
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी! मैं डेयरी इंडस्ट्री (दुग्ध उद्योग) से जुड़ा हुआ हूँ, विशेषकर गौ-पालन से। ये उद्योग काफ़ी ज़्यादा क्रूर है, इसलिए मैंने आपसे जुड़ने के बाद यह उद्योग छोड़ दिया है।
मेरा सवाल मुख्य रूप से बछड़ों को लेकर था। डेयरी इंडस्ट्री में जो बछड़े पैदा होते हैं…

प्रश्नकर्ता: थैंक यू सो मच आचार्य प्रशांत फॉर जॉइनिंग (जुड़ने के लिए आपका बहुत धन्यवाद आचार्य प्रशांत) सर, आपके



आचार्य प्रशांत: अगले प्रश्नकर्ता हैं, कह रहे हैं कि "दुनिया के आठ-सौ-करोड़ लोगों को खिलाने के लिए सब्जी, घास-पात और वीगन सामग्री है कहाँ? इतने लोगों को अगर हम खिलाने लग गए शाकाहारी भोजन, तो जंगलों का क्या होगा? इसलिए माँस खाना तो ज़रूरी है।"

आचार्य प्रशांत: पृथ्वी पर जो ज़मीन का क्षेत्र है उसमें से करीब आधे पर खेती होती है। यह जिस भाग पर खेती होती है हम उसके बारे में दो चार चीज़ें समझते हैं, जो कि बहुत रोचक है।
बहुत ध्यान से सुनिएगा। यह सोच कर इधर-उधर मत हो जाइएगा कि…


प्रश्नकर्ता: नैतिकता पर मेरा एक प्रश्न है। मैं पाँच सालों से शाकाहारी हूँ और पिछले दो सालों से वीगन। मैं महिलाओं के साथ डेट पर जाता था, जिनसे मैं डेटिंग ऐप पर मिला था। भले ही मैं पशु उत्पादों को नहीं खाता था, लेकिन वो खातीं थी तो मैं उसका


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं मथुरा की हूँ। छः माह पहले आपका एक वीडियो फ़ेसबुक पर देखा और उसके बाद निरन्तर आपका आशीर्वाद मिलता रहा। मैं पिछले वेदान्त महोत्सव में आयी थी और उस समय


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मैं आपको पिछले दो महीने से सुन रही हूँ और मेरी जो एक तलाश थी सत्य की, करुणा की और



प्रश्नकर्ता: पहले तो आपका बहुत बहुत धन्यवाद। जब मैंने एनिमल क्रूएलिटी (पशु क्रूरता) के सम्बन्ध में काम करना शुरू किया था उन्नीस-सौ-चौरानवे में तो जागरूकता भी बहुत कम थी लेकिन शायद उस तरह की औद्योगिक क्रूरता भी बहुत कम थी जो हम अब देख रहे हैं। तो निरन्तर माँस की

प्रश्नकर्ता: अचार्य जी, नमस्कार! आपने हमें समय दिया सर, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!





प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ईश्वर को करुणा का सागर कहा गया है, परंतु दुनिया में हर तरफ़ हिंसा ही दिखाई देती है। जीवों की रचना में एक ओर तो हिरण है और दूसरी ओर शेर है। हिरण मासूम है फिर भी शेर उसे बहुत बुरी तरह मारकर खा जाता है। हिरण



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कुछ लोग बोलते हैं कि दूध नहीं पीना चाहिए, परंतु पुराने विचारों के लोग बोलते हैं कि दूध पीने से ताक़त आती है। वो तो घर पर भैंस बाँध लेते हैं और दूध का उपभोग करते हैं। कुछ समय पहले आपका एक वीडियो देखा था इसी विषय

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बच्चों को माँसाहार से कैसे दूर रखें?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या माँस-मदिरा, तंबाकू आदि का यदा-कदा सेवन करना गलत है? मैंने सुना है रामकृष्ण, विवेकानंद, जीज़स आदि मांसाहारी थे, और बुद्ध ने भी प्राकृतिक मौत से मरे जानवरों का माँस खाने के प्रति आपत्ति नहीं की है। तो क्या माँसाहार अध्यात्म में बाधक है? यदि बाधक है





प्रश्न: आचार्य जी, मैं कुछ समय पहले वीगन (शुद्ध-शाकाहारी) हो गया था, तो मेरा वज़न बहुत काम हो गया और विटामिन की कमी भी हो गई थी। क्या वीगन हो जाने से ऐसा भी होता है?

