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इंट्रोवर्ट (अंतर्मुखी) होने के कारण दिक्कतें? ।। अचार्य प्रशांत आईआईटी दिल्ली महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम अमन है। और पिछले दो साल से आपको सुन रहा हूँ। बाय नेचर मैं इंट्रोवर्ट (अंतर्मुखी) हूँ। इन्होंने भी इंट्रोवर्ट होने की बात करी थी। काफी लम्बे समय से इंट्रोवर्ट ही रहा हूँ। तो जब आपकी टीचिंग मिली मुझे और क्लैरिटी (स्पष्टता) आयी तो दूसरों के साथ भी शेयर करने का दिल किया कि दूसरों को भी बताएँ। पर ये जो इंट्रोवर्जन है ये बीच-बीच में रास्ते में आ जाता है; जैसे बंधन बन जाता है। तो दिक्क़त आती है। तो इस विषय में कुछ मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: देखो अध्यात्म या वेदान्त में इंट्रोवर्जन, एक्स्ट्रोवर्जन अंतर्मुखी, बहिर्मुखीऐसी कोई चीज़ होती ही नहीं है। ये दोनों शब्द जानते हो कहाँ से आये हैं? कहाँ से आये हैं? किसने दिए हैं ये दोनों शब्द? येअभी पिछले सौ साल की साइकोलॉजी, मनोविज्ञान से आए हैं। और इन शब्दों को देने वाले कौन थे? पता करके आइयेगा किसने दिए हैं शब्द। ठीक है? बहिर्मुखी किसको आप बोलने लग जाते हो? जो दूसरों के साथ घुलमिल लेता है, दूसरों से बात कर लेता है ,दूसरों की तरफ ज़्यादा आसानी से चला जाता है। अन्तर्मुखी उसको बोलते हो जो ज़्यादा अपने में रहता है। जो अगर किसी महफ़िल में जायेगा तो कोई कोना पकड़ लेगा।

मनोविज्ञान की दृष्टि से ये दोनों बहुत अलग हो सकते हैं। अध्यात्म की दृष्टि से ये दोनों बहुत अलग नहीं हैं। इसीलिए आपको अध्यात्म में इस तरह का कोई विभाजन सुनने को ही नहीं मिलता। बहिर्मुखी, अंतर्मुखी वगैरह। ऐसा कुछ नहीं मिलता। क्यों? क्योंकि जो बाहर को जा रहा है। वो किसी दूसरे व्यक्ति की संगति कर रहा है। और जो अपने साथ रह रहा है वो भी तो किसी दूसरे की संगति कर रहा है। ये भी कौन है? (अपने कंधे को थपथपाते हुए) पराया ही तो है। एक तुम पराया मेरे लिए, एक ये पराया मेरे लिए। मैं तुम से ज़्यादा बात करूँ कि मैं अपनेआप से ज़्यादा बात करूँ। बात तो एक ही है न? पर ये जो बात है ये मनोविज्ञान समझेगा ही नहीं। क्योंकि मनोविज्ञान ख़ुद जीता है देह भाव में। मनोविज्ञान के लिए वो अलग है ये तो मैं हूँ ।अध्यात्म के लिए वो भी पराया और ये भी पराया। तो तुम उसके साथ जा करके गपशप कर रहे हो या चाहे आत्म-संवाद कर रहे हो अपने साथ ही। देखा है न? लोग अपनेआप से ही बड़बड़ाते रहते हैं या अपने ही ख़यालों में गुम रहते हैं।

वेदान्त कहता है दोनों एक ही बात है। सिर्फ़ एक संगत होती है जो भली होती है। और वो है आत्मा की संगति। तो बाहर वाले की संगति बेशक कर लो अगर बाहर वाला तुम्हें ले जा सकता है आत्मा की तरफ। और अपने विचारों की संगति भी बेशक कर लो अगर तुम्हारे विचार ऐसे सुविचार है कि तुम को आत्मा की ओर ले जाएँगे। अगर कुछ है जो तुम्हें सच्चाई तक ले जाता है तो वो बाहर मिले कि भीतर मिले, जहाँ भी मिले उसको ले लो। और जो कुछ भी तुम्हें सच्चाई तक, शांति तक नहीं ले जा रहा, वो चाहे यहाँ से उठता हो, चाहे किसी और से आता हो। बराबर का व्यर्थ है न? बात समझ में आ रही है? बात आ रही है समझ में?

