प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक भजन पढ़ा जिसमें गुरु शिष्य को आदेश देते हैं कि जंगल जाकर ऐसी लकड़ी लेकर आओ जो न सूखी हो और न गीली हो। इसका मर्म समझाने की कृपा करें।
आचार्य प्रशांत: यह करीब-करीब ऐसा है जैसे जेन क़ुआन। कि लकड़ी लाना पर ऐसी लकड़ी लाना जो न गीली हो न सूखी हो। उसको खोजो जो पदार्थ नहीं है। तुम्हें रोटी चाहिए, उसको खोजो जो पदार्थ नहीं है वो तुम्हें रोटी दे देगा। इस वाक्य को तीन बार मन में दोहराओ। गुरु चेले से कह रहा है ‘तुझे रोटी चाहिए न, पूरी दुनिया रोटी के लिए दीवानी है। तू उस आटे की रोटी खा जो अन्न से उत्पन्न नहीं है। तुझे रोटी ही चाहिए न। तू उसको खोज जो पार्थिव नहीं है, भौतिक नहीं है। रोटी तुझे मिल जाएगी अपनेआप मिल जाएगी।‘ समझ रहे हो आप। और तुझे रोटी सेकने के लिए लकड़ी चाहिए तू वो लकड़ी खोज जो इस दुनिया की नहीं है।
आशय यह कि उसको खोज जो इस दुनिया का नहीं है लकड़ी तुझे फिर अपनेआप मिल जाएगी। तू अपना असली काम कर बाक़ी काम तेरे अपनेआप कोई और कर देगा। ऐसे समझ लो कि बड़ा स्थूल बड़ा क्रॉस एग्जाम्पल है लेकिन फिर भी काम का है। कोई बड़े ओहदे का अधिकारी होता है वो दिनभर अपना काम करता है और शाम को घर लौट के आता है, अपने कमरे में लौट के आता है तो वो क्या पाता है? खाना तैयार है, बिस्तर तैयार है, सफ़ाई कोई कर गया है, कपड़े कोई धो गया है। यह सब सुविधाएँ उसे उसके पीछे न जाने कौन दे जाता है। बात समझ रहे हो। और वो अधिकारी यह पता करने की चेष्टा भी नहीं करता कि मुझे यह सब किसने दे दिया। वो यह नहीं कहता कि सुबह तो मैं गया था तो बिस्तर और चादर गन्दी और सिलवटों भरी छोड़ के गया था, अभी लौट कर आता हूँ तो मेरा बिस्तर किसने तैयार कर दिया।
यह इनाम मिलता है आपको कि आपने दिनभर जो काम किया वो बहुत-बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण था, तो आपके छोटे काम आपकी पीठ पीछे अपनेआप हो जायेंगे। कोई और कर जाएगा। तुम वो काम करो जो बड़ा और महत्वपूर्ण है छोटा काम तुम्हारे पीठ पीछे कोई अपनेआप कर जाएगा। लेकिन जिनमें श्रद्धा नहीं होती वो क्या करते हैं? वो बड़ा काम किनारे रखकर वो छोटे की फ़िक्र में दिनभर लगे रहे जाते हैं। कि सब्जी काट लूँ, सब्जी ले लाऊँ, घर की पुताई कर दूँ, सफ़ाई कर दूँ और जीवन उनका फिर इसी में बीत जाता है। और उनसे पूछो कि बड़ा काम क्यों नहीं कर रहे तो वो कहेंगे फिर यह छोटा कौन करेगा! छोटा अपनेआप हो जाता है और अगर तुम्हारे जीवन के छोटे काम उलझे हुए हैं तो इससे संदेश साफ़ है, तुम बड़े की परवाह नहीं कर रहे इसीलिए तुम्हारे छोटे काम भी उलझे हुए हैं।




