहा है। आप अगर अकेले भी हैं तो एक और व्यक्ति भी है जो अकेला है। दो अगर अकेले हो तो अकेले तो नहीं कहलाते। जो संघर्ष आपका है, वही मेरा भी है। ना आपको सिर झुकाना है, ना मुझे। ना आपको घुटने टेकने हैं, ना मुझे। और चलेंगे तो साथ, बढ़ेंगे तो साथ।

समझ में आ रही है बात?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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