ये बड़ी बहस चलती है। जिसमें अक्सर माना जाता है कि जो लोग अंतर्मुखी होते हैं उनमें ज़्यादा गहराई होती है, उनमें ज़्यादा सृजनात्मकता होती है, वगैरह-वगैरह। और जो इंट्रोवर्ट्स होते हैं उन्हें बड़ा अच्छा लगता है। कहते हैं चलो। कहीं जाते हैं दावत वगैरह में। वहाँ तो कोई हमें ज़्यादा सम्मान मिलता नहीं, पूछता नहीं क्योंकि हम दुबक जाते हैं इधर-उधर। पर हमको ये तो मिला कि जो इंट्रोवर्ट होता है, वो ज़्यादा गहरा आदमी होता है, ऐसा कुछ नहीं। दोनों बराबर के हैं। वेदान्त तो बताता है कि ये जगत तुम्हारा प्रक्षेपन मात्र है। जैसे कि तुम अपना ही प्रतिबिंब देखते हो दर्पण में। जगत ऐसा है। तो तुम अगर बाहर वाले से भी बात कर रहे हो तो अपने से ही तो बात कर रहे हो। तुम आईने में बात करे जा रहे हो तो किस से बात कर रहे हो? ख़ुद से ही बात कर रहे हो। अब आईने में न बात करो। किसी भी दिशा में मुँह करके बड़बड़ाने लग जाओ, कहो कि स्वयं से बात कर रहा हूँ। एक अंतर्मुखी-संवाद है वो। तो वो भी वही बराबर की बात है। जो इधर है, वही उधर है। जो भीतर है वही बाहर है और दोनों माया हैं। भीतर की माया ही बाहर जगत बनकर प्रकट हो जाती है। तो तुम अपने ख़यालों में गुम रहो, चाहे दुनिया में मगन रहो।

अन्तर कहाँ हैं? अन्तर जिसमें होता है वो एक तीसरा आदमी है। वो न इंट्रोवर्ट है, न एक्स्ट्रोवर्ट है और वो इंट्रोवर्ट भी हो सकता है, एक्स्ट्रावर्ट भी हो सकता है। वो आदमी दूसरे तल का है। उसको इस बात से मतलब ही नहीं है कि अलग वो कौन? मैं कौन ? वो कह रहा है और जहाँ कहीं भी, जो कुछ अच्छा मिलेगा मुझे चाहिए। और जहाँ कहीं भी कुछ व्यर्थ का है मुझे उसको छूना ही नहीं है, मतलब ही नहीं है। हो सकता है मेरी प्रकृति इंट्रोवर्जन की हो पर सामने अगर कोई ऐसा है जिससे बात करना उपयोगी है तो मैं अपनी प्राकृतिक वृत्ति को अलग रखकर उधर जाऊँगा और बात करके दिखाऊँगा। और हो सकता है कि मैं बहिर्मुखी हूँ, मेरी प्राकृतिक वृत्ति ये है की कही मिल जाए दो-चार लोग तो लगो बक-बक करने उनके साथ। लेकिन अगर मुझे समझ में आ गया है कि उनके साथ बक-बक करना मेरे लिए घातक है तो मैं अपनी वृत्ति को दबा दूँगा। मैं उनके निकट नहीं जाऊँगा। ये तीसरा आदमी है। हमें ऐसा आदमी चाहिए, तीसरा।

कुछ आ रही हैं बात समझ में? इसमें आपकी चेतना की कोई बात नहीं होती है। अंतर्मुखी, बहुर्मुखी ये सब, ये तो प्राकृतिक गुण है। बचपन से ही तो ऐसे होते है। बचपन से मैं भी यही हूँ इंट्रोवर्ट। मुझे यहाँ मत बैठाओ, वहाँ कहीं बैठा दो। मैं किसी से कोई बात ही नहीं करूँगा। छः घंटे चुपचाप बैठा रहूँगा। लेकिन जब ज़रूरत है तो बोल रहा हूँ। जब ज़रूरतत नहीं होगी तो काहे को बोलना? ‘आदमी चाहिए जो अपनी हर वृत्ति के खिलाफ़ जा सके।’ चाहे वो इंट्रोवर्जन की वृति हो, चाहे एक्स्ट्रावर्जन की। इसको अपनी पहचान मत बना लेना। ये समझ में आ रही है बात?

