मेरे लिए ऊँचा लक्ष्य क्या हो? || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2020)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आपने बताया कि 'मैं' को जानना ही अध्यात्म है और यह 'मैं' मुक्ति चाहता है। तो यह 'मैं' अपना ऊँचे-से-ऊँचा लक्ष्य कैसे निर्धारित करे जिससे वह मुक्ति की ओर जाए?
आचार्य प्रशांत: 'मैं' कभी भी कोई सिद्धान्त नहीं होता, 'मैं' कोई कल्पना नहीं है। 'मैं' कोई एब्सट्रैक्शन (कोई सामान्य धारणा जिसका आधार कोई वास्तविक व्यक्ति, वस्तु या स्थिति न हो) नहीं है; 'मैं' हमारी ज़िन्दगी का नाम है। 'मैं' चलती-फिरती, साँस लेती हमारी वास्तविकता का नाम है। ठीक है न!
तो ये 'मैं' मुक्ति चाहता ही इसीलिए है क्योंकि इसकी वास्तविकता में बन्धन बहुत हैं। नहीं होते बन्धन तो मुक्ति की क्या बात! उन बन्धनों का दर्द ही तो 'मैं' को मुक्ति के लिए प्रेरित करता है न? आप आज़ाद हैं, स्वस्थ हैं, प्रफुल्लित हैं, तो आपको फिर कुछ भी चाहिए क्यों? फिर तो मौज-ही-मौज! कुछ ग़लत है, कुछ गड़बड़ है तभी तो बदलाव चाहिए न!
तो शुरुआत यही जानने से करनी पड़ती है — ‘क्या ग़लत है, क्या गड़बड़ है? क्या झूठा है, कहाँ फँसे हुए हैं? क्या समझ में नहीं आया है, भ्रम कहाँ पर है? किस चीज़ का डर है?’
तो अपनी ज़िन्दगी को देखना होता है, अपनी बीमारी को पहचानना होता है, वहाँ से इलाज की शुरुआत हो जाती है। यही अध्यात्म है — ‘अपनी ज़िन्दगी को देखना’। अपनी ज़िन्दगी को देखना माने किसको देखना? अहम् की अवस्था को देखना।
अपनी ज़िन्दगी को देखना माने अहम् की सच्ची अवस्था को देखना जिसका वो अनुभव करता है रोज़-रोज़; किताबी बात नहीं, जिसमें वो रोज़ जीता है। दफ़्तर जाता है, व्यापार करता है, पैसे गिनता है, तनख़्वाह पाता है, तनख़्वाह देता है। आगे के लिए कुछ उम्मीदें हैं, किसी से अनबन है, किसी से दोस्ती है, किसी से बैर है। है न! कुछ अपेक्षाएँ हैं जो पूरी नहीं हुईं, कुछ मिला हुआ है जिसके खो जाने का डर है — ये सब 'मैं' की ज़िन्दगी की झलकियाँ हैं। इन्हीं को ईमानदारी से देखकर, इन्हीं को क़रीब से परखकर तुरन्त पता चल जाता है कि कौनसी बीमारी इलाज माँग रही है।



