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किसी लक्ष्य, किसी योजना पर चल नहीं पाते
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: हमें सब पता होता है कि हमारे लिए क्या अच्छा है, क्या बुरा है, हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए क्या करना है, मगर फिर भी हम वो नहीं कर पाते। हर बार एक नया लक्ष्य तय करते हैं, नया जोश होता है, नई प्लानिंग (योजना) करते हैं मगर कुछ दिन या देर बाद यह सब फिर से जस-का-तस हो जाता है। ऐसा मेरे साथ कई सालों से हो रहा है। कुछ थोड़ी बहुत सफलता तो मिली है लेकिन उच्चतम स्तर तक अभी नहीं पहुँच पाया हूँ। कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: कौन हैं? किनका है? (प्रश्नकर्ता कुछ देर बाद हाथ उठाते हैं) तुम सवाल की ही ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हो तो ज़िन्दगी की कैसे लोगे? सवाल अपना मानस पुत्र होता है, उसको लावारिस नहीं छोड़ते। जिन लक्ष्यों को आज तक बनाया, उनकी ज़िम्मेदारी ली थी? ली होती तो छोड़ कैसे देते, या बस ऐसे ही लावारिस पैदा कर दिए थे?

प्रेम में जो कुछ आता है व्यक्ति कृतज्ञ अनुभव करता है उसकी ज़िम्मेदारी लेने को। और दबाव में और भ्रम में जो कुछ आएगा तुम काहे उसकी ज़िम्मेदारी लेना चाहोगे भाई! यूँ ही कोई लक्ष्य बन गया इधर-उधर के प्रभावों के कारण, मन की किसी लहर के चलते कोई उद्देश्य बना लिया तो तुम उस उद्देश्य के साथ इंसाफ करोगे नहीं क्योंकि तुम उसके साथ इंसाफ करना चाहोगे ही नहीं। उस लक्ष्य में तुम्हारा सरोकार ही कितना है, उस लक्ष्य में तुम्हारी आंतरिकता, आत्मीयता ही कितनी है, वो लक्ष्य तुम्हारा है ही कितना भाई! वो तो यूँ ही बन गया था।

चची और ताई ने मंत्रणा की कि चौपले पर तुम्हारी दुकान खुलवा दी जाए। तुम बड़े खुश हुए, खुलवा दी गई। फिर चचा और ताऊ ने मंत्रणा की कि महीने की दस लाख बिक्री का तुमको लक्ष्य दे दिया जाए। तुमने कहा, "दुकान तक तो ठीक था अब ये भी करना पड़ेगा?" महीना, दो महीना, चार महीना तुमने जो मेहनत करनी थी करी, उसके बाद लगे दुकान पर ही सोने। क्यों? न दुकान तुम्हारी, न माल तुम्हारा, न इरादा तुम्हारा, इस लक्ष्य के प्रति समर्पित हो भी कैसे पाओगे भाई? आमतौर पर हमारे जीवन के सब लक्ष्य ऐसे ही आते हैं न। तो नहीं हो पाते हम समर्पित।

हमारे तो कई बार पति-पत्नी भी ऐसे ही आते हैं। चचा, ताई, ताऊ इन सब ने मिल करके पति दिला दिया या पत्नी दिला दी। फिर हमें भीतर-भीतर बड़ी ग्लानि रहती है कि पत्नी श्री या पति श्री के प्रति हम समर्पित नहीं हो पाते। कैसे हो पाओगे? तुम्हारे हों तब हो पाओगे न।

ज़िम्मेदारी उसी की उठा पाओगे और हँसते-हँसते उठाओगे और कृतज्ञता के साथ उठाओगे जो कुछ तुम्हारे ह्रदय से आया है। जो तुम्हारे ह्रदय से नहीं आया उसकी ज़िम्मेदारी उठाओगे तो बोझ ही लगेगी। हमारे लक्ष्यों में दम नहीं होता क्योंकि हमारे लक्ष्यों में आत्मा नहीं होती। हमारे लक्ष्य हमारे नहीं होते इसीलिए हमारे कोई लक्ष्य पूरे नहीं होते।

पर जब हमारे लक्ष्यों में हमें हार मिलती है तो हम ये नहीं कहते कि लक्ष्य बनाने की पूरी प्रक्रिया ही गड़बड़ है। हमें उसे दोहराना होगा, समझना होगा बात क्या है। हम कहते हैं, "हम नया लक्ष्य बनाएँगे और इस बार दूने संकल्प के साथ जुटेंगे।" तो ठीक है इस बार दूनी चोट पड़ेगी, इस बार दूनी हार मिलेगी। और फिर ऐसे हारते-हारते पाँच-दस साल में हारने की आदत हो जाती है, जीवन हार का अभ्यस्त हो जाता है। फिर हमें बुरा लगना भी बंद हो जाता है। फिर हम लक्ष्य बनाते हैं और सो जाते हैं, सुबह उठ कर कहते हैं 'हारे कि नहीं हारे अभी तक?' ठीक है।

