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संकल्पशक्ति बढ़ाने का ज़बरदस्त तरीका || आचार्य प्रशांत (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि संकल्प का बल कैसे बढ़ाया जाए?

आचार्य प्रशांत: संकल्प का जो बल है वो ऊँचे से ऊँचा तब होगा जब संकल्प का विषय ऊँचे से ऊँचा होगा। और यही उचित भी है क्योंकि अगर इससे अलग कुछ हो गया तो बात भयानक हो जानी है। किसी छोटे, क्षुद्र, निचले, विषय को लेकर के आपने बड़ा ज़बरदस्त संकल्प बना लिया तो आपको अधिक से अधिक हासिल भी होगा तो क्या? कुछ नहीं।

एक तो ये कि बहुत ज़्यादा कुछ हासिल होगा नहीं। दूसरी बात, ऊँचा विषय ही आपकी ऊँची ऊर्जा को जाग्रत कर सकता है। जब आप किसी ऊँचे विषय को लेकर के संकल्प बनाते हैं तो ही आपकी ऊँची ऊर्जा जाग्रत होती है। हममें से बहुत लोग कहा करते हैं कि आलस रह जाता है या इच्छाशक्ति नहीं उठती या मनोबल कुछ दूर चलकर टूट जाता है, उसकी वजह समझिए। आप जिस चीज़ की कामना कर रहे हैं, जिस चीज़ को लक्ष्य कर रहे हैं, वो इतना ऊँचा है ही नहीं कि उसके लिए बहुत जान या ताक़त या संकल्प लगाना पड़े। तो फिर आपकी ज़िन्दगी में बहुत ऊर्जा की ज़रूरत ही नहीं है, आप करोगे क्या उतनी ऊर्जा का, ऊर्जा उठती भी नहीं।

जितनी ऊँची चीज़ माँगोगे, उसके लिए उतने ज़्यादा प्रयत्न की ज़रूरत पड़ेगी न? जितने ज़्यादा प्रयत्न की ज़रूरत पड़ती है, भीतर से समझ लो उतनी ही शक्ति खुल जाती है। आपकी शक्ति अगर नहीं खुल रही तो उसकी वजह ही यही है कि आपके पास कोई ऊँचा लक्ष्य होगा नहीं। और ऊँचा लक्ष्य क्यों नहीं है? क्योंकि आप तर्क देते हो कि मेरे पास ज़्यादा शक्ति और ऊर्जा नहीं है। बाबा, शक्ति और ऊर्जा बाद में आती है, पहले क्या आता है?

प्र: लक्ष्य।

आचार्य: पहले वो लक्ष्य आता है जिसका आपने संकल्प किया। पर आप कहते हो, 'मैं अभी ज़िन्दगी को देख रहा हूँ, उसमें दिखायी पड़ रही है थोड़ी-बहुत शक्ति, थोड़ी ऊर्जा, थोड़ा मनोबल। तो इसी के अनुपात में मैंने अपने लिए एक छोटा सा लक्ष्य निर्धारित कर लिया।' वो छोटा सा लक्ष्य अगर मिल भी गया तो क्या मिला?

लेकिन आपको लगेगा कि मैंने तो अपनी शत-प्रतिशत ऊर्जा लगाकर के इस लक्ष्य को हासिल किया है। नहीं, आपको ऐसा लग रहा है कि आपने अपनी सारी ऊर्जा लगा दी है। आपने जितनी लगा दी है, आपके पास उससे दस गुनी ज़्यादा ऊर्जा थी पर वो सोयी पड़ी रही क्योंकि उसका कोई उपयोग ही नहीं था, वो क्या करती जगकर के, करती क्या जगकर के! आपने अपने लिए लक्ष्य ही यही बनाया है कि आपको यहाँ से उठकर उस दरवाज़े तक जाना है तो आप करोगे क्या दौड़ लगाकर के! साधारण चाल चलोगे तो भी पहुँच जाओगे, बहुत ऊर्जा की आपको ज़रूरत ही नहीं। समझ रहे हो?

