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कुछ ऊँचा कर के दिखाओ || आचार्य प्रशांत
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: हर उद्योग में हमको कोई एड़ा चाहिए, हर घर में हमें कोई सरफिरा चाहिए। हर स्कूल में, हर कॉलेज़ में हमें कोई विद्रोही चाहिए।

समझ में आ रही है बात?

कोई सभा हो, कोई बैठक हो, कोई मजलिस हो, हमें एक क्रान्तिकारी चाहिए। और एक कह रहा हूँ क्योंकि एक से ज़्यादा की मुझे कोई उम्मीद नहीं है। प्रकृति का बहाव बड़ा भारी है, वो पूरी जनसंख्या को बहा ले जाता है। उसमें से कोई एक भी मिल जाए तो गनीमत है।

ये उम्मीद करना कि कोई दिन आएगा जब पूरी-की-पूरी जनसंख्या चेतना के तल पर उठ खड़ी होगी और कहेगी, 'न हम जानवर हैं, न जानवर की तरह जीना है।' ये मैं चाहता तो बहुत हूँ, सोचता ही भर हूँ तो ऐसा लगता है जैसे फुहार, आनन्द आ गया बिलकुल। पर वो सोच की ही बात है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जा रही है, मुझे समझ में आ रहा है कि बहुत उम्मीद रखनी नहीं चाहिए। वो दिन शायद कभी नहीं आ पाएगा जब धरती का हर इंसान एकदम देवता समान हो जाएगा। वो दिन शायद कभी नहीं आएगा। वो हो सकता हो या न हो सकता होm लेकिन कुछ लोग तो सिरफिरे ज़रूर हो सकते हैं। उन्हीं लोगों के दम से ये दुनिया है।

जीजस ऐसे लोगों को कहते हैं, 'सॉल्ट ऑफ़ द अर्थ' (धरती के नमक)। यही वो कुछ गिने-चुने लोग हैं जिनके कारण ये जो बाक़ी समाज है, जिसमें पशु-ही-पशु हैं, ये भी बस चल पा रहा है। उन मुट्ठी भर लोगों का निर्माण करने के लिए ही हमारा भी पूरा आन्दोलन है।

कितनी बार मैंने बोला कि श्रोता नहीं चाहिए, योद्धा चाहिए। लोग चाहिए जो जब यहाँ से वापस जाएँ तो कुछ ऐसा करें जिसमें चेतना की सुगन्ध हो। नहीं तो जानवरों की तरह खाना-कमाना, ये तो हर कोई कर लेता है। और देखो, अब समय वो आ गया है न, जब खाना-कमाना हर आदमी कर रहा है। हर आदमी के पास पैसा है और आज नहीं तो कल हो जाएगा। आर्थिक तरक़्क़ी ज़ोरों से चल रही है।

तो अगर आपने यही बना रखा है अपनी ज़िन्दगी का लक्ष्य कि आपके पास भी पैसा हो तो आपने कोई बड़ी बात नहीं कर दी, कमा भी लिया बहुत तो।

आप यहाँ आये हैं, आपमें से बहुत लोग वायुमार्ग से आये होंगे तो एयरपोर्ट पर भीड़ कितनी देखी? ज़बरदस्त भीड़! मैं यहाँ उतरा, बारिशों में पहली बार आ रहा हूँ यहाँ (गोवा में)। तो मैंने पूछा टैक्सी ड्राइवर से, 'यहाँ इस समय भी इतनी भीड़!’ बोला, ‘जितनी जाड़ों में होती है, जितनी पीक सीजन में होती है, उतनी अभी भी है।' होटलों के रेट जितने जाड़ों में थे उससे कुछ ज़्यादा ही होंगे, कम नहीं हैं। और लोग दे रहे हैं। दे रहे हैं से आशय क्या है? कि पैसा अब सबके पास है।

हर आदमी फ़्लाइट से चल रहा है, हर आदमी महँगे होटल में रुकने की क़ाबिलियत रखने लगा है। और जो लोग आज नहीं रख रहे, मैं कह रहा हूँ, वो कल रखेंगे। तो आपने कौनसा तीर मार लिया अगर आपने भी पैसा कमा लिया तो, बताइए न।

इसी में खुश हुए जा रहे हो कि मैं अभी पाँच हज़ार वाले, दस हज़ार वाले होटल में रुक लेता हूँ, पन्द्रह हज़ार वाले में; हर आदमी रुक रहा है। 'मेरे पापा जी बजाज स्कूटर पर चलते थे, मैं स्पाइस जेट में बैठकर आया हूँ।' वह पूरा भरा हुआ है, सिर्फ़ तुम नहीं बैठे हो। सब बैठे हैं, तुमने क्या कर लिया?

कुछ करके दिखाओ न! ऐड़ा — वो चीज़ है जो कोई करके नहीं दिखा पा रहा। वो करके दिखाओ न। रही होगी कभी बहुत ग़रीबी, सौ साल पहले आज से। जब यही बहुत बड़ी बात थी कि फ़लाना आदमी अब दो वक़्त की रोटी खा लेता है अच्छे से। मालूम है? तब एक समय ऐसा भी था जब यही बहुत बड़ी बात होती थी किसके घर में खाने को पूरा-पूरा है, वो बहुत बड़ी बात होती थी।

एक ज़माना था जब शक्कर तक नहीं होती थी लोगों के घर में। जब शक्कर भी नहीं होती थी लोगों के घर में, तो कोई भी अगर चीज़ है जो खाने में अच्छी लगी तो उसको बोलते थे, 'बड़ी मीठी है, बड़ी मीठी है।’ क्यों बोलते थे बड़ा मीठा है? क्योंकि मीठा शब्द ही दुर्लभता का द्योतक हो गया था। जो चीज़ दुर्लभ हो उसको बोलते थे मीठी, क्योंकि शक्कर दुर्लभ होती थी। हर आदमी के घर में शक्कर होती नहीं थी, गुड़ भी नहीं होता था। तो जो कुछ भी दुर्लभ हो उसको मीठा बोलते थे।

वो एक ज़माना था, तब बड़ी बात होती थी कि किसी ने कुछ कमा लिया। कमा लोगे, कमा लोगे, क्या रखा है? अच्छे कपड़े पहन लिये, एक समय बड़ी बात थी। हर आदमी के पास है अब अच्छे कपड़े। पहन लो, क्या हो गया? और पहन लेते हो न उसके बाद पता भी नहीं चलता कि कौन से ब्रांड का है। क्या पता, कुछ नहीं पता‌।

गाड़ी भी आज सबके पास है। क्या कर लोगे अगर तुमने गाड़ी कमा ली तो? सन् दो हज़ार तीन में मैंने अपनी पहली कार खरीदी थी, नयी-नयी नौकरी थी तब। तो वो पाँच-छः लाख की तब आयी थी और उसके बाद से बढ़ती क़ीमतों के बावजूद कारों की क़ीमत लगभग उतनी ही रही है, थोड़ी-बहुत बढ़ी होगी। छः लाख में आज भी आपको एक ठीक-ठाक कार मिल जाती है, कि नहीं मिल जाती है? और बीस साल पहले भी मैंने छः लाख में खरीदी थी। तो हर आदमी आज कार खरीद सकता है।

हर आदमी क्यों खरीद सकता है जानते हो? क्योंकि हर आदमी ने खरीद रखी है। इकोनॉमिक्स ऑफ़ स्केल में यही होता है, जब हर आदमी कुछ खरीदता है तो चीज़ सस्ती हो जाती है। तो तुमने कौनसा लठ गाड़ दिया या तुमने क्या उखाड़ लिया अगर तुमने भी कार खरीद ली तो? तुम्हारे पास भी है, तुम्हारे पड़ोसी के पास भी है और ज़्यादातर घरों में एक नहीं, कई कारें हैं। और मैं कह रहा हूँ, आज नहीं है तो कल होंगे। तो इन सबको जीवन का लक्ष्य बनाकर बैठे हो क्या? कुछ और करके दिखाओ न जीवन में।

हम जब छोटे थे तो कुछ चुनिन्दा दुकानें होती थीं जिनमें एसी लगा होता था। तो कई बार भाग-भागकर आते उन दुकानों में। कुछ करना नहीं है फिर भी खड़े हैं। ख़ासतौर पर बरसात का मौसम और उत्तर भारत की बरसात जहाँ चिपचिपापन होता है, उमस के साथ गर्मी, तब जाकर वहाँ खड़े हैं। आज एक-एक घर में चार-चार एसी लगे हुए हैं। तो यही तुमने बहुत बड़ा काम कर लिया कि दो टन का एसी खरीद लाये? बगल का छग्गूलाल भी ले आया है, तो तुमने क्या उखाड़ लिया?

कुछ और करके दिखाओ न! है दम? वो आग कहाँ है जो भीतर के जंगल को जला दे? बाहर के जंगल तो सब जला दिये, काट दिये, राख हो गये। भीतर का जंगल कब जलेगा?

नहीं समझ में आ रही बात?

ये हमारे बचाव का तरीक़ा होता है, 'अजी साहब, समाज को तो नेताओं ने ख़राब कर रखा है। सब नेताओं को गोली मार दो।' अच्छा! तो नेता बुरे हैं, समाज अपनेआप में बड़ा अच्छा है, समाज पाक-साफ़ है! नेताओं ने आकर गन्दगी मचा रखी है। अच्छा, इन नेताओं को चुना किसने? सौ-सौ रुपये के लिए तो वोट बिकते हैं और जहाँ सौ रुपये के लिए नहीं बिकते वहाँ पर जाति के नाम पर बिक जाएँगे, धर्म के नाम पर बिक जाएँगे, किसी और बेवकूफ़ी के नाम पर बिक जाएँगे। कोई आकर कोई चीज़ बता दे, 'फ़्री दे दूँगा, 'फ़्री दे दूँगा', खट से वोट पड़ जाएगा। और कहते हैं, 'नेता बुरे हैं।’ नेता बुरे हैं?

नेता ठीक वैसे ही हैं जैसा घर है तुम्हारा। घर भ्रष्ट है, इसलिए नेता भ्रष्ट है। और घर क्यों भ्रष्ट है? क्योंकि मन भ्रष्ट है। मन भ्रष्ट है तो घर भ्रष्ट है, घर भ्रष्ट है तो समाज भ्रष्ट है, समाज भ्रष्ट है तो नेता भ्रष्ट है। बात कुल ये है कि आम आदमी भ्रष्ट है। आम आदमी ही भ्रष्ट है। कोई मिल जाए बहुत ईमानदार नेता, उसको सबसे पहले आम आदमी उठाकर बाहर फेंक देगा, क्योंकि ईमानदार नेता से सबसे ज़्यादा तकलीफ़ आम आदमी को हो जानी है।

जो भी काम कर रहे हो उसमें कुछ चैतन्य करके दिखाओ। होगी आपकी कोई भी इंडस्ट्री , आप डॉक्टर हो सकते हैं, आप वकील हो सकते हैं, आप आईटी में हो सकते हैं। आप जहाँ भी हैं वहाँ होने का आपका मक़सद क्या है? वहाँ होकर आप क्या काम कर रहे हैं?