लक्ष्य बनाने के लिए जिस वस्तु को लक्ष्य कर रहे हो वो इस लायक भी तो हो न कि उसके पीछे जाओ, उसके पीछे श्रम करो, समय लगाओ। पूछो तो, कि जिस चीज़ के पीछे जा रहे हो उसमें तुम्हारा क्या? पाओगे क्या? क्यों, किसके लिए? काहे को? ये अच्छे सवाल हैं, पूछने चाहिए, खासतौर पर युवा लोगों को। उन्हीं को सबसे ज़्यादा लक्ष्य दिए जाते हैं — अब तू ये कर, अब तू ऐसा घोड़ा बन जा, अब उधर को दौड़ जा। तुरंत पूछो, "क्या? काहे को?"

या तो तुम्हें लक्ष्य देने वाली ताकतें तुम्हें समझा दें कि इतना दौड़-भाग करके तुम्हें मिलने क्या वाला है, और जो तुम्हें मिलने वाला है उससे तुम्हारा कुछ नाता भी है क्या? शेर को दौड़ाओ तुम, बोलो दौड़ लगा, दौड़ लगा! वहाँ आठ कि.मी. आगे उधर बहुत बड़ा घास का मैदान है। और उसको तुम पूरे तरीके से आश्वस्त कर दो कि घास ही घास है वहाँ पर, तो वो इतना तो पूछेगा न कि "घास के बीच एक-आध हिरण है कि नहीं? और घास-ही-घास है तो हिरण की अपेक्षा हम तुमसे भी काम चला सकते हैं।" शेर भी इतना मूरख नहीं होता कि तुम उसे घास का लक्ष्य दो और दौड़ जाए।

तुम पूछो तो कि, "हाँ, ठीक है मिलेगी बहुत सारी घास। ताऊजी झूठ नहीं बोल रहे हैं। हमने इतनी अगर दौड़ लगा दी तो मिल जाएगी बहुत सारी घास, उन्होंने बिलकुल ठीक बोला। पर उस घास से मेरा दिल भरेगा क्या? और नहीं भरेगा तो दौड़ क्यों लगा रहा हूँ?" लेकिन ये तर्क करने के लिए सबसे पहले अपने दिल का हाल कुछ पता तो हो।

अब ये पता ही नहीं है कि दिल में ख़ास क्या है और घास क्या है। अपने आप से बिलकुल अनजान। अपनी कुछ खबर ही नहीं, क्यों खबर नहीं? क्योंकि जिस माहौल में रह रहे हैं उसमें अपने साथ समय गुज़ारने का कोई प्रचलन ही नहीं, आत्म अवलोकन का कोई महत्त्व ही नहीं। खाली समय मिला है तो क्या करना है, 'चल ना, मोहल्ला घूम कर आते हैं, बाज़ार देख कर आते हैं।' या कहीं नहीं जाना तो 'चल ना टीवी देखते हैं।'

खुद को नहीं देखना है, अपनी हालत क्या है उससे बिलकुल बचकर रहना है। अपनी हालत का कुछ पता नहीं, टीवी देखना है हर समय। टीवी देख कर तुम्हें अपने बारे में क्या पता चल गया? टीवी वाला पानी पी रहा है तुम्हारा पेट भरेगा? बोलो। बाज़ार जा रहे हो वहाँ दुकानें देख रहे हो। दुकानों में विविध माल है, तुम्हारा क्या?

पर इस बात पर कोई ज़ोर ही नहीं है, कोई सिखा ही नहीं रहा। माँ-बाप बच्चों को प्रोत्साहित ही नहीं कर रहे कि, "बेटा डायरी लिखा करो। बेटा, शान्ति से बैठ करके मन की बात सुनना सीखो और फिर दूसरों में बाँटना भी सीखो, बताना भी सीखो।" समय मिल गया है तो क्या करो, "अलेक्सा, पार्टी म्यूज़िक"। तुम तो नाचो। अलेक्सा साइलेंस (शान्ति) भी कुछ होता है? अलेक्सा ही है न? बिकना बंद हो जाए साइलेंस हो जाए तो। उसके लिए तो बहुत ज़रूरी है कि शोर रहे और तुम नाचो।

शादियाँ होती हैं तो आजकल एक धंधा चला है जिसमें दो-तीन महीने पहले से वो घर-घर आकर नाचना सिखाते हैं पूरे खानदान को। घर के जितने जवान होते हैं वो सलमान खान, ऋतिक रौशन इत्यादि बनेंगे, वृद्धाएँ जया भादुरी बनेंगी, मरियल ताऊजी अमिताभ बच्चन बनेंगे और फिर पूरा खानदान नाचेगा। अब ऐसे में किसी को क्या पता चलेगा कि भीतर क्या है। कभी ख़ुशी कभी ग़म, नाचो छम छमाछम।

(श्रोतागण हँसते हैं)

अभी हँस लीजिए पर इन्हीं बातों पर रोना बहुत पड़ता है क्योंकि जब अपना नहीं पता तो अपने लक्ष्य का नहीं पता होता भाई। लक्ष्य यूँ ही थोड़े ही होता है, लक्ष्य किसी के लिए होता है न? जो शेर का लक्ष्य है वो गाय का लक्ष्य नहीं हो सकता न, या हो सकता है? तो आपको अगर पता ही नहीं है कि आप शेर हैं कि गाय हैं तो अपना आप लक्ष्य निर्धारित करेंगे कैसे?