जो भी छोटी-छोटी कामनाएँ हैं वो आपको सीमित ही नहीं रखती हैं, वो आपके मन में ये बात डाल देती हैं कि सीमित होना आपकी किस्मत है।

छोटी कामना ख़ुद ही छोटी नहीं है वो आपको भी छोटा बना देती है। बड़े की माँग करिए, बड़े की चाहत करिए। बड़े से मतलब समझ रहे हो? आध्यात्मिक भाषा में बड़े का क्या अर्थ होता है? वो जो आपका आन्तरिक छुटपन मिटा दे। आन्तरिक छुटपन क्या होता है? किसी से दो रुपये झपट लिये, किसी को आगे बढ़ते देखा तो ईर्ष्या होने लग गयी, किसी ने थोड़ा धमका दिया तो डर गये, कहीं कुछ ग़लत होते भी देखा तो कहा, 'इसमें मेरा क्या जाता है!' ये आन्तरिक छुटपन है।

तो फिर बड़ा लक्ष्य क्या हुआ? कुछ ऐसा पाने निकलिए, कुछ ऐसा करने बढ़िए जो आपके भीतर इन चीज़ों को बचा न रहने दे। आप अपनेआप को भूल जाएँ जिसकी सेवा में वो लक्ष्य बड़ा कहलाता है। आप अपनी सब छोटी-छोटी ख़्वाहिशों को एकदम बस भूल ही जाएँ बिना कोशिश किये, ऐसा लक्ष्य बड़ा कहलाता है। और ऐसा बड़ा लक्ष्य जब आप बना लेते हैं तो फिर देखिए कि भीतर से कितनी जान अपनेआप उठती है, उठनी ही पड़ेगी। समझ रहे हो?

छोटी माँगों में एक छोटी ज़िन्दगी जीना, और छोटे ही बन कर रह जाना, इसमें कुछ नहीं रखा है। यही करते-करते एक दिन ख़त्म हो जाओगे। 'मेरी इच्छा, मेरा पैसा, मेरी इज़्ज़त', इनमें कुछ नहीं रखा। कुछ समझ में आयी बात?

बड़ा काम वो नहीं होता जिसमें आपको बड़ा पैसा मिल रहा है, या दुनिया जिसमें आपको कह रही है कि ये तो बड़ी पदवी पर है, बड़ी कम्पनी में है, करियर प्रॉस्पेक्ट्स (रोज़गार के अवसर) अच्छे हैं। बड़ा काम वो नहीं होता। बड़ा काम वो होता है जो आपको छोटा न रहने दे। वो काम ऐसा है कि अगर उसे पूरा करना है तो तुम्हें भीतर से ख़ुद को बदलना पड़ेगा। तुम, तुम रहकर उस संकल्प को पूरा ही न कर पाओ, ऐसा संकल्प बड़ा कहलाता है। कि हम जैसे हैं, अगर हम ऐसे ही रह गये तो ये संकल्प तो कभी नहीं पूरा होगा। इस काम को करने के लिए हमें बढ़ना होगा, सुधरना होगा, मिटना होगा, ऐसा काम बड़ा कहलाता है।

जो काम आप जैसे हैं वैसा रहते हो जाए, वो काम शायद करने लायक़ ही नहीं है। और आप जैसे हैं उसी हालत में आपसे जो काम हो जाएगा अक्सर उस काम के एवज में आपको रुपया-पैसा खूब मिल जाता है। आप बोलते हो न नौकरी के इंटरव्यू में कि ये मेरी स्ट्रैंथ्स (ताक़तें) हैं और ये मेरे स्किल सेट्स (कौशल) हैं। और आप अपना स्ट्रैंथ्स बताते हो, स्किल-सेट्स बताते हो तो खट से आपको वो काम दे दिया जाता है जिसके लिए आप पहले से ही तैयार हो। जो काम पहले ही आपके स्किल-सेट्स में और आपकी स्ट्रैंथ्स में शामिल है, आपको वो काम दे दिया जाता है। दे दिया जाता है न?

अब बताओ ये काम तुम्हारे लिए चुनौती बनेगा ही क्यों? ये काम तुम्हें क्यों चुनौती देगा? ये काम तुम्हें क्यों तोड़ेगा, मरोड़ेगा? इस काम के लिए तो आप पहले से ही तैयार हैं। और हम सोचते हैं हमने बड़ी होशियारी का काम किया कि जिस काम में मैं पहले ही दक्ष था, निपुण था, मैंने वही काम ले लिया।

साहब मुँह खूब चलाते थे, 'बक-बक-बक-बक बक-बक-बक-बक', तो एमबीए इन मार्केटिंग कर लिया और उसके बाद अब सेल्स (बिक्री) की जॉब (नौकरी) ले रहे हैं। इसमें हो सकता है सैलरी (वेतन) बड़ी हो पर ये काम तुम्हारे लिए बहुत छोटा है। मैं नहीं कह रहा हूँ सेल्स का काम छोटा होता है, बात समझिएगा।