प्रश्न: आचार्य जी, रमण महर्षि की एक डॉक्यूमेंटरी (वृत्त चित्र) देख रही थी। उसमें दिखाया था कि जब भी वह कुछ बोलते थे, तो एक गाय सामने आकर खड़ी हो जाती थी। जब उसकी मृत्यु हुई, तो उस दिन सामने नहीं आई, फिर रमण महर्षि ख़ुद उसे देखने गए थे।







रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के रिश्ते और सुरक्षा की रस्म तक सीमित नहीं होना चाहिए। आज असली रक्षा उन चीज़ों की ज़रूरत है जो कमज़ोर और संकट में हैं—गौरैया, नदियाँ, पहाड़, पेड़, महासागर और पृथ्वी। साथ ही ईमानदारी, आत्मज्ञान और मानवीय मूल्यों की भी रक्षा जरूरी है। धर्म कर्मकांड नहीं, अपनी शक्ति और उससे जुड़ी व्यापक ज़िम्मेदारी को समझना है।











प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसा कि हम बात करते हैं दूध की तो भारत में डेयरी कंजम्पशन (दुग्ध आधारित उत्पादों का उपभोग) बहुत ज़्यादा है और लोग लगभग पूरी तरह से निर्भर है दूध पर। हर घर में दूध का बहुत ज़्यादा कंजम्पशन है। तो दूध एक ऐसी चीज़ हो जाती…
प्रश्नकर्ता: मेरा पक्षियों, जानवरों से बहुत जुड़ाव हो गया है। अब मेरा घर से बाहर निकलना मुश्किल होता जा रहा है क्योंकि अगर कभी कोई कसाईघर या माँस की दुकान दिख जाती है तो मेरी नज़र सीधे मासूम पक्षियों और जानवरों की आँखों पर जाकर टिक जाती है और फिर…
अनुभव (प्रश्नकर्ता), इन वीडियोज की…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न वीगनिज़्म (शुद्ध शाकाहार — पशु उत्पादों के उपयोग से परहेज़) के ऊपर है। मैं पिछले सात-आठ महीने से वीगनिज़्म फ़ॉलो कर रहा हूँ। मैंने अपने घरवालों को समझाने का भरसक प्रयास किया, इससे होने वाले वैश्विक तापन, जलवायु परिवर्तन जैसे नुक़सान गिनाये। लेकिन वो हैं…
आचार्य प्रशांत: हवस ही नहीं शांत होती दूध पीने की। क्या करोगे दूध पी-पीकर? कौन-सी सेहत चमका ली है? हाँ, सौ तरीके के रोग और पैदा कर लिए हैं उससे। लेकिन एक पूरी इंडस्ट्री खड़ी हो गई है जिसके मुनाफ़े दूध पर आश्रित हैं। तो दूध को बाजार में पुश(धकेला)…
मेनका गांधी: सबसे पहले तो हम शुरुआत करते हैं माँस खाना, दूध पीना, अंडा खाना। हम सोचते हैं कि ये बहुत आम चीज़ है।
आचार्य प्रशांत: हम इतने अभ्यस्त हो जाते हैं हिंसा देखने के, क्रूरता देखने के कि बहुत कुछ हो रहा होता है जानवरों के साथ, जो हमको…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरे हाथों, मतलब काम करते समय मुझसे ग़लती से एक घोड़े की हत्या हो गयी थी। उस बात को आज ४ साल हो चुके हैं पर आज भी रात को बेचैनी में जाग उठता हूँ उसके ख़्याल से। मैं उसे बहुत प्यार करता था, मेरे बच्चे जैसा…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। जो हम पौराणिक विचारधाराएँ सुनते हैं और हम बड़े लूज़ली (शिथिल) ‘सनातन परंपराओं' जैसे शब्द बोलते हैं उसमें एक ख़ास प्रकार की महत्वता हम किंचित पशुओं को देते हैं। चूँकि मैं पशुओं के ही कल्याण के क्षेत्र में काम करती हूँ, तो हिंदू होने के नाते…
रोबिन सिंह: बहुत से जो लोग हैं उनको होता है कि भाई अभी तो हम दूध ले रहे हैं इस चक्कर में गाय की कुछ क़दर तो है। अगर दूध को आप बहिष्कार करने को कह दो तो गाय की बिलकुल ही बेकद्री हो जाएगी।