या तो अकेले समय गुज़ारना सीखिए या उनके साथ समय गुज़ारना सीखिए जो दर्पण जैसे हों, कि उनके सामने बैठे तो उन्होंने आपको आपका हाल दिखा दिया। भीड़ में कम समय गुज़ारें, शोर में कम समय गुज़ारें। टीवी, बाज़ार, सिनेमा इन सबके प्रति थोड़ा सतर्क रहें। देखिए फिल्में, वो देखिए जो आपको आपसे थोड़ा रूबरू कराएँ। ऐसी फिल्में मत देखने जाइए जो आपको किसी वैकल्पिक स्वप्न जगत में ले जाएँ और आपको भी लगे कि हाँ आप भी तो मॉरिशस के बीच पर सुंदरियों के साथ नाच रहे हैं। कुछ देर के लिए ग़म गलत कर लिया, तीन-सौ रूपए का टिकट, पाँच-सौ रूपए का पॉपकॉर्न।

फिर लक्ष्य सही निर्धारित करोगे, फिर लक्ष्य तुम्हारे बोध से निकलेगा, तुम्हारी होशियारी से निकलेगा, समझ से निकलेगा। अब उस लक्ष्य के प्रति तुम बहुत लम्बे समय तक समर्पित रह पाओगे क्योंकि तुम्हें पता है कि वो चीज़ ज़रूरी है, तुमने ख़ुद जाना है कि वो चीज़ ज़रूरी है।

तो अगर आप अपने लक्ष्यों में बार-बार असफलता पाते हैं तो इसकी वजह संकल्प शक्ति, विल-पावर इत्यादि का अभाव नहीं है, इसकी वजह ये है कि आपके लक्ष्य हैं ही गलत। सही लक्ष्य तो प्रेम प्रसंग की तरह होता है, वो पकड़ लेता है। आप उसको फिर छोड़ना भी चाहोगे वो आपको नहीं छोड़ेगा।

ये गज़ब मत कर लीजिएगा कि अगर लक्ष्यों में सफलता नहीं मिल रही तो किसी मोटिवेशन की दुकान में जा कर बैठ गए। वो भी आजकल ख़ूब चल रहा है। वहाँ बताया जाता है कि कैसे अपनी इच्छाएं पूरी करनी हैं, कैसे अपने लक्ष्यों को हाँसिल करना है बिना कभी ये पूछे कि तेरा लक्ष्य है क्या।

कितना मज़ा आए न कि कोई बनना चाहता हो हत्यारा और वो जाए किन्ही मोटिवेशनल गुरु के सामने खड़ा हो जाए। कहे कि, "लक्ष्य एक बनाया है लेकिन पूरा नहीं हो पा रहा है, बड़ा आलस आता है, भीतर से इच्छा नहीं उठती है।" और गुरुदेव अपनी सब अदाओं के साथ उसको बिलकुल आश्वस्त कर दें 'यू कैन डू इट' (तुम कर सकते हो)। अब वो निकाले तमंचा और मारे, 'भो!' बोले 'आइ डिड इट' (मैंने कर दिया)। अरे ये तो पूछ लो वो करना क्या चाहता है, उसको उत्साह ही दिए जा रहे हो। जो करना चाहते हो अगर वो ठीक है तो किसके रोके रुक पाओगे तुम?

दुनिया में सबसे बड़ी ताकत होती है एक जगे हुए आदमी का जागरण। उसे कोई नहीं रोक सकता। तुम उसे मार सकते हो, रोक नहीं पाओगे। जो जग गया, जो समझ गया कि क्या ज़रूरी है, उसको अगर रोकना चाहते हो तो उसको समझाने मत चले जाना, उसको सीधे गोली मार देना। वही अकेला तरीका है उसको रोकने का। तुम उससे तर्क करोगे, तुम उसे लालच दोगे या तुम उसे धमकी दोगे, वो कतई रुकने नहीं वाला क्योंकि वो अब जान गया है। अपनी आत्मा के चलाए चल रहा है अब वो।

जो आत्मा के चलाए चल रहा है दुनिया की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती, तो उसे तुम मार ही देना सीधे। और जिसको तुम पाओ कि तुम्हें उत्साहित करना पड़ता है, प्रेरित करना पड़ता, मोटीवेट करना पड़ता है, उसको जान लो कि ये धक्का खाने वाली गाड़ी है। कितना धक्का मारेंगे? ये फिर चार कदम जा कर रुक जाएगी।

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