कार्ल यंग ने इस पर काफी काम करा है। ठीक है? और वो उपयोगी भी है काम। लेकिन वेदान्त की गहराई अलग है। पश्चिमी मनोविज्ञान ने जितना भी काम करा है, उसमें एक मूल भूल है वो ये कि वो द्वैतात्मक है, वे जगत को सत्य मानकर काम करते हैं। और भगवद्गीता को देखोगे तो एक तरह से वो भी मनोविज्ञान का ही ग्रन्थ है। पर वो द्वैतात्मक नहीं है। वो जगत को सत्य मानकर काम नहीं करता। पश्चिम को ये कभी ख़याल ही नहीं आया। ये बात सपने में भी नहीं सूझी पश्चिम को कि ऐसा हो सकता है कि ये सब कुछ जो दिख रहा है ये बस एक अनुभव मात्र हो, सत्य न हो। क्या आवश्यक है कि जो कुछ भी आपको अनुभूत होता हो वो सत्य ही हो? बोलिए। पश्चिम ने कहा नहीं, अगर मुझे अनुभव हो रहा है तो सत्य ही होगा। अगर मुझे ये दीवार दिख रही है तो ये सत्य होगी।

भारत एक कदम आगे गया। भारत ने कहा नहीं, मैं सवाल उठाना चाहता हूँ, मुझे कैसे पता कि जो कुछ मुझे दिख रहा है वो सत्य है? ऐसा भी तो हो सकता है कि वो मात्र मेरा अनुभव हो। सपना भी तो दिखता हैं। सपना दिखता नहीं क्या? जब सपना दिख रहा होता है तब यही लगता है कि सत्य है। पर क्या वो सत्य होता है? नहीं होता न। तो क्या पता ये जो जागृत अवस्था का संसार है ये भी स्वप्नवत ही हो। भारत ने यह प्रश्न करा है। पाश्चात्य मनोविज्ञान ने ये प्रश्न कभी भी नहीं करा। वो कहते हैं, ‘दिखता है तो होता है।’ अब वही पर फिर बात फँस जाती है। क्योंकि जब आप कहते हो कि जो मुझे दिख रहा है वो सत्य है। तो वहाँ पर आपने सत्य से भी ऊपर किसको बैठा दिया? आप कह रहे हो मुझे दिख रहा है इससे प्रमाणित होता है कि सत्य है। तो इसमें आपने सत्य से भी ऊपर किसको बैठा दिया है? स्वयं को। तो ये बात गहरे अहंकार की हो गई। और जहाँ अहंकार है वहाँ दुख है। आयी बात समझ मे? तो इस तरह की चीजों को अपने पीछे छोड़ो। कि मैं तो इंट्रोवर्ट हूँ। अपने कर्तव्य का पालन करो।

कोई भरोसा नहीं है कि प्राकृतिक दृष्टि से स्वयं श्रीकृष्ण भी क्या रहे हो? क्या भरोसा? हो सकता है वो भी इंट्रोवर्ट ही रहे हो। क्योंकि प्रकृति के गुण तो सब में होते हैं। ठीक वैसे जैसे दो हाथ होते हैं, दो आँखें होती है। श्रीकृष्ण के भी थे न ये सब? तो ऐसे ही प्रकृति के अन्य गुण भी उसमें थे। क्या पता उनमें भी अंतर्मुखी होने का गुण रहा हो। गुण माने ऐट्रिब्यूट, गुण माने अच्छाई नहीं ।आध्यात्म में गुण का अर्थ होता है बस ऐट्रिब्यूट। गुण, दोष एक ही बात होते हैं आध्यात्म में। गुण और दोष। गुण और दोष एक ही है। आपकी सामान्य भाषा में गुण का मतलब होता है वर्च्यू, अच्छाई। आध्यात्म में गुण मतलब अच्छाई नहीं होता। समझ में आ रही है बात?

