मारना बड़ा गुनाह है, या पैदा करना? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी! मैं डेयरी इंडस्ट्री (दुग्ध उद्योग) से जुड़ा हुआ हूँ, विशेषकर गौ-पालन से। ये उद्योग काफ़ी ज़्यादा क्रूर है, इसलिए मैंने आपसे जुड़ने के बाद यह उद्योग छोड़ दिया है।
मेरा सवाल मुख्य रूप से बछड़ों को लेकर था। डेयरी इंडस्ट्री में जो बछड़े पैदा होते हैं वो किसी काम के नहीं होते हैं। लेकिन न तो हम उन्हें रोज़ाना सौ-दो सौ रूपये का खिला सकते हैं और न ही उन्हें बाहर छोड़ सकते हैं क्योंकि क़ानून सख्त हैं। तो फिर हमें उन्हें खूँटे से बाँधकर जन्म के साथ-साथ खत्म करना पड़ता है।
मैं आपको सुनने के बाद आपसे अधिकांश बातों से सहमत होता हूँ लेकिन चूँकि आप वीगनिज़्म को प्रसारित करने का काम कर रहे हैं और मैं भी इसी उद्योग से जुड़ा हूँ। तो संस्था का जो इतनी बड़ी जनसंख्या को पूर्ण वीगनिज़्म पर लाने का अभियान है, मैं उससे सहमत नहीं हूँ, मुझे ये प्रैक्टिकली सम्भव नहीं दिखता है।
मेरी इंडस्ट्री के लिए आपके बताये हुए पूर्ण सत्य पर चलना बड़ा मुश्किल है। मेरा मानना है कि उस बछड़े को सात दिन खूँटे से बाँधकर, भूखा-प्यासा तड़पा-तड़पाकर मारने की बजाय क्या यह बेहतर नहीं है कि मैं तीन-चार साल उसका खयाल रखकर, उसे दो सौ-तीन सौ किलो का जानवर बनाकर, फिर उसे बूचड़खाने भेज दूँ जहाँ उसे सिर्फ़ पाँच सेकेंड का दर्द होगा? ऐसी स्थिति में कम बुराई और ज़्यादा बुराई में से किसका चुनाव करना ठीक है? और बछड़ों का प्रैक्टिकल समाधान क्या हो सकता है?
और एक निवेदन है कि कृपया वीडियो में मेरे चेहरे को ब्लर (धुँधला) कर दिया जाएँ।
आचार्य प्रशांत: ये बात आप एकबार फिर से बता दीजिएगा ब्लरिंग वाली।



