उनके लिए, जिन्हें ऊँची ज़िन्दगी चाहिए || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश (2022)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मैंने नवम्बर वाला शिविर अटेंड किया था। वहाँ मैंने आपसे एक प्रश्न पूछा था विचारों को लेकर। और आपने दो चीज़ें बताईं थीकि एक तो ध्येय आपका सही होना चाहिए और निकटता होनी चाहिए उससे| एक आपने सूत्र भी दिया था कि ध्येय से प्रेम को ही ध्यान कहते हैं। तो इस पर आचार्य जी काफ़ी काम किया और इससे काफ़ी लाभ भी मिला लेकिन एक चीज़ अभी हाल ही में, अभी मैं वॉलेंटियर के रूप में जुड़ा हूँ इस शिविर में तो यहाँ पर आकर मुझे लगा कि जो ऊर्जा मैं लगा पा रहा हूँ, जितना मेरा यूज़ यहाँ पर मतलब जितना मैं अपने फुल पोटेंशियल का यूज़ यहाँ कर पा रहा हूँ उतना मैं अपने काम में नहीं कर पाता हूँ।
तो आचार्य जी इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? जैसे यहाँ अगर मुझे ठीक से नींद भी नहीं मिल रही है तो कोई माथे पर शिकन नहीं है ना कोई थकान नज़र आती है लेकिन वही ऊर्जा जब मैं दूसरे कामों में लगाना चाहता हूँ तो लगती है ऊर्जा लेकिन उसे लेवल स्तर पर ट्रांसलेट नहीं हो पाती।
आचार्य प्रशांत: देखो, ऊर्जा हमारे पास बहुत सारी होती है लेकिन हमें वह उपलब्ध उतनी ही होती है जितनी हमें उसकी ज़रूरत होती है। समझ रहे हो?
घरों में चार बर्नर वाले चूल्हे उपलब्ध होते हैं न आजकल| होते हैं कि नहीं? तो चारों होते हैं उपलब्ध पर आपको करना कुल इतना है कि थोड़ा सा पानी उबालना है, थोड़ा सा। ठंड बहुत है तो आपको लग रहा है कि पीने से पहले पानी थोड़ा सा गर्म कर लें। तो कितने बर्नर जला देते हो?
ऐसे समझ लो जैसे भीतर चार इंजन हों लेकिन उनमें से फायर उतना ही करेंगे जितनों की ज़रूरत होती है। जितना बड़ा काम उठाओगे न भीतर ऊर्जा उतनी ही खुलेगी। जब काम बड़ा उठाया ही नहीं जीवन में तो छोटी–मोटी कम ऊर्जा भी रहती है तो चल जाता है। उसमें नुक़सान नहीं है कि छोटे काम के लिए कम ऊर्जा से काम चल गया है। नुक़सान यह होता है कि लगातार छोटे ही काम करते जाओ और लगातार कम ऊर्जा से ही काम चलाते जाओ तो एक बिंदु के बाद ख़ुद को ही ऐसा लगने लगता है जैसे कि हमारे पास तो बस इतनी ही ऊर्जा है। हमें भरोसा आ जाता है कि हम इससे बड़ा कुछ कर ही नहीं सकते क्योंकि हमारे पास इससे ज़्यादाऊर्जा है ही नहीं। इतना ही नहीं फिर कोई अगर बड़ा काम हमारे सामने आ भी जाता है तो हम उसे मना कर देते हैं यह कहकर कि इतनी तो हमारी सामर्थ्य ही नहीं है।






