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मारना बड़ा गुनाह है, या पैदा करना? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी! मैं डेयरी इंडस्ट्री (दुग्ध उद्योग) से जुड़ा हुआ हूँ, विशेषकर गौ-पालन से। ये उद्योग काफ़ी ज़्यादा क्रूर है, इसलिए मैंने आपसे जुड़ने के बाद यह उद्योग छोड़ दिया है।

मेरा सवाल मुख्य रूप से बछड़ों को लेकर था। डेयरी इंडस्ट्री में जो बछड़े पैदा होते हैं वो किसी काम के नहीं होते हैं। लेकिन न तो हम उन्हें रोज़ाना सौ-दो सौ रूपये का खिला सकते हैं और न ही उन्हें बाहर छोड़ सकते हैं क्योंकि क़ानून सख्त हैं। तो फिर हमें उन्हें खूँटे से बाँधकर जन्म के साथ-साथ खत्म करना पड़ता है।

मैं आपको सुनने के बाद आपसे अधिकांश बातों से सहमत होता हूँ लेकिन चूँकि आप वीगनिज़्म को प्रसारित करने का काम कर रहे हैं और मैं भी इसी उद्योग से जुड़ा हूँ। तो संस्था का जो इतनी बड़ी जनसंख्या को पूर्ण वीगनिज़्म पर लाने का अभियान है, मैं उससे सहमत नहीं हूँ, मुझे ये प्रैक्टिकली सम्भव नहीं दिखता है।

मेरी इंडस्ट्री के लिए आपके बताये हुए पूर्ण सत्य पर चलना बड़ा मुश्किल है। मेरा मानना है कि उस बछड़े को सात दिन खूँटे से बाँधकर, भूखा-प्यासा तड़पा-तड़पाकर मारने की बजाय क्या यह बेहतर नहीं है कि मैं तीन-चार साल उसका खयाल रखकर, उसे दो सौ-तीन सौ किलो का जानवर बनाकर, फिर उसे बूचड़खाने भेज दूँ जहाँ उसे सिर्फ़ पाँच सेकेंड का दर्द होगा? ऐसी स्थिति में कम बुराई और ज़्यादा बुराई में से किसका चुनाव करना ठीक है? और बछड़ों का प्रैक्टिकल समाधान क्या हो सकता है?

और एक निवेदन है कि कृपया वीडियो में मेरे चेहरे को ब्लर (धुँधला) कर दिया जाएँ।

आचार्य प्रशांत: ये बात आप एकबार फिर से बता दीजिएगा ब्लरिंग वाली।

प्र: कृपया मेरे चेहरे को ब्लर कर दीजिए, चाहे ऑडियो रहने दीजिए। चूँकि मैं डेयरी इंडस्ट्री से जुड़ा हुआ हूँ तो आजकल के माहौल के हिसाब से मेरी लिंचिंग भी हो सकती है तो यह मेरी सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है।

आप मेरे पॉइंट को समझें कि बछड़ों के साथ पूरी डेयरी इंडस्ट्री में ऐसा हो रहा है। तो इन बछड़ों का प्रैक्टिकल समाधान क्या हो सकता है?

आचार्य: यहाँ हमें बछिया चाहिए तो बछड़े का वध करना पड़ता है। और ये एक इंडस्ट्री वाइड है? और इसको हम जायज़ मानते हैं। कोई इसके विपरीत बोलेगा तो आपने कहा लिंचिंग और इन सब बातों की भी नौबत आ सकती है। अच्छा! तो बछिया चाहिए, बछड़े को जन्म लेते ही मार देना है, ठीक है? घरों मे जब लड़का चाहिए और लड़की को जन्म लेते ही मार देना है, तो फिर वो क्यों गलत हुआ? वहाँ भी तो ये ही हो रहा है।

यहाँ पर मादा चाहिए, मादा दूध देती है। नर किसी काम का नहीं। तो मादा चाहिए तो नर को मार दिया और घरों में नर चाहिए। तो मादा पैदा हुई, बच्ची छोटी उसको मार दिया या गर्भ में ही मार दिया, वो गलत क्यों है फिर ? ये दोनों अलग-अलग बातें हुईं क्या? वो गलत है क्या? फिर वो भी ठीक है।