तो ये सब बातें छोड़ दो कि जैसे किसी को कद मिल गया है एक तरह का, वैसे ही किसी को एक मानसिक रुझान मिल गया है कि बहिर्मुखी हूँ। जैसे कद को बहुत महत्त्व नहीं देना वैसे ही अपने बहिर्मुखी होने को नहीं देना। प्रकृति ने किसी को पुरुष बना दिया, किसी को स्त्री बना दिया, इस बात को क्या इतना महत्त्व देना है। स्त्री जब जलती है तो क्या अलग तरह की राख बनती है? लिपस्टिक वाली। जलकर तो राख उसको भी होना बराबर की राख। कौए लोट रहे हैं उसमें। मज़े कर रहे हैं। कह रहे हैं जो थोड़ा काला रंग और चमक जाएगा हमारा। ये जीवन भर गोराई ही बढ़ाती रह गई। राख भी गोरी गोरी होनी चाहिए थी। हुई नहीं। ये सब प्रकृति की बातें हैं, मिट्टी को मिट्टी जानो। उसके जो छोटे-छोटे भेद हैं उनको इतना महत्त्व नहीं देते।

व्यक्ति का मूल्यांकन उसके प्राकृतिक गुण-दोषों के आधार पर नहीं उसकी चेतना के आधार पर करो। और कुछ मत देखो उसमें। ‘जात न पूछो साधु की।’ कुछ भी मत देखो। मत देखो कहाँ से आ रहा है, मत देखो क्या उम्र है क्या लिंग है, धर्म, जाति, पृष्ठभूमि कुछ मत देखो। बस चेतना देखो। आ रही बात समझ में? या अंतर्मुखी हो इसलिए मुझे नहीं सुनोगे, अपनेआप को सुनोगे। कि ये तो एक्स्ट्रावर्ट्स करते है न कि दूसरो के पास जाएँ, उनसे बात करे। मैं तो इंट्रोवर्ट हूँ। मैं तो अपनी सुनूँगा। जो इंट्रोवर्ट है वो मौन नहीं हो गया है। मौन होना अधियात्मिक बात है। वो बस अपने साथ हो गया है। और अपनी संगति बाहर वाले की संगति से कोई बेहतर नहीं होती है। ये बात समझो अच्छे से। जो भीड़ के साथ है वो तो एक स्थूल भीड़ के साथ है। जो अपने साथ है वो एक सूक्ष्म भीड़ के साथ है। क्योंकि वही जो आपको बाहर दिखाई देती है वो आपके खोपड़े में भी तो नाच रही है न?भीतर क्या ये सब नहीं भरे हुए– मामे ,चाचे ,ताऊ ,फूफी। ये सब भीतर भी तो घूसे हुए हैं। हो सकता हैतुम इनसे बाहर-बाहर नहीं बात कर रहे। पर ये तुम ख़यालों में हो।, ख़यालोंके साथ तुम भीतरी संगत कर रहे हो इनकी। क्या अन्तर रहा ? ये बात आई है समझ में? कोई फ़र्क पड़ता है? हॉल में जाकर के मूवी देख रहे हो पाँच सौ लोगों के साथ या कुछ दिन ठहर करके घर में अकेले देख रहे हो ओटीटी पर। यही अन्तर हो गया लगभग इंट्रोवर्ट एक्स्ट्रोवेर्ट में। मूवी तो एक ही है न? वहाँ पाँच सौ लोगों के साथ देखी और यहाँ अकेले देखी। पर पिक्चर तो वही है। अधियात्मिक आदमी वो है जो तस्वीर ही बदल देता है। पिक्चर ही बदल दी। वो ये नहीं कहता कि पिक्चर अभी बाकी है, वो कहता है पिक्चर ख़तम कर दी। पिक्चर खत्म हो गई मेरे दोस्त! अब सच्चाई शुरू होती है।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद! आचार्य जी।

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