आप एक आईटी प्रोफ़ेशनल हैं हेविली पेड (मोटी तनख़्वाह वाला) और कर क्या रहे हैं? 'बूचड़ खाने के लिए सॉफ़्टवेयर लिख रहे हैं।‌' बड़ी-बड़ी फूड प्रोसेसिंग (खाद्य प्रसंस्करण) कम्पनियाँ हैं। वो फूड प्रोसेसिंग क्या हैं, वो मीट प्रोसेसिंग (माँस प्रसंस्करण) हैं। उनको भी सॉफ़िस्टिकेटेड सॉफ़्टवेयर चाहिए होता है।

आईटी प्रोफ़ेशनल हैं, करोड़ों में कमाते हैं, वो भी डॉलरों में। और कर क्या रहे हैं? कसाई घर का सॉफ़्टवेयर लिखते हैं कि वहाँ पर और ज़्यादा एफिसिएंटली (दक्षता से) जानवरों की हत्या हो सके।

'देखिए, पहले आपके पास एक आइटी बैकबोन (तकनीकी आधारित व्यवस्था) नहीं थी तो आप एक दिन में सिर्फ़ आठ लाख जानवर काट पाते थे। पर हमने जो आपको ये नया कोड लिखकर दिये हैं, आपका आइटी एनेबल सिस्टम होगा। अब आप दिन में पच्चीस लाख जानवर काटोगे।'

पर इनका दिखाई नहीं पड़ेगा न! एक फ़िल्मी एक्ट्रेस पर्दे पर अश्लील नाच करती है तो दिखाई पड़ जाता है, सब लोग बोलते हैं, 'थू-थू-थू-थू!' ऊपर-ऊपर से थू-थूू बोलते हैं, बाद में तो खूब देखते हैं। लेकिन यही जो एक आइटी प्रोफ़ेशनल होता है जब एक बूचड़ख़ाने के लिए कोड लिखता है तो किसी को दिखाई नहीं पड़ता। तो इसमें कोई थू-थू करने नहीं आता। तो बहुत आसान है कि नेताओं को कह देना कि नेता भ्रष्ट हैं और फ़िल्म इंडस्ट्री भ्रष्ट है।

मुझे बताओ, भ्रष्ट कौन नहीं है? और भ्रष्ट रहेंगे। ठीक? ये उम्मीद मत करिएगा कि जब सब साफ़ होंगे तो हम भी साफ़ हो जाएँगे। सफ़ाई अपनेआप में एक विद्रोह है, एक क्रान्ति है। जिसे सही जीवन जीना है वो इन्तज़ार नहीं करेगा कि जब बाक़ी सब सही हो जाएँगे तब हम भी सही हो जाएँगे। जिसे सही मंज़िल पहुँचना है वो ये इन्तज़ार नहीं करेगा कि सब लोग ग़लत गाड़ी में सवार हैं, जब पूरी गाड़ी रुकेगी और जब सभी लोग उतरेंगे तब मैं साथ में उतरूँगा, नहीं।

ग़लत गाड़ी में सवार हो, ट्रेन ही पूरी ग़लत है। भरी हुई है ट्रेन और जा रही है ग़लत दिशा की ओर। तुम ये तो छोड़ दो कि जब सब उतरेंगे तब तुम कहो, 'मैं तभी उतरूँगा', तुम ट्रेन के रुकने का भी इन्तज़ार मत करो, तुम चलती ट्रेन से छलाँग मार दो। बुरे से बुरा क्या होगा? मर जाओगे। पर अगर ज़िन्दा रह गये उस ट्रेन के भीतर तो ज़िन्दगी मौत से बदतर होगी। इससे अच्छा कूद पड़ो। मर गये तो मर गये, लेकिन अगर बचोगे तो मौत जैसी ज़िन्दगी से बच जाओगे।

और ये कितनी दुर्बलता का, कैसी नपुंसकता का तर्क होता है, 'अजी साहब, ज़माना ही ऐसा है। ये तो कलयुग है, साहब। ये तो कलयुग है। यहाँ तो ऐसा ही चलेगा। क्या कर सकते हैं, छोड़िए। राधे-राधे! ये तो कलयुग है, साहब सब भ्रष्ट हैं, हम भी भ्रष्ट हैं, क्या कर सकते हैं?'