मूल बात समझिए! यहाँ बात ये नहीं है कि लेसर इविल (छोटी बुराई) क्या है, बिगर इविल (बड़ी बुराई) क्या है। ये तो हमने खुद ही दो ऐसे विकल्प तैयार करे हैं जिसमें एक विकल्प चमककर के सामने आये और उसका चुनाव करना अनिवार्य हो जाए। कि एक विकल्प ये है कि वो जब पूरा बड़ा सांड बन जाएगा तब कटेगा और पूरा बड़ा सांड बनने में उसकी परवरिश करनी पड़ेगी, पैसे लगाने पड़ेंगे तब कटेगा। या ये है कि जब वो छोटा सा बछड़ा ही है तब ही उसको मार दो। दोनों ही विकल्पों में उसका मरना तय है।

तो ये विकल्प इस तरीके से प्रस्तुत हुए कि भई मरना तो दोनों ही विकल्पों में हैं , तो पहले ही मार दो उसको जब वो है नहीं। तीसरा विकल्प भी होता है, चौथा भी होता है। हमने तो इन दोनों विकल्पों का निर्माण ही अपनी सुविधा के लिए किया है। सबसे पहले तो हम ये जानना चाहेंगे कि उसका जन्म ही क्यों हुआ? और जन्म कैसे हुआ? वो क्यों पैदा हो गया? उसको पैदा होना ही क्यों चाहिए था? गाय से या भैंस से वो बछड़ा या पड़वा पैदा क्यों हुआ? गाय की मर्ज़ी से?

हम पैदा कर रहे हैं, ज़बरदस्ती पैदा कर रहे हैं, कृत्रिम गर्भाधान से पैदा कर रहे हैं। है न? ऐसे ही हो रहे हैं न पैदा? आपमें से अधिकांश लोग दूध पीते होंगे, जो लोग दूध पीते हैं मैं उन्हें ये बात साफ़-साफ़ बताना चाहता हूँ — बस स्मरण कर लिया करिए आप जो दूध पी रहे हैं वो एक स्त्री, एक मादा के कृत्रिम गर्भाधान से आ रहा है, आर्टिफ़िशियल इनसेमिनेशन (कृत्रिम गर्भाधान) से आ रहा है। उसको ज़बरदस्ती पकड़कर के लगभग बलात्कार जैसे तरीके से उसको गर्भ ठहराया गया है। उससे आपके सामने वो बिलकुल श्वेत, शीतल दूध आ जाता है।

क्यों कराना ये?

मारने की बात बाद में आती है, पैदा क्यों कराना है? कोई उत्तर तो दे दे, क्यों पैदा कराना है? पहले पैदा कराओ फिर बोलो मारना है। मेरी नहीं बुद्धि चल रही क्यों? पहले पैदा करो फिर बोलो,‘अरे! पैदा हो गया, गलत हो गया, अब मारना है।’ पैदा क्यों किया? इसीलिए लोग हत्याओं के खिलाफ़ होते हैं, मैं जन्म के ही खिलाफ़ हूँ। तुम जन्म दे-देकर के उसके साथ हर तरह की बर्बरता करते हो, चाहे पशु हो, चाहे मनुष्य। जन्म देने से पहले ही विचार कर लो न, जन्म देना क्यों है? मारने से बड़ी हिंसा तो जन्म देने में है।

क्यों पैदा किया उसको?

मैं नहीं पूछ रहा हूँ क्यों मारा? मैं पूछ रहा हूँ, पैदा क्यों किया? मैं पूछ रहा हूँ, उसको भी क्यों पैदा किया जिसको नहीं मारा? बछिया पैदा होती है उसको तो नहीं मारते? मैं पूछ रहा हूँ, बछिया को भी क्यों पैदा किया? हम कौन होते हैं किसी जानवर को, किसी पशु को और खासतौर पर ऐसे पशु को जिसको हम माता बोलते हैं, पकड़ कर के गर्भ ठहराने वाले हम कौन होते हैं? माताओं के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है, उन्हें ज़बरदस्ती गर्भ कराओगे?

हम कौन होते हैं? किसने ये अधिकार दिया है? माँ को खूँटे से बाँधोगे? फिर माँ का ही जो नर बच्चा पैदा होगा उसकी हत्या कर दोगे? क्या लगा वो आपका? भाई। फ़्रेट्रीसाइड , भातृ-हत्या। पैदा क्यों किया?