मैंने ये बिलकुल नहीं कहा कि सेल्स का काम छोटा है, मैं कह रहा हूँ ये काम तुम्हारे लिए छोटा है क्योंकि ये काम तुम्हें भीतर से बदलने पर मजबूर नहीं करेगा। तुम जैसे थे, ये काम तुम्हें बिलकुल वैसा ही रखेगा, बल्कि इस काम में तुम्हें अपने पुराने सेल्फ़ (स्वयं) को क़ायम रखने पर ही पारिश्रमिक मिलेगा। तुम्हारा जो अतीत से चला आ रहा वजूद है, तुम उसी को इस्तेमाल करके ये काम करोगे और ये काम तुम्हें उसी चीज़ के पैसे दे देगा, तो तुम्हारा वजूद बदलेगा काहे को? ये काम तुम्हारे लिए बहुत छोटा काम है, कर मत लेना।

काम वो करो जो इतना बड़ा हो, इतना बड़ा हो कि तुम्हें भीतर से तोड़ दे। जो काम तुम आसानी से कर ही सकते हो उसको करने में रखा क्या है? जो काम तुम बहुत आसानी से कर सकते हो, उसे झट से कह दिया करो, 'बोरिंग! ये तो हो जाएगा, ये हमें भीतर से न चुनौती देगा न तोड़ेगा।' समझ में आ रही है बात?

अब ये आपके दुस्साहस पर है कि आप कितना ऊँचा काम पकड़ते हो, क्योंकि जितना ऊँचा काम पकड़ोगे वो उतना ही ज़्यादा आपको तोड़ेगा। आप टूटने के लिए कितना तैयार हो, आपकी रज़ामन्दी निर्धारित करेगी आप कितना ऊँचे जा सकते हो।

और ज़िन्दगी में ये काम तो कभी करना नहीं कि जो कुछ तुमको भाग्य से, संयोग से, प्रकृति से या अतीत से मिल गया है उसी को काम बना लो और उसी की रोटी खाना शुरू कर दो। उदहारण के लिए, खानदानी पैसा मिल गया है, उसी को खाना शुरू कर दिया, या प्रकृति ने तुमको गोरा-चिट्टा-आकर्षक, कह लो सेक्सी सा बनाकर के पैदा कर दिया है तो तुमने उसी की रोटी खाना शुरू कर दिया। कुछ नहीं रखा है।

इसमें मैं उनको भी जोड़ूँगा जिनको आप जन्मजात प्रतिभाएँ कहते हैं, कि फ़लाना पैदा हुआ था और उसमें बड़ी जन्मजात प्रतिभा थी गणित की। अब गणित की प्रतिभा थी तो क्या करते थे साहब? कि दसवीं-बारहवीं में जो गणित का स्तर था उसको इन्होंने पाँचवी-छठी या सातवीं-आठवीं में ही हल कर लिया था। इनमें कुछ नहीं रखा है क्योंकि तुम वही कर रहे हो जो करने के लिए प्रकृति ने, संयोग ने और अतीत ने और विरासत ने तुमको पहले ही तैयार कर रखा है। तो तुम जो कर रहे हो उसमें तुम्हारी आन्तरिक तरक़्क़ी कहाँ हुई? तुम्हें आन्तरिक चुनौती कहाँ मिली बताओ न, कहाँ मिली?

हाँ, तुम्हें सांसारिक सफलता ज़रूर मिल जाएगी, ज़बरदस्त रूप से मिल जाएगी, क्योंकि तुम्हारे पास तो पहले से ही संसाधन तैयार था। वो संसाधन तुम्हें किसने दे रखा था? प्रकृति ने दे रखा था, या अतीत ने दे रखा था, या संयोग ने दे रखा था। तो वो सब तुम्हारे पास पहले से ही था तो तुम्हें सांसारिक सफलता तो जल्दी मिल जाएगी लेकिन आन्तरिक तौर पर तुम कुंठित के कुंठित और छोटे के छोटे ही रह गये।

प्रतिभाबाज़ी भी खूब चलती है। आइआइटी हो, आइआइएम हो, यहाँ ऐसे बहुत लोगों को देखता था जिनका स्पष्ट था कि ये प्रतिभा ही अलग क़िस्म की है, इनका ब्रेन , इनका मस्तिष्क ही अलग क़िस्म का है। उन्हें मेहनत नहीं करनी पड़ रही। जितनी देर में आप एक सवाल को समझते हो उतनी देर में वो उसको हल कर देते हैं, इंजीनियरिंग का हो सकता है, इकोनॉमिक्स का हो सकता है, साइंसेज़ का हो सकता है। प्रतिभा बहुत थी लेकिन जीवन कुछ नहीं, क्योंकि जीवन, प्रकृति ने आपको क्या गुण दिये हैं इससे नहीं निर्धारित होता।

जीवन निर्धारित होता है कि प्रकृति ने आपको जो कुछ दिया है आपने उसको किसकी सेवा में डाल दिया, आपने उसको किस लक्ष्य, किस संकल्प को समर्पित कर दिया। प्रकृति ने आपको बहुत ज़बरदस्त मस्तिष्क दे दिया, आप प्रोडिजी (विलक्षण गुण सम्पन्न मनुष्य) हो बिलकुल, लेकिन ले-देकर आप कर क्या रहे हो उसका? आप उसका ये कर रहे हो कि अब मैं जाकर के किसी एमएनसी में अपनी प्रतिभा को बेचूँगा और पैसे कमाऊँगा। उससे तुम्हें क्या मिल जाएगा?

बहुत सारे पैसे मिल जाएँगे, बेशक, सांसारिक रूप से यही कहलाओगे कि देखो कितना सफल है, कितना सफल है! आइआइटी से कंप्यूटर साइंस उसके बाद एमआइटी से पोस्ट ग्रेजुएशन और डॉक्टरेट भी। और उसके बाद दुनिया की जो इस वक़्त सबसे बड़ी टेक फ़र्म है उसमें डायरेक्टर है। लेकिन बन्दा तो अभी भी इतना सा ही है वो (हाथ से छोटे का इशारा करते हुए)। इतना सा है वो, क्योंकि वो जो कुछ कर रहा है वो बस प्रकृति के गुण उससे करवा रहे हैं। उसकी प्राकृतिक प्रतिभा उससे करवा रही है, उसमें उसका अपना कुछ नहीं है।

ये अन्तर करना सीखो, तुम अलग हो और प्रकृति ने तुम्हें जो कुछ दिया वो अलग है। प्रकृति ने तुम्हें हो सकता है रूप, गुण दे रखे हों, बिलकुल एक आकर्षक, मनोहारी व्यक्तित्व दे रखा हो और हो सकता है कि प्रकृति ने तुम्हें एक ज़बरदस्त मस्तिष्क दिया हो, बिलकुल एक बात है।

यही मत कह देना — आमतौर पर लड़कियों को कहते हो न — कि देखो इसको कितनी कमसिन काया बख़्शी है कुदरत ने। वो लड़की और वो जो प्रतिभाशाली छात्र है जिसको एक बढ़िया मस्तिष्क मिला है, बिलकुल एक ही तल पर हैं। एक को ज़बरदस्त रूप मिला है और एक को ज़बरदस्त ब्रेन (मस्तिष्क) मिला है, वो दोनों एक ही तल पर हैं। लेकिन जब वो लड़का अपने ब्रेन की खाता है तो आप कहते हो, 'वाह-वाह-वाह, क्या बात है!' और वही वो लड़की अपना रूप का इस्तेमाल करके किसी लड़के को फँसा ले, उसी लड़के को फँसा ले ब्रेन वाले को और उसका पैसा खाना शुरू कर दे तो आप कहते हो, 'देखो, ये कितनी नालायक़ है। कुछ ज़िन्दगी में इसने किया नहीं, बस वो ब्रेन वाले लड़के को फँसा लिया है और अब मज़े मार रही है।' वो बिलकुल वही कर रही है जो वो लड़का कर रहा था। उस लड़के को प्रकृति ने क्या दिया था? ब्रेन दिया था। इस लड़की को क्या दिया था? रूप दिया था। दोनों, प्रकृति ने जो बख़्शा है उसको खा रहे हैं।

इन दोनों से अलग एक तीसरी स्थिति होती है, उसको पकड़ो। मैं कह रहा हूँ, उसका संकल्प करो। 'प्रकृति ने मुझे जो दिया है, मैं उसका खाऊँगी नहीं, मैं उसको किसी ऊँचे संकल्प को समर्पित करूँगी।' अहम् इसमें बहुत टूटता है, बहुत तड़फड़ाता है, वो कहता है, 'जो कुछ मिला है उसको खाओ न, खाओ न। उसको ये तुम कहाँ जा रहे हो लगाने के लिए, किसकी सेवा में? क्यों? खाओ न, खाओ न। ये जो ब्रेन मिला है इसका इस्तेमाल अच्छी सैलरी कमाने के लिए क्यों नहीं कर रहे? इस ब्रेन का इस्तेमाल अब तुम किसी और काम के लिए क्यों कर रहे हो?' अहंकार बहुत तड़पता है। अपना भी तड़पता है, दूसरों का भी तड़पता है।

मुझसे आज तक आकर के मेरे तथाकथित शुभचिन्तक कहा करते हैं, 'हे हे हे! बेटा, तुमको सबकुछ दिया था भगवान ने, चाहते तो आज तुम न जाने कहाँ होते, ये तुमने क्या कर लिया अपने साथ? देने वाले ने तो कोई कमी नहीं छोड़ी। टेक्नोलॉजी (प्रौद्योगिकी) भी समझते थे, मैनेजमेंट (प्रबन्ध) भी समझते थे, ब्यूरोक्रेसी (नौकरशाही) में भी घुस आये, पर खा किसी की भी नहीं पाये। वो सब खाया क्यों नहीं?'

नहीं, इसलिए क्योंकि वो सब अपने खाने के लिए होता नहीं है। तुम्हें जो कुछ दिया गया इसलिए नहीं दिया गया है कि उसको तुम खाना शुरू कर दो। तुम्हें जो दिया गया है वो इसलिए दिया गया है कि?

प्र: ऊँचे लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।

आचार्य: समझ आ रही है बात? गाड़ी की टंकी में पेट्रोल है, उसको पी जाओगे क्या? उसको क्या करना है? उसका इस्तेमाल करके गाड़ी चलानी है और ऊँची मंज़िल तक पहुँचानी है। बैठकर ये थोड़े ही करना है कि स्ट्रॉ डाल कर टंकी में पेट्रोल पी रहे हैं और फिर कह रहे हैं, 'देखो, मुझे जो मिला था विरासत में, मैं उसी का तो उपभोग कर रहा हूँ।'

तो पप्पा का पैसा मिल गया हो आपको, चाहे प्रकृति ने आपको रूप-लावण्य बख़्श दिया हो, चाहे प्रकृति ने आपको किसी और तरह का कोई टैलेंट (प्रतिभा) दे दिया हो, चाहे आपको बुद्धि दे दी हो, कुछ भी और दे दिया हो प्रकृति ने, ये सब आपके संसाधन हैं। जो कुछ भी आपको मिला हुआ है, ज्ञान, विरासत, रूप, बुद्धि, ताक़त, कुछ भी, ये सब क्या हैं आपके? रिसोर्सेज़। इनका क्या करना होता है? इस्तेमाल करना होता है। किसलिए करना होता है? ऊँचे उठने के लिए। और जब हाइएस्ट (सबसे ऊँचे) तक पहुँचना चाहते हो तभी ये सब संसाधन खुलते हैं, अनलॉक होते हैं। वरना ये चुपचाप सोये और लॉक्ड (बन्द) पड़े रहते हैं।

समझ रहे हो?

जब बोलते हो न, 'उतना ऊँचा चाहिए!' तब ये संसाधन जगते हैं, बोलते हैं, 'हाँ भई, अगर तुम्हें वो चाहिए तो हमारा इस्तेमाल करो। तुम्हें अगर कोई टुच्ची ही चीज़ चाहिए थी तो तुम्हें हमारी ज़रूरत ही नहीं थी।'

भई, आपके पास एक बीस लाख की एफ़डी (सावधि जमा) है और आप दन्त मंजन ख़रीदने निकली हैं तो एफ़डी तुड़वाने जाएँगी क्या? आपके पास एक बीस लाख रुपये का फिक्स्ड डिपॉज़िट है और आपको ज़िन्दगी में कुल चाहिए क्या? दन्त मंजन। तो वो एफ़डी तुड़वाने जाओगे क्या? तो वो एफ़डी अनलॉक कब होती है, टूटती कब है? जब कोई बड़ी चीज़ माँगो। कुछ बड़ा माँगो तो अन्दर की जो एफ़डी है वो टूटेगी।

समझ में आ रही है बात?

और बहुत बड़ी एफ़डी है भीतर, ज़बरदस्त, वो पप्पा जी (ऊपरवाले) ने अन्दर रखकर भेजी है। लेकिन वो मिलेगी नहीं आपको जब तक आपको उसकी वास्तविक ज़रूरत नहीं होगी। वो ज़रूरत पैदा करिए। ज़्यादातर लोग एफ़डी के साथ ही मर जाते हैं, चिता पर एफ़डी भी राख हो जाती है। वो जल रहे हैं, जेब में एफ़डी का सर्टिफ़िकेट (प्रमाणपत्र) पड़ा हुआ था, जल गया, वो भी जल गया। अन्दर पड़ा हुआ था, अन्दर वाली जेब में।

पप्पा जी ने जो भी दिया है, उसका उचित उपयोग करिए।

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