प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी-अभी मेरी एक प्रवेश परीक्षा हुई थी, मैं उसमें फ़ेल हुआ। बाहर हो गया उससे तो काफ़ी ज़्यादा आहत हुआ था। अब मन नहीं लगता पढ़ाई में बिल्कुल भी और अब आगे कुछ करने का दिल भी नहीं कर रहा। बिना करे कुछ होगा भी नहीं, चाहता हूँ कुछ दोबारा करूँ पर दिमाग टिक नहीं रहा। निष्ठा नहीं है उसके लिए।
आचार्य प्रशांत: मन तो बेटा पहले भी नहीं कर रहा था, तभी तो नतीजा ऐसा आया है। ऐसा थोड़ी है कि मन ताज़ा-ताज़ा बेज़ार हुआ है। मन तो पहले भी उदासीन ही था, पर अपनेआप को तुम ठेले रहे कि परीक्षा देनी है, तो दे आये। और उसमें कुछ हुआ नहीं, होगा भी कैसे।
मन को थोड़ा भरोसा तो दिलाओ कि उससे जो करवाना चाहते हो, वो उसके हित में भी है। बच्चे को पकड़कर घसीटे लिये जा रहे हो बाज़ार की ओर, और वो मचल रहा है, इधर उधर हाथ-पाँव फेंक रहा है। उसको कुछ पता भी है, तुम उसको बाज़ार क्यों लिये जा रहे हो? उसे बाज़ार में हासिल क्या हो जाना है? बस एक संकल्प, एक इरादा और मन से कहते हो कि तू पीछे-पीछे आजा। और मन पीछे न आये तो कहते हो कि इसको नियंत्रण में कैसे लायें? अध्यात्म में कोई नुस्ख़ा है क्या?
जैसे बच्चे को लाया जाता है नियंत्रण में, वैसे ही तुम मन को नियंत्रण में लाते हो। कभी ललचा के, कभी उसको ठोक बजा के, कभी उसपर ज़ोर-ज़बरदस्ती करके। ये होते देखा है कि नहीं कि पिताजी बच्चे को घसीटे लिये जा रहे हैं बाज़ार की ओर और वो घिसट रहा है? वो हाथ छुड़ाना चाहता है, उसका हाथ ज़बरदस्ती पकड़ लिया है और अब उसने क्या शुरू कर दिया है? घिसटना! ऐसा तो तुम्हारा और मन का रिश्ता है, उसे घसीटे रहते हो।
अगर जो तुम कर रहे हो, वो वास्तव में तुम्हारे लिए हितकर है, तो मन को समझाओ कि कैसे हितकर है। या फिर बच्चे से ही पूछ लो कि तुझे क्या चाहिए और उसे समझा दो कि जो तुझे चाहिए वो बाज़ार में ही मिलेगा, तो मेरे साथ तू ज़रा सहयोग कर और बाज़ार की तरफ चल!