हवस ही नहीं शान्त होती दूध पीने की। क्या करोगे दूध पी-पीकर? कौनसी सेहत चमका ली है? हाँ, सौ तरीके के रोग और पैदा कर लिए हैं उससे। लेकिन एक पूरी इंडस्ट्री खड़ी हो गयी है जिसके मुनाफ़े दूध पर आश्रित हैं। तो दूध को बाज़ार में पुश (धकेला) किया जा रहा है, किया जा रहा है, पियो-पियो; हर चीज़ में दूध डाल दिया गया है। और हमारे लिए ऐसा सा बन गया जैसे अरे! दूध के बिना खाना कैसे चलेगा? क्यो?

कल रात को यहाँ पर नहीं खाया था क्या? उसमें दूध था? पनीर था? दही था, क्या था? तो क्या हुआ था, अपच हो गया? हैजा हो गया? जॉन्डिस (पीलिया), आंत्रशोथ, क्या-क्या हो गया? दो-चार को एड्स लग गया? क्या हुआ? क्या हो गया अगर कल बिना बिलकुल दूध का खाना खा लिया तो बताओ न?

आपके सवाल में एक बड़ा ठोस अज़म्पशन है कि इस इंडस्ट्री को तो चलना ही चलना चाहिए। आप कह रहे हैं, 'इसको तो चलना ही चलना चाहिए। अब इसके बाद बताइए बछड़े को कैसे न मारे।' क्यों चलना चाहिए? क्यों चलना चाहिए, बताइए न? नहीं, क्योंकि बात आपकी नहीं है।

प्र: मीनवाइल (इसी दौरान) है।

आचार्य: ये ये मीनवाइल क्यों, आज ही क्यों नहीं, मीनवाइल की क्या बात है? मैंने जब छोड़ा था, एक क्षण में छोड़ा था, एक क्षण में; और मुझे पनीर बहुत प्यारा था, पनीर पकौड़े। बचपन से भी साथ जाते थे कहीं, छोटा था, जाता था मटर-पनीर। वो दिन है, आज का दिन है, पनीर की कोई तलब उठी ही नहीं, कितने साल हो गए अब।

मीनवाइल की क्या बात है? मीनवाइल कोई कोई हवा है, पानी है, जिसके बिना जी नहीं सकते? एक चुनाव की बात है, अभी चुनाव कर लो, जैसे कल रात को चुनाव किया था। खैर, वो चुनाव नहीं था, वो ज़बरदस्ती थी। पर चुनाव हो सकता है, नहीं हो सकता है?

किसी रेस्तरां में घुस गये और वो वीगन ही है और, और कुछ नहीं खुला हुआ है। तो उसी में जो कुछ दिया हुआ उसी मैन्यू में से चुन लोगे कि नहीं? और ये भी हो सकता है कि कोई बताये नहीं कि वीगन है। वैसे एक बात बताऊँ आपको, बहुत सारी चीज़ें जो आप सोचकर खा रहे हैं कि वो दूध की हैं, वो दूध की होती नहीं हैं। क्योंकि टोफ़ू पनीर से बहुत सस्ता पड़ता है। और जो वीगन मिल्क है, चाहे खासतौर पर सोये का, सोय का, वो गाय-भैंस के दूध से बहुत सस्ता पड़ता है। तो आपका दूधिया भी आपको जो दे रहा है, वो हो सकता है वीगन पदार्थ हो।

इतना तो पक्का समझ लीजिए कि आप जब किसी रेस्तराँ में मटर-पनीर मँगाते हैं तो वो मटर-टोफ़ू होता है। पक्का समझ लीजिए क्योंकि टोफ़ू पनीर जैसा ही होता है बिलकुल और अगर अच्छे से बनाया जाए तो पनीर से ज़्यादा मुलायम हो जाता है, और सस्ता है पनीर से। तो क्यों नहीं कोई टोफ़ू इस्तेमाल करेगा, पनीर कोई क्यों चलाए? चीज़ (पनीर) भी बन जाता है।