आचार्य प्रशांत: बात तो ये…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या चिकित्सा के क्षेत्र को अपवाद मानकर जीव-हत्या करना ठीक है? क्या मानव की जान, किसी और जीव से ऊपर है? और अगर नहीं है तो क्या स्वयं को एलोपैथिक के इलाज से दूर रखना स्वयं पर हिंसा नहीं है? कृपया स्पष्टता प्रदान करें।
आचार्य प्रशांत: टेढ़ी…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपन से ही मेरे साथ ये समस्या रही है कि मेरा मन बहुत विचलित हो जाता है, जैसे ही उसे किसी के दुःख का अनुभव होता है — किसी की मृत्यु, जानवरों का शोषण इत्यादि। ये बातें मेरे मन में पैठ जाती हैं और मैं इसने बाहर…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो कंपनियाँ बहुत बड़े तल पर, अंतर्राष्ट्रीय तल पर फैल चुकी हैं, लेकिन गलत काम कर रही हैं, जैसे, चिकन के विज्ञापन दे देकर लुभा रही हैं लोगों को। और चूँकि लोग ऐसे हैं कि विज्ञापन देखकर जाते हैं। अब अगर इतनी बड़ी कंपनियों से मुझे पंगा…
~ कबीर साहब
आचार्य प्रशांत: माँस सारे एक हैं , मुर्गी, हिरणी, गाय — इसमें मनुष्य और जोड़ लीजिए। कबीर साहबबात कर रहे हैं आपके और माँस के रिश्ते की। माँस कहीं…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यह जो जानवरों को काटते हैं, खाते हैं, पिंजरों में बंद करते हैं, भर-भर के ट्रकों में ले जा रहे होते हैं और पता ही होता है कि कुछ समय में इन्हें मारकर खा जाएँगे, मेरा सवाल है कि क्या प्राकृतिक आपदाएँ, भूकम्प वगैरह, इसी कारण आते…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम शाकाहारी क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत: देखो, वहाँ तार के ऊपर एक चिड़िया बैठी है, दिख रही है? काहे को खाना उसे?
प्रश्नकर्ता: पेड़-पौधों में भी तो जान होती है, वो भी महसूस करते हैं।
आचार्य प्रशांत: अगर कहती हो कि पेड़ में जान है इसलिए चिड़िया…
आचार्य प्रशांत: हिंसा क्या है? हिंसा की क्या परिभाषा है? हिंसा की हर परिभाषा से सबसे पहले ‘दूसरों’ को निकाल दें। हिंसा दूसरों से जुड़ी हुई चीज़ बहुत बाद में है, हिंसा का सर्वप्रथम आपसे ताल्लुक है। क्या है हिंसा?
श्रोतागण: दूसरे को कष्ट पहुँचना।
आचार्य प्रशांत: मैं जानता हूँ…
आचार्य प्रशांत: किसने कहा है कि तुम कुछ भी अंधाधुंध हो जाओ? वीगन होने…
प्रश्न: सर हम बचपन से सुनते आ रहे हैं कि जीव हत्या करना पाप है, पर फिर भी जीवों की हत्या होती रहती है। कभी धर्म के नाम पर, कभी खाने के नाम पर। ऐसा क्यों होता है सर?
वक्ता: ये तुम दूसरों की बात कर रहे हो या अपनी?…
नवरात्रि में देवी और असुरों की कथा पढ़कर सवाल उठता है: जब दोनों ही प्रकृति हैं, तो लड़ाई किससे है? लड़ाई प्रकृति से नहीं, उस अधूरेपन से है जो मानता है कि दुनिया को भोगकर वो पूरा हो जाएगा। देवता और असुर दोनों यही चाहते हैं। अंतर बस इतना है कि चोट खाकर देवता देखते हैं और लौट आते हैं, असुर फिर वही दोहराते हैं। हम भी रोज़ भोजन, लोगों और चीज़ों से पूरा होने की उम्मीद करते हैं। और ‘सब ब्रह्म है’ कहकर विवेक छोड़ देना भी उसी अहंकार की चाल है। चोट हमें भी लगती है; क्या हम उससे सीखते हैं?
