आचार्य प्रशांत: महाशिवरात्रि का समय है और आपकी बहुत-सी जिज्ञासाएँ आयी हैं। आपने कहा कि जैसे अभी पूरी बात समझायी आपने कि ईश्वर माने क्या, आत्मा माने क्या, माया माने क्या, चार राम कौन से होते हैं — और श्री कृष्ण की गीता पर तो लंबे और पूरे व्याख्यान होते ही रहते हैं — तो वैसे ही अलग-अलग शब्दों में आपने कहा है कि अब महाशिवरात्री के समय पर, शिव पर भी पूरी बात करी जाए, शिव कौन हैं।
तो मैंने सोचा कि शिव पर तो मैं इतना बोल चुका हूँ, इतनी बार बात कर चुका हूँ, पूरी हमारी एक पुस्तक ही है शिव पर 'शिवोऽहम्' नाम से और अगर आप विडियोज़ ढूँढ़ रहे होंगे, तो सैकड़ों नहीं तो दर्ज़नों विडियो तो होंगे ही शिव पर। तो अपनी बात तो मैं भरपूर कर ही चुका हूँ।
आज क्यों न शिव को उनके ही माध्यम से आप तक लाया जाए, जिन्होंने शिवत्व को समझा है। तो आज आचार्य शंकर, आदिशंकराचार्य का ‘निर्वाण षट्कम', ‘अवधूत गीता', लाल देद माने लल्लेश्वरी देवी के कुछ वाक्, अक्का महादेवी के कुछ वचन और इसके अलावा अगर संभव हुआ तो कुछ शैव उपनिषदों से कुछ श्लोक लेंगे। जिससे यह बिलकुल स्पष्ट हो जाएगा कि शिव कौन हैं।
आपने जो प्रश्न भेजे हैं, जो जिज्ञासाएँ करी हैं, वो सीधे-सीधे यही नहीं हैं कि शिव कौन हैं। यह तो मैं चाहता हूँ कि मैं आपसे बात करूँ कि शिव माने क्या। आपके प्रश्न बहुत तरीक़े के हैं। उदाहरण के लिए आपने पूछा है कि 'क्या कैलाश पर्वत पर कुछ पारलौकिक शक्तियों का वास है?' आपने पूछा है कि 'डमरू का क्या महत्व है?' आपने पूछा है कि 'शिव के जो हमें अनेक रूप बताए जाते हैं, वो सब क्या हैं?'
तो मैंने सोचा कि शिव के विषय में जो इतनी बातें हैं जिनमें से अधिकांश मात्र भ्रांतियाँ हैं, उन बातों को लूँ और उनमें से एक-एक का परिक्षण करूँ और फिर उनको नकारूँ, उससे कहीं बेहतर है कि जो एक मूल बात है — ठीक, सीधी, साफ़, सच्ची — वो आपसे कर दी जाए।