ऑलमंड मिल्क, कोकोनट मिल्क, ये कहीं ज़्यादा सेहतमन्द होते हैं, गाय-भैंस के दूध से। तो लोग मिल्क का तो कंज़म्प्शन करेंगे ही न? आप सीधे-सीधे एनिमल मिल्क की जगह कोकोनट मिल्क पर क्यों नहीं आ जाते? मज़ेदार बात सुनिए, बहुत बड़े ग्राहक इन उत्पादों के, खुद डेयरीज़ हैं। अब वो दूध में पानी नहीं मिलाते। वो कह रहे हैं, 'हमारा भी पाप बचा' क्योंकि सोय मिल्क वास्तव में सस्ता है। पत्ती से बनता है न वो तो, पत्ती है। तो कौनसी ऐसी मजबूरी है कि छोड़ नहीं सकते, नहीं समझ पा रहा हूँ।

मुझे तो, मैं बहुत, सत्रह-अठारह का था तभी मुझे ये स्पष्ट हो गया था कि भैंस का दूध तो वही सब पदार्थ लिए होगा जो आपको भैंसा बना देगा। नहीं? बाहर बोलेरो खड़ी हुई है हमारी संस्था की, न वो पेट्रोल से चल सकती है, पेट्रोल डीजल से महँगा होता है। न वो मिट्टी के तेल से चल सकती है, जो सस्ता होता है? अरे! जिसका जो कंफ़िग्रेशन है वो उसी चीज़ से चलेगा न? आदमी को अपनी माँ का दूध चाहिए, भैंस का थोड़ी चाहिए।

आप भैंस के बच्चे को बकरी का दूध पिलाएँ तो क्या होगा? आप ऊँट के बच्चे को शेरनी का दूध पिलाएँ तो क्या होगा? कुछ क्या होगा बोलिए तो? सुनने में ही आप हँस रहे हैं कि ऐसा थोड़ी ही कर सकते हैं। तो आप आदमी के बच्चे को भैंस का दूध क्यों पिलाते हैं? ये बात एकदम ज़ाहिर नहीं है? बस बात इतनी सी है कि आदत लग गयी है। कभी ये सोचा ही नहीं कि यदि प्रकृति चाहती ही होती कि हम बहुत लम्बे समय तक दूध का सेवन करें तो हमारी माताओं को उतने ही लम्बे समय तक दूध आता।

हम पैदा होते हैं जितने समय तक हमें दूध की आवश्यकता है, माँ से मिल जाता है। उसके बाद आपको दूध चाहिए ही नहीं, चाहिए ही होता। तो सबसे पहली जो माँ है शरीर की वो प्रकृति होती है, उसने व्यवस्था कर दी होती।

कोई ऐसा पशु है अस्तित्व में जो अपनी माँ के अलावा किसी और का दूध पीता हो? बोलो? आदमी अकेला है जो ये करतूत कर रहा है। कोई ऐसा पशु है अस्तित्व में जो पूरी तरह से वयस्क हो जाने के बाद भी दूध पीता हो? दूध बच्चों का आहार है न? तुमने बढ़िया गबरू झबरीले शेर को दूध पीते देखा है कभी कि शेरनी का दूध पी रहा है?

तो आप कैसे हो जाते हो कि अब तीस साल, चालीस साल के रॉय साहब बन गये हैं और पी क्या रहे हैं? नुन्नू का दूध। वो दूध नुन्नू के लिए है आपके लिए थोड़े ही है। जिस दिन नुन्नु छ: महीने, आठ महीने का हो गया, पार कर गया, उसके बाद उसे दूध त्याग देना, प्रकृति ऐसी व्यवस्था कर देती है कि दूध अब उसे मिल ही नहीं सकता। पर हम उसे आर्टिफ़िशियल (कृत्रिम) तरीके से दूध दिये जा रहे हैं, दिये जा रहे हैं, दिये जा रहे हैं। और ये हमारी एक सनक बन गयी है, ये लस्ट (हवस) है।

पेरिस में देखा मैंने, वो पाँच-सात हज़ार तरीके की चीज़ (पनीर) बना रहे थे, अतिशयोक्ति कर रहा हूँ। चलो सौ तरीके की, बात समझिए क्या बोलना चाह रहा हूँ। हरी, गुलाबी, नीली, पीली, ऊँट की, गधे की तुम बताओ तुम्हें कौनसी चीज़ चाहिए। उन्हें चीज़ से ही ऑब्सेशन है, अब आपको ये बात अजीब लग रही है न? उनको ये बात आवश्यक लगती है।

