प्रश्नकर्ता: 'मैं ये नहीं हूँ' ये बात मुझे मन के तल पर तो समझ में आ गयी है, लेकिन ये मेरे जीवन में कैसे उतरे?
आचार्य प्रशांत: 'मैं नहीं' एक निगेशन (नकार) है। वो निगेशन किसी चीज़़ का ही हो सकता है, कुछ होगा तभी तो उसे निगेट करेंगे। जैसे ही भीतर से एक आवाज उठेगी, एक प्रतिक्रिया उठेगी। आपको चोट लग गयी, आपको डर लग गया या आप बहुत खुश हो गये, तो भीतर से कोई बोल रहा है, ‘मैं खुश हूँ। मैं हूँ, 'मैं हूँ। मैं कुछ भी हो सकता हूँ। मैं या तो खुश हो सकता हूँ, मैं दुखी हो सकता हूँ।’ तो जब वो उठेगा, तब उसका निषेध करना है, तब वक्त है बोलने का ‘मैं नहीं’। तब वक्त है बोलने का।
जब भीतर से कुछ उठ ही नहीं रहा तो 'मैं नहीं' बोलकर क्या करेंगे? किसको मना कर रहे हैं, कोई आवाज़ ही नहीं दे रहा तो मना किसको किया? पर दिन में पचास मौके ऐसे आएँगे जब भीतर से। यहाँ तक कि सुनिएगा ध्यान से, जब भीतर से कोई ये भी बोले कि मैं समझ रहा हूँ, मैं समझ रहा हूँ, मैं आचार्य जी की बात समझ रहा हूँ, मैं समझ रहा हूँ; तो उसमें भी उसने क्या कह दिया? 'मैं हूँ' और बीच में कुछ भी बोल दो पर तुमने कह तो यही दिया न कि मैं हूँ। और जैसे ही ये कोई बोले मैं समझ रहा हूँ, तो वहाँ भी यही बोलना है; क्या? ‘मैं नहीं। मैं नहीं, मैं नहीं।’
तो 'मैं नहीं' बोलने के मौके आपको बहुत मिलेंगे। ‘मैं नहीं समझ रहा हूँ।’ क्या बोल दिया?
प्र: ‘मैं हूँ।’
आचार्य: 'मैं हूँ' और तुरन्त क्या कहना है? भाई जो नहीं समझ रहा होगा, नहीं समझ रहा होगा, हमारा उस खेल से कोई लेना-देना नहीं है, 'मैं नहीं'। मैं पा रहा हूँ, मैं गँवा रहा हूँ, 'मैं हूँ'। और तब कौंध जाए कि…। ‘मैं देख पा रहा हूँ, मैं प्रेम में हूँ, मैं घृणा में हूँ। मैं प्रेम में हूँ तो भी 'मैं हूँ', मैं घृणा में हूँ तो भी ('मैं हूँ')।’ ये ज़बरदस्ती का आरोप है, क्योंकि मैं तो हूँ। ‘मैं महान हूँ’ इसमें भी तुम क्या हो लिये? हो लिये।







