ये खेल ऐसा है जिसमें ये नहीं देखा जाता कि किसने अंक ज़्यादा बनाये, इसमें ये देखा जाता है कि अन्त तक डटा कौन रहा, आख़िरी घड़ी तक खड़ा कौन रहा। इसमें बात ये नहीं है कि कौन कितना तेज़ दौड़ा, कहाँ तक पहुँच गया, इसमें बस बात ये है कि कौन मैदान छोड़कर भाग नहीं गया। जो मैदान छोड़कर नहीं भागा, वो जीत गया। ये नियम है इस खेल का। इसमें हार सिर्फ़ एक तरीक़े से होती है कि तुम मैदान छोड़ दो, *नॉक आउट* (पराजित) अपनेआप को घोषित कर दो कि भैया मेरा हो गया!
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जीवन को बेहतर बनाने का, बन्धनों से मुक्त होने का संकल्प हम कई बार लेते हैं, लेकिन असफल होते हैं, हार मिलती है। हमारे संकल्प में कमी कहाँ रह जाती है?
आचार्य प्रशांत: कमी संकल्प में नहीं है, कमी धैर्य और प्रेम में है। तुमसे किसने कह दिया कि संकल्प एक बार में ही या पाँच बार में ही या पाँच-सौ बार में ही फलीभूत हो जाएगा? अपनी भलाई के प्रति प्रेम चाहिए न, उससे फिर बहुत धैर्य आ जाता है। तुम कहते हो, ‘ये काम तो करना ही है, एक बार में नहीं होगा तो एक हज़ार बार में होगा, लगे रहना है। विकल्प है ही नहीं!’ ये चीज़ ऐसी है जिसमें कोई दूसरा रास्ता है नहीं न; कि है?
ख़ुद को कभी तुम शारीरिक रूप से भी मरने के लिए तो नहीं छोड़ देते न, कुछ-न-कुछ कोशिश करते रहते हो। कोई और कोशिश भी न कर रहे हो तो कम-से-कम साँस तो लेते ही रहते हो। भले ही पता हो कि बहुत बीमार हो, कह दिया हो चिकित्सकों ने कि एक महीने में मर जाओगे, पर फिर भी एक महीने तक तो तुम साँस लेते रहते हो, या नहीं लेते? ये तो नहीं कहते कि अब एक महीना ही तो बचा है, तो साँस लेना छोड़ते हैं, चलो ख़त्म!
समझ रहे हो?