बस इतनी सी बात है, आपको अजीब लग रही है, उन्हें आवश्यक लगती है। आपके लिए चीज़ का मतलब होता है, चीज़। वहाँ पर आप चीज़ बोलोगे तो आपको चार-पाँच चीज़ें और स्पेसिफ़ाई करनी पड़ेंगी । कौनसी प्रजाति का, कितने दिन का, किस रंग का और पता नहीं क्या-क्या होता होगा उसमें।

और जहाँ तक इसमें ये बात है कि इंडस्ट्री के आर्थिक हितों का क्या होगा। मैं कह रहा हूँ, देखिए भारतवासी चाय तो नहीं छोड़ने के, लस्सी तो नहीं छोड़ने के, पनीर की भी उनको लगी ही गयी है लत। दाल भी मँगाते हैं, दाल-मखनी। तो इन्ही चीज़ों का प्लांट बेस्ड उत्पादन करिए न, और आसान पड़ता है।

इतने सारे, आपने खुद ही कहा, दो सौ-तीन सौ किलो के जानवर इतने बड़े-बड़े जानवर सम्भालने से अच्छा एक प्लांट लगा लीजिए । प्लांट भी सस्ता पड़ेगा, उत्पादन भी सस्ता होता है; मुनाफ़ा भी ज़्यादा होगा, पाप भी नहीं लगेगा, आन्तरिक नुकसान भी नहीं होगा। असल में बहुत तर्क देने की जरूरत है नहीं, आप जितने लोग बैठे हैं आप सब मन-ही-मन जानते हैं कि ये काम ऐसा है जो रुकना चाहिए। आप ये भी अच्छे तरीके से जानते हैं कि दूध के उत्पादन में और माँस के उत्पादन में चोली-दामन का साथ है। जानते हैं कि नहीं जानते हैं?

जो दूध पी रहा है, वो परोक्ष रूप से माँस का उत्पादन कर रहा है। आपको क्यों लगता है, भारत माँस के निर्यात में नम्बर एक है, क्यों है? क्योंकि भारत में दूध बहुत पिया जाता है। दूध पीने वाला व्यक्ति ही माँस का निर्माण कर रहा है। जिस जानवर का आप दूध पीते हैं, वही जानवर जब दूध नहीं दे पाता तो वो कटता है और उसका माँस बनता है, वो माँस एक्सपोर्ट (निर्यात) होता है। ये बात एकदम साफ़ नहीं है? नहीं है?

इतना ही नहीं है, दूध पीकर आप माँस को सब्सिडाइज़ (आर्थिक सहायता) करते हैं। सब्सिडाइज़ कैसे करते हैं, समझ रहे हैं? भई , मान लीजिए जानवर को कटना है जब वो दो सौ किलो का हो जाए। अब अगर उसमें से सिर्फ़ माँस का उत्पादन होना होता तो दो सौ किलो का उसे करने के लिए उसे खिलाओ-पिलाओ और उसमें आपने जो कुछ खर्चा करा उस खर्चे के एवज में आपको सिर्फ़ क्या मिलेगा? माँस। तो वो जो माँस है उसकी कीमत क्या हो जाती? ऊँची, बढ़ जाती न? क्योंकि आपने इतना खिलाया-पिलाया और मिला माँस, तो माँस महँगा हो जाता है।

अब आप जो खिलाते-पिलाते हैं उससे दो चीज़ें मिलती हैं, पहले दूध फिर माँस, तो माँस दूध को सब्सिडाइज़ करता है और दूध, माँस को सब्सिडाइज़ करता है। दोनों सस्ते हो जाते हैं। अगर आप दूध पीना छोड़ दो और सिर्फ़ माँस के लिए जानवर तैयार किया जाए तो माँस इतना महँगा हो जाएगा कि लोग माँस खाना कम कर देंगे; इंडस्ट्री ही बन्द हो जाएगी। दूध पी-पीकर के आपने स्लॉटर इंडस्ट्री (बूचड़खाना उद्योग) चला रखी है। और ये दोनों ही इंडस्ट्रीज़ एक झूठ पर चल रही हैं, जो कोई उस झूठ का पर्दाफ़ाश करता है, वो सहमने लग जाते हैं। चाहे वो अमूल हो, चाहे कोई और हो।

आप कह रहे थे, 'लिंचिंग हो जाएगी।' कितनी धमकियाँ तो मुझे आ चुकी हैं। कि आप बाकी आध्यात्मिक बातें करते हैं करिए, ये दूध वाले मुद्दे पर मत बोलिए। बिलकुल धमकियाँ! खूनी धमकियाँ! क्योंकि लोगों के करोड़ों, अरबों दाँव पर लगे हुए हैं। मैं जो बोल रहा हूँ, उससे उनके पेट पर लात पड़ रही है। एक पूरी इंडस्ट्री पर खतरा आ जाता है। पर मुझे ये नहीं समझ में आता ये बात मुझे बार-बार बोलने की ज़रूरत क्यों पड़ती। बात इतनी साफ़ नहीं है कि किसी को भी दिख जाए। आपको कैसे नहीं दिखती?