नवरात्रि में हम देवी की पूजा करते हैं और महिषासुर को बाहर का कोई दैत्य मान लेते हैं। पर दुर्गा सप्तशती का दूसरा चरित्र हमारी अपनी वृत्ति की कथा है। जो मन प्रकृति को केवल भोगने की वस्तु मानता है, जंगल काटता है, नदियाँ दूषित करता है, पशुओं को खाता है और कहता रहता है कि मुझे और चाहिए, वही महिषासुर है। त्यौहार उसी के वध के लिए है, उसे भोग लगाने के लिए नहीं। क्या इस नवरात्रि हम अपने भीतर के महिषासुर को पहचानेंगे?
जलवायु संकट पर बहस अक्सर नीतियों और तकनीक तक सिमट जाती है, पर दुनिया की आबादी, उत्पादन, कार्बन और तापमान के ग्राफ़ साथ रखें तो एक ही रेखा दिखती है। धरती को दो चीज़ें मार रही हैं: बढ़ती जनसंख्या और बढ़ता उपभोग। दोनों एक ही वृत्ति से निकलते हैं, ख़ुद को न जानना और बाहर जाकर भोगना। जंगल घट रहे हैं, जीव-जंतु मिट रहे हैं। जब तक करने वाला नहीं बदलेगा, नीतियाँ कैसे बदलेंगी? क्या समाधान हमारे ही हाथ में है?
नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?
अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…
जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्या का समाधान केवल अदालतों, सरकारों या अन्य संस्थाओं से उम्मीद करके नहीं हो सकता, क्योंकि ये सभी संस्थाएँ उसी समाज और चेतना से निकलती हैं, जिसने समस्या को जन्म दिया है। वास्तविक परिवर्तन के लिए मनुष्य को बदलना होगा। जब तक अज्ञान, conditioning और उदासीनता बनी रहेगी, संस्थाएँ भी व्यवस्था को ही बनाए रखेंगी। इसलिए तथ्यों को सीधे देखना, मिथकों से ऊपर उठना और जागरूकता विकसित करना ही मूल परिवर्तन का आधार है।
समझदारी याददाश्त से नहीं, समझ से आती है। जीवन हर पल नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटे हुए उत्तर नहीं चलते। जानकारी बाहर से मिल सकती है, पर सही उत्तर तभी जन्म लेते हैं जब मन वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित हो। जो समझ में न आए उसे रटने के बजाय प्रश्न करो, जिज्ञासु बने रहो। सीखने का सार स्मृति नहीं, जागरूकता, समझ और वर्तमान क्षण में जीने की क्षमता है।
जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि चेतना का संकट है। अंधाधुंध उपभोग, अनियंत्रित विकास, जनसंख्या वृद्धि और भविष्य के भ्रम ने पृथ्वी के सीमित संसाधनों पर असहनीय दबाव डाल दिया है। समाधान डर फैलाने या आदेश देने में नहीं, बल्कि स्पष्टता, जागरूकता और सही समझ में है। जब मनुष्य होश में जीना सीखता है, तभी उपभोग, विकास और जीवन के निर्णय प्रकृति के साथ संतुलित हो पाते हैं।
क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।
जानवर अपनी जैविक प्रवृत्तियों के अनुसार जीते हैं, जबकि मनुष्य के पास विवेक और चुनाव की क्षमता है। इसलिए अपने व्यवहार को सही ठहराने के लिए पशुओं का उदाहरण देना उचित नहीं है। जीवन में महत्वपूर्ण यह है कि हम सचेत होकर निर्णय लें। इसी तरह खेल में सफलता तब मिलती है जब ध्यान खेल पर हो, न कि जीत, प्रशंसा या दूसरों को प्रभावित करने पर। परिणाम की चिंता बढ़ते ही एकाग्रता टूटती है और प्रदर्शन प्रभावित होता है।
