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मूर्खता है माँसाहार
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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माँस माँस सब एक है मुर्गी हिरणी गाय

आंख देखी नर खात है, ते नर नरकहि जाय

~ कबीर साहब

आचार्य प्रशांत: माँस सारे एक हैं , मुर्गी, हिरणी, गाय — इसमें मनुष्य और जोड़ लीजिए। कबीर साहब बात कर रहे हैं आपके और माँस के रिश्ते की। माँस कहीं से भी आया हो — माँस का अर्थ है ‘देह’ और ‘देह’ का अर्थ है ‘संसार’। कबीर साहब हमारे सामने सवाल खड़ा कर रहे हैं कि आपका और माँस का रिश्ता क्या है। दूसरे शब्दों में वह पूछ रहे हैं कि ‘आपका’ और ‘संसार’ का रिश्ता क्या है।

संसार को भोगने की लालसा ही माँस को भोगने की लालसा बन जाती है, और आवश्यक नहीं है कि माँस का सेवन स्थूल रूप में ही किया जाए, आप जिस भी रूप में पदार्थ को भोग रहे हैं, वास्तव में वह माँसाहार ही है।

आप किसी की देह के माँस को देखकर मानसिक तृप्ति अर्जित कर रहे हैं, मन-ही-मन सुख का सेवन कर रहे हैं तो वह भी माँसाहार ही है। पदार्थ का उपयोग अपनेआप को गहन तृप्ति देने के लिए करना — यह माँसाहार है। माँसाहार इतना ही नहीं है कि किसी को काटा और उसके शरीर का माँस निकालकर भोग लिया —

जब भी कभी आप संसार का, पदार्थ का उपयोग कर अपनेआप को आत्मिक शांति देना चाहते हैं, तो वह माँसाहार है।

आत्मा हैं आप, और आत्मा कभी भूखी नहीं होती; आत्मा के लिए कोई भोज्य पदार्थ नहीं होता; आत्मा कभी नहीं कहती कि मुझे कुछ खिला दो तो मैं संतुष्ट या तृप्त हो जाऊँ। माँसाहार का अर्थ है ‘स्वभाव-विरुद्ध कार्य करना’ — इस धारणा में जीना कि आत्मा को तृप्त करने के लिए किसी भोजन या किसी पदार्थ की आवश्यकता है, यह माँसाहार है। इस अर्थ में माँसाहार ब्रह्मचर्य का, आत्मस्थ होने का विपरीत हुआ — मुझे कुछ चाहिए जो मुझे पूरा कर देगा। और जब आपको कुछ चाहिए जो आपको पूरा कर देगा तो दो बातें एक साथ हो रही हैं: पहले, आप अपनेआप को माँस समझ रहे हो, क्योंकि माँस अधूरा होता है — माँस माने देह, पदार्थ, संसार — सीमित होता है हर तरीके से। उसे यह लग सकता है कि उसे पूर्ति प्रदान की जा सकती है या कम-से-कम उसकी सीमाएं बढ़ाई जा सकती हैं, उसका आकार बढ़ाया जा सकता है, दो और दो चार किया जा सकता।

आप अपनेआप को माँस समझ रहे हो यह पहली बात, और दूसरी बात आप संसार का उपयोग करके, संसार के माँस का उपयोग करके, इस माँस को (शरीर की ओर इशारा करते हुए) पूर्ति देना चाह रहे हो। आत्मा से हटते ही यह दोनों बातें होती हैं — पहली बात, आप पदार्थ हो जाते हो, दूसरी बात, क्योंकि आप पदार्थ हो जाते हो इसीलिए अपने से बाहर जो पदार्थ दिखता है, वह आपको बड़ा प्यारा हो जाता है; जगत बड़ा आकर्षक लगने लग जाता है। जो आत्मा से हटा नहीं वह तुरंत देह हो गया, पदार्थ हो गया। जो पदार्थ हो गया वह छोटा हो गया, सीमित हो गया। अब उसे असीमित होने की चाह सताएगी और असीमित होने का वह एक ही रास्ता पाएगा कि संसार से कुछ छीन लो, झपट लो, खा लो, नोच लो — यह माँसाहार है।

संसार से छीना-झपटी करके, अपनेआप को पूर्ति देने की नाकाम कोशिश को माँसाहार कहते हैं।

जो ‘आत्म- स्वभाव’ में जी रहा है, वह इतना भूखा कभी होगा ही नहीं। उसकी भूख हमेशा सतही होगी — ऊपर-ऊपर के तल पर भूखा बैठा रहेगा, भीतर वह पूर्ण तृप्त होकर के विश्राम कर रहा होगा। शरीर इतना भी भूखा हो सकता है कि कोशिकाएं कोलाहल कर दें, स्थिति ऐसी भी आ सकती है कि ज़रा भी अन्न नसीब ना हुआ हो, कई दिनों से गला सूख रहा हो, लेकिन फिर भी आत्मा नहीं सूख रही होती।