और कैसे आप कह दोगे कि आध्यात्मिक हो या उपनिषदों में रुचि है, या वेदान्त में रुचि है, या चेतना के उत्कर्ष में रुचि है। जब आप दिनभर अपने भोजन में ही हिंसा डाले हुए हो। खाने में क्या-क्या डाला? हल्दी डाली, तेल डाला, नमक डाला और क्या डाला? हिंसा डाली, खून डाला और फिर कहते हो उपनिषद् पढ़ना है। कौनसा उपनिषद् ? खून पीकर उपनिषद् !

देखिए , नुकसान नहीं होगा और हो भी तो झेल लीजिए एक तरह का नुकसान होगा, तीन तरह के लाभ भी हो जाएँगे ।

प्र: मैं वो इंडस्ट्री छोड़ चुका हूँ।

आचार्य: बहुत बढ़िया। आपमें से बाकी लोग भी यहाँ जो बैठे हो, दो तरह के लोग होंगे, एक उस इंडस्ट्री के ग्राहक, दूसरे उत्पादक। मैं दोनों से ही बोल रहा हूँ, नुकसान नहीं होगा। एक चीज़ मैंने ज़िन्दगी में पकड़ी और मेरे साथ चली, मुझे लाभ भी हुआ। सही काम का गलत अंजाम नहीं होता। कुछ आप ठीक करने जा रहे हैं उसका आपको बुरा नतीजा नहीं मिल सकता।

हाँ, जो नतीजा मिल सकता है वो कुछ समय तक आपको हो सकता है कि बुरा लगे, कुछ समय तक। फिर आपको समझ में आएगा कि उसका जो नतीजा था, वो अच्छा ही था क्योंकि सही का नतीजा गलत कैसे हो सकता है? सत् से असत् कैसे आ जाएगा? नहीं हो सकता न?

तो जो कुछ सही है, उसको आँख मूँद करके फल की चिन्ता चिंता छोड़ दीजिए । सही काम आपने कर दिया, उसका फल अच्छा आ गया। आपको मुड़ कर देखने की ज़रूरत ही नहीं है, अच्छा फल आ चुका है। आपको हो सकता है बाद में पता चले कि आ चुका है, लेकिन आ चुका है।

दूसरे लोग रहे होंगे एक अतीत में, जब बहुत, बहुत-बहुत सीमित तरीके से दूध पी लेते थे लोग, जब गाय को बिलकुल घर के सदस्य की तरह ही रखते थे; वो बिलकुल दूसरे लोग थे। आप में से कितने लोगों के पास इतने बड़े घर हैं कि गाय बाँध लोगे या भैंस? 2 बीएचके में भैंस बाँधोगे? स्टूडियो अपार्टमेंट में गौशाला चलाओगे? आपको पता भी नहीं होता न कि वो जो पैकेज्ड सफ़ेद चीज़ आपके पास आयी है वो किस प्रक्रिया से आयी है। कुछ नहीं पता न?

फिर आप कहते हो, 'पर हमारे यहाँ तो बहुत पुराने ज़माने से ही सब लोग ही दूध पीते थे।' अरे भई , खुले अहाते में रहते थे मवेशी, कई बार बँधे भी नहीं होते थे। वो चीज़ दूसरी थी हालाँकि हिंसा तब भी थी उसमें। लेकिन फिर भी थोड़ी कम हिंसा थी, अब तो बहुत ज़्यादा हिंसा है, समय बदल चुका है। तो अतीत की दुहाई मत दीजिए कि दूध तो हमेशा से हम पी रहे थे। पहले भी हिंसा थी लेकिन कम थी, और अब तो उस पूरी प्रक्रिया में, दूध उत्पादन की पूरी प्रक्रिया में, बहुत-बहुत ज़्यादा हिंसा है।