जलवायु संकट केवल किसानों, मज़दूरों या गरीबों की समस्या नहीं है; इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ने वाला है। बढ़ती गर्मी, आर्द्रता, बाढ़, सूखा, प्रदूषण, खाद्य संकट, स्वास्थ्य समस्याएँ और सामाजिक अस्थिरता धीरे-धीरे जीवन के हर पहलू को प्रभावित करेंगी। तकनीकी सुविधाएँ और निजी आराम स्थायी सुरक्षा नहीं दे सकते। यह संकट भविष्य का नहीं, वर्तमान का है, और इससे बचाव के लिए सामूहिक जागरूकता व गंभीर कार्रवाई आवश्यक है।
जलवायु संकट कोई दूर का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है। इसके बावजूद लोग, मीडिया और राजनीति उन मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं जो अहंकार, मनोरंजन, पहचान और तात्कालिक भावनाओं को संतुष्ट करते हैं। पर्यावरण विनाश का मूल कारण बाहरी व्यवस्था से अधिक मानवीय लालच, उपभोग और सामूहिक बेहोशी है। प्रकृति का शोषण विकास नहीं, आत्मविनाश है; और जब तक व्यक्ति स्वयं नहीं बदलेगा, तब तक न राजनीति बदलेगी, न समाज, न पृथ्वी का भविष्य।
हम जो एनिमल लवर भी बनते हैं, तो आमतौर पर क्या करते हैं, मुझे आसपास जो दिख रहा है, मैं उसका ख़्याल कर लूँगा। तो ये तो तुम्हारा बहुत संयोग से रिश्ता बना न, बोध की बात तो ये है कि मैं देखूँ कि पूरी पृथ्वी पर क्या चल रहा है और उसके लिए काम करूँगा। और बिल्कुल ये हो सकता है कि जितना समय आप चार जानवरों की सेवा में लगा रहे हो, उतना समय अगर आप जानवरों के लिए सही तरीक़े से लगा दो, तो आप 4 हज़ार जानवर बचा दो। तो बताओ, फिर ये चार जानवरों की सेवा करना प्रेम हुआ या हिंसा?
खेत खाली जगह नहीं है; खेत एक ह्यूमन कॉलोनी है। खेत का मतलब होता है कि तुमने वहाँ की पूरी प्रकृति नष्ट कर दी है। 80% जो खेती होती है, वो सिर्फ़ इंसान को अन्न खिलाने के लिए नहीं, वो इंसान को मीट खिलाने के लिए होती है। तो जंगल काट के तुमने खेत बनाया, और वो खेती इसलिए कर रहे हो कि अब जानवर काटोगे। अगर हम में थोड़ी चेतना जगेगी, तो जैसे हम मनुष्यों को मारने को अपराध समझते हैं, वैसे ही हम जीवों को मारने को भी अपराध घोषित करेंगे, और पेड़ काटने को भी अपराध घोषित करेंगे।
यह मामला जो है, अरावली के नाश का नहीं है। यह मामला ग़रीबों के नाश का है। क्या होने वाला है? ड्रिलिंग-ब्लास्टिंग होगी, तो वहाँ पर उड़ेगी ज़बरदस्त क़िस्म की धूल। बिल्डर आएगा और वो वहाँ पर बनाएगा, अरावली ग्रीन्स। महँगी-महँगी रेज़िडेन्शियल प्रॉपर्टीज़ निकलेंगी। और अमीरों को कहा जाएगा, 'आओ, आओ, यहाँ पर इको-टूरिज़्म करो।' नुकसान किनका होने जा रहा है? आम आदमी का। पेड़-पौधों का, जानवरों का। एकदम जो ग़रीब लोग हैं, उनका। उनका, जो अभी पैदा भी नहीं हुए। यह चोरी सिर्फ़ ग़रीबों की जेब से नहीं की जा रही, यह चोरी अजन्मी पीढ़ियों की जेब से भी की जा रही है।
‘ज़ॉम्बी’ शब्द का मतलब समझते हैं? चलती-फिरती लाश। हम वो बन चुके हैं, बहुत हद तक। हम वैसे हो गए कि हमारे सामने अब कुछ भी चल रहा है, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, तो हम मर गए। और जो मर गया, वो मरने से क्यों डरे? उसको तुम 2000 की AQI में डाल दो, उसे तब भी फ़र्क़ नहीं पड़ेगा; वो तो मर ही चुका है। ये समाज मृत्युधर्मा होता जा रहा है। हमारे भीतर ये मान्यता कूट-कूट कर भर दी गई है कि जो चल रहा है, ठीक ही चल रहा है, क्योंकि किसी और ने चला रखा है।