देखिए, सबसे बड़ा दरिन्दा ये आदमी है जो कहता है, 'सब भ्रष्ट हैं तो हम क्या कर सकते हैं? अकेला चना पहाड़ नहीं फोड़ सकता।' कितना अद्भुत श्लोक सुनाया है तुमने! 'अकेला चना पहाड़ नहीं फोड़ सकता।' ज़रूर सीधे उपनिषदों से आया होगा या भगवद्गीता या अष्टावक्र गीता से ही आया है — 'अकेला चना पहाड़ नहीं फोड़ सकता।' वाह! क्या बात बोली है। 'घोर कलयुग, घोर कलयुग! राम-राम!'

कुछ नहीं कलयुग-सतयुग होता है, व्यक्तिगत बातें हैं। जो सही ज़िन्दगी जी रहा है वो आज भी सतयुग में जी रहा है। और तुम्हारे सामने राम खड़े हों, चाहे कृष्ण खड़े हों, उससे द्वापर या त्रेता नहीं आ जाते। कृष्ण के सामने शकुनी भी था तो कलयुग नहीं था क्या तब शकुनी के लिए? या ये कहोगे कि नहीं वो तो कृष्ण का युग था, वो कलयुग कैसे हो सकता है?

कृष्ण के युग में भी शकुनी के लिए कौनसा युग चल रहा था? कलयुग ही चल रहा था।‌ तो ये बहुत व्यक्तिगत बात होती है, आप पर निर्भर करती है। जो आपके मन की दशा है, वैसा ही आपका युग चल रहा है। ये सब कुछ नहीं है कि अभी कलयुग चल रहा है। आज भी बहुतों के लिए सतयुग चल रहा है और जब सतयुग चल रहा था तब भी अधिकांश लोगों के लिए कलयुग ही चल रहा था। ये तो आपके अन्दर की बात है।

राम के सामने ये सब जो राक्षस-राक्षसनियाँ थे, जो आकर के ऋषियों का यज्ञ भंग किया करते थे, ज़िन्दा लोगों को फाड़कर खा जाते थे, तब उनका सतयुग-द्वापर युग चल रहा था? क्या चल रहा था उनका? उनका तो कलयुग ही था न। तो कलयुग आज भी है जो भ्रष्ट लोग हैं उनके लिए, और कलयुग तब भी था। और जो सही है उसके लिए तब भी सतयुग था आज भी सतयुग है। तो युग वगैरह का हवाला मत दीजिए, ये बेईमानी की बातें हैं।

इंसान हो अगर तो उठकर खड़े होओ। जानते हो अगर सही क्या है तो उस पर जीकर दिखाओ। बोल रहे हो कि फ़िल्म इंडस्ट्री में हो और वहाँ पर बेईमानी बहुत है, उथलापन बहुत है तो कुछ गहरा करके दिखाओ न, शिकायत करने से क्या होगा?

नहीं तो आइए, ये फिर महोत्सव थोड़े ही चल रहा है, इसको एक मातम में तब्दील कर देते हैं और सब लोग बैठकर के छातियाँ पीटते हैं कि हाय-हाय! घोर कलयुग, घोर कलयुग, ज़माना ही ख़राब है। ये इंडस्ट्री भी ख़राब है, वो भी ख़राब है, सबकुछ ख़राब है। एक सामूहिक रूदन करते हैं सब मिलकर के। उससे अहंकार को बड़ा सुख मिलता है कि पूरी दुनिया भ्रष्ट है और हम पाक-साफ़ हैं बिलकुल। बड़ा मज़ा आता है।

ये करने के लिए इकट्ठा हुए हैं यहाँ पर? मैं तो नहीं चाहूँगा ऐसा।

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