प्र२: प्रणाम, आचार्य जी। मेरे दो सवाल हैं। पहला सवाल ये है कि जैसे अभी हम वीगनिज़्म की बात कर रहे थे, तो जैसे कुछ दृश्य मेरे सामने आये हैं— अफ़्रीका के कुछ ट्राइब्स (जनजाति) हैं जो सीधे-सीधे अपना न्यूट्रेंट (पोषण) लेने के लिए गाय का खून ही पीते हैं लेकिन उनके पास इतने मवेशी होते हैं कि उतना खून लेना उनके लिए ब्लड डोनेट करने जैसा ही हो। इसमें थोड़ा प्रकाश डालें प्लीज?

आचार्य: मैं नहीं समझा।

प्र२: कुछ ट्राइब्स हैं।

आचार्य: नहीं, मैं समझ गया, पर कोई मेरा खून पी रहा है इसमें और मेरे ब्लड डोनेशन में क्या समानता है?

प्र२: उनका खून इतना लिया जाता है डेली रिचुअल्स के तौर पर कि जितना इंसान अगर ब्लड डोनेट करें।

आचार्य: ब्लड डोनेट क्यों करता है इंसान?

प्र२: जैसे कि मेडिकल साइंस में कहा जाता है।

आचार्य: क्यों, क्यों करता है? आप ब्लड डोनेट क्यों करेंगे? मैं कहूँगा, मैं कहता हूँ, 'मुझे चाय पीनी है ब्लड डोनेट कर दीजिए ।' आप करेंगे? ब्लड डोनेट कब किया जाता है?

प्र२: जब किसी की ज़िन्दगी बच रही हो।

आचार्य: जब किसी की ज़िन्दगी और मौत का सवाल हो तब ब्लड डोनेट किया जाता है न। मैं कहूँ, 'शैम्पू खत्म हो गया, थोड़ा ब्लड डोनेट कर देना' तो आप करेंगे क्या? तो कोई अपने मज़े के लिए किसी का खून निकाल रहा है, इसमें और ब्लड डोनेशन में क्या समानता है? मेरे पास हेयर ऑइल नहीं है, मैं किसी का खून निकाल लूँ। ये ब्लड डोनेशन कैसे हो गया?

प्र२: वो उनके जीवन के लिए ही ज़रूरी है।

आचार्य: किसके जीवन के लिए जानवर का खून पीना जरूरी है कैसे? होमो सेपियन्स है या कुछ और?

प्र२: जैसे जो मैंने देखा मासिया ट्राइब्स करके है।

आचार्य: जो भी है, इंसान है न?

प्र२: जी।

आचार्य: तो इंसान कौनसा होता है, जो खून नहीं पिएगा तो मर जाएगा?

प्र२: उनके पास उगाने के लिए कुछ नहीं है, जगह।

आचार्य: अरे, तो कोई भी व्यक्ति ऐसी जगह पर नहीं पाया जाता जहाँ उसके खाने के लिए कुछ न हो। दुनिया की सबसे ज़्यादा आबादी, घनी जनसंख्या वाले क्षेत्र नदियों के किनारे क्यों हैं? उत्तर प्रदेश की इतनी घनी जनसंख्या क्यों है?

श्रोता उर्वर भूमि।

आचार्य: हाँ जी। तो जो भी लोग जहाँ होते हैं, वहाँ होते इसीलिए क्योंकि वहाँ उनके खाने-पीने भर को संसाधन उपलब्ध होते हैं।

जहाँ पर रेगिस्तान होता है, वहाँ कितने लोग पाये जाते हैं? बहुत कम। बहुत कम क्यों पाये जाते हैं? क्योंकि वहाँ उनको खाने-पीने को नहीं मिलेगा। लेकिन रेगिस्तान में फिर भी कुछ लोग पाये जाते हैं, वो उतने ही पाये जाते हैं जिनको किन्हीं तरीकों से अपने खाने-पीने का इंतज़ाम हो जाएगा। तो कोई ये कहे कि मैं जहाँ पर हूँ वहाँ पर खून पीने के अलावा कुछ है ही नहीं, तो झूठ बोल रहा है न, बिलकुल झूठ बोल रहा है। बाल बड़े रूखे-रूखे हो रहे हैं मेरे! आप तो बैठ गये!

YouTube Link: https://youtu.be/myA8Z5XNBW8

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