प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जीवन में बड़ा लक्ष्य कैसे चुनें?
आचार्य प्रशांत: जो एब्सॅल्यूटली (पूर्ण) बड़ा है उसको लक्ष्य नहीं बना सकते न, तो कम-से-कम जो अनुपातिक तौर से बड़ा है, जो तुलनात्मक रूप से बड़ा है उसको ही लक्ष्य बना लो। क्योंकि दुनिया में तो जो भी कुछ तुम्हें बड़ा मिलेगा वो दूसरे से बस अपेक्षतया बड़ा होगा, रिलेटिवली बड़ा होगा।
दुनिया में तुम छोटे से बड़े की यात्रा करते जाओ; इसकी ताक़त तुम्हें वो देता है जो पूर्णतया बड़ा है। और दुनिया में तो छोटे से बड़े की यात्रा करते रहोगे, एक दिन वो मुक़ाम भी आता है जब तुम कहते हो कि बड़े की यात्रा अब दुनिया में और ज़्यादा हो भी नहीं सकती।
अध्यात्म व्यावहारिक होना चाहिए। तुम अभी तीन लोगों को अपना मानते हो, इतनी जल्दी नहीं कह पाओगे कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’। बड़ी आदत पाल रखी है तुमने पुरानी कि यही तीन लोग मेरी दुनिया, मेरा संसार हैं। तुम तीन को बढ़ाकर पाँच तो करो, तुम पाँच को बढ़ाकर पन्द्रह तो करो, तुम पन्द्रह से पचास पर तो पहुँचो; आगे बढ़ते रहो। जो भी तुम्हारा सांसारिक कामकाज़ है उसमें आगे बढ़ते रहो, दिशा आकाश की होनी चाहिए।
किसी को तुम कुछ देते हो — अधिकांश लोग कुछ-न-कुछ दान-दक्षिणा करते ही हैं, उसके नियम भी तय हैं। कहीं कहा जाता है एक प्रतिशत, कहीं कहा जाता है दो, कहीं ढाई, कहीं पाँच, कहीं सात — तुम आगे तो बढ़ते रहो, अगर तुम्हें यही लगता है कि दान ही तुम्हारे अध्यात्म का मार्ग है।
तुम पाठ करते हो, तुम घंटाभर पाठ करते हो; बढ़ाओ न उसको! ये सब आँकड़ों का खेल है, पर दुनिया में तो जो कुछ है, वो आँकड़ा ही है। दुनिया में तो जो कुछ है सीमित है और जो भी कुछ सीमित है वो आँकड़ों में समा ही जाएगा; आगे तो बढ़ो! ये मत कर लेना कि जब तक अनन्त ही नहीं मिल जाता, तब तक क्षुद्रता को ही पकड़े रहूँगा, न!