आत्मा को किसी बाहरी आपूर्ति की आवश्यकता कभी नहीं होती।

माँस-माँस सब एक है, मुर्गी हिरणी गाय

फर्क नहीं पड़ता बाहर से आप किसका शोषण, किसका माँस नोचकर खाना चाहते हैं। आप जिसका भी माँस नोचकर खाना चाहते हैं, एक बात तो पक्की है कि पहले आपने अपनेआप को माँस समझ लिया है, और इससे भी फर्क नहीं पड़ता कि आप बाहर से जो आपूर्ति ले रहे हो वह माँस की है भी या नहीं। संसार से ‘ज़रूरत का रिश्ता’ रखना ही माँसाहार है। उस ज़रूरत में यह नहीं आवश्यक है कि आप किसी का कत्ल ही कर दें। वास्तव में कत्ल करना तो बड़ी बेवकूफ़ी का काम हो जाता है। “अंडे देने वाली मुर्गी है, उसका माँस क्यों खाएं?” — तो कई बार क़त्ल ना करना और बड़े स्वार्थ का परिचायक होता है। जो आपको निरंतर आपकी आवश्यकताओं की पूर्ति दे रहा है, आप क्यों उसका माँस खाओगे?

माँस खाने से तात्पर्य यह है कि वह खत्म हो, उसकी शारीरिक मृत्यु हो जाएगी — तो आप कहोगे न कि मुझे तो माँस खाना ही नहीं है; माँस खा लिया तो जो लगातार आपूरित होता है वह बाधित हो जाएगा। ‘मारना’ ही हिंसा नहीं होती, कई बार ‘ना मारना’ और भी बड़ी हिंसा होती है। आप जिसको अपने स्वार्थवश ज़िंदा रख रहे हैं, आप उसके साथ हत्या से ज़्यादा बड़ी हिंसा कर रहे हैं। हत्या में तो आप एक झटके में उससे जो चाहते हो वह कर डालते हो, जिसको आप स्वार्थवश पोषण दे रहे हो, उसको तो आप शनैः शनैः काटते चलते हो, और धोखे से उसको आप यह बताते भी नहीं कि हमारा तुम्हारा रिश्ता ‘हिंसा’ का है।

हो सकता है आप एक बच्चे को बड़ा कर रहे हों, लेकिन बच्चे को बड़ा करने के पीछे अगर आपकी प्रेरणा यह है कि उससे आगे आपको लाभ होता रहेगा, तो यह बड़ा माँसाहार है — ‘स्वार्थ’ ही माँसाहार है; स्वयं को ‘छोटा’ देखना ही माँसाहार है; अपनी क्षुद्रता के भाव में ही जीना माँसाहार है। माँस तो हमेशा प्यासा होता है, जल रहा होता है, माँस की जलन को, माँस की प्यास को माँस बुझा देगा — इस भ्रम में जीना माँसाहार है।

कामवासना में जब आप अपने शरीर के ताप की पूर्ति किसी दूसरे शारीरिक साधन से करना चाहते हो तो वह माँसाहार है। आप कहते हो कि यहाँ ताप है और दूसरे के शरीर से शीतलता मिल जानी है, यह माँसाहार है।

बड़े संत आए हैं, इतनी बातें कह गए हैं — पशुओं को मत मारो, पक्षियों को मत मारो, हिंसा ना करो, माँस ना खाओ — तब भी माँसाहार कायम ही नहीं है, बढ़ता ही जा रहा है। आज मनुष्य जितना माँस खा रहा है, उतना कभी नहीं खाता था। कारण समझिएगा! हम कभी माँसाहार को सही और व्यापक अर्थों में परिभाषित ही नहीं कर पाए। हम कभी यह देख ही नहीं पाए कि माँसाहार वास्तव में है क्या, तो ले देकर माँसाहार बस नैतिकता की, चरित्र की, आचरण की चीज़ बनकर रह गया। “पशुओं से प्रेम करो! पशुओं पर दया करो!” — यह अच्छी बात है, सुनने में ठीक लगती है, लेकिन जब भीतर से वृत्ति ज़ोर मारती है तब इस तरह की सारी नैतिकता त्वरित झड़ जाती है।

माँसाहार कायम रहेगा तब तक जब तक मनुष्य शांति में स्थापित होकर जीना नहीं सीखता।

जब तक सभ्यता, शिक्षