आचार्य प्रशांत: हर उद्योग में हमको कोई एड़ा चाहिए, हर घर में हमें कोई सरफिरा चाहिए। हर स्कूल में, हर कॉलेज़ में हमें कोई विद्रोही चाहिए।
समझ में आ रही है बात?
कोई सभा हो, कोई बैठक हो, कोई मजलिस हो, हमें एक क्रान्तिकारी चाहिए। और एक कह रहा हूँ क्योंकि एक से ज़्यादा की मुझे कोई उम्मीद नहीं है। प्रकृति का बहाव बड़ा भारी है, वो पूरी जनसंख्या को बहा ले जाता है। उसमें से कोई एक भी मिल जाए तो गनीमत है।
ये उम्मीद करना कि कोई दिन आएगा जब पूरी-की-पूरी जनसंख्या चेतना के तल पर उठ खड़ी होगी और कहेगी, 'न हम जानवर हैं, न जानवर की तरह जीना है।' ये मैं चाहता तो बहुत हूँ, सोचता ही भर हूँ तो ऐसा लगता है जैसे फुहार, आनन्द आ गया बिलकुल। पर वो सोच की ही बात है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जा रही है, मुझे समझ में आ रहा है कि बहुत उम्मीद रखनी नहीं चाहिए। वो दिन शायद कभी नहीं आ पाएगा जब धरती का हर इंसान एकदम देवता समान हो जाएगा। वो दिन शायद कभी नहीं आएगा। वो हो सकता हो या न हो सकता होm लेकिन कुछ लोग तो सिरफिरे ज़रूर हो सकते हैं। उन्हीं लोगों के दम से ये दुनिया है।
जीजस ऐसे लोगों को कहते हैं, 'सॉल्ट ऑफ़ द अर्थ' (धरती के नमक)। यही वो कुछ गिने-चुने लोग हैं जिनके कारण ये जो बाक़ी समाज है, जिसमें पशु-ही-पशु हैं, ये भी बस चल पा रहा है। उन मुट्ठी भर लोगों का निर्माण करने के लिए ही हमारा भी पूरा आन्दोलन है।
कितनी बार मैंने बोला कि श्रोता नहीं चाहिए, योद्धा चाहिए। लोग चाहिए जो जब यहाँ से वापस जाएँ तो कुछ ऐसा करें जिसमें चेतना की सुगन्ध हो। नहीं तो जानवरों की तरह खाना-कमाना, ये तो हर कोई कर लेता है। और देखो, अब समय वो आ गया है न, जब खाना-कमाना हर आदमी कर रहा है। हर आदमी के पास पैसा है और आज नहीं तो कल हो जाएगा। आर्थिक तरक़्क़ी ज़ोरों से चल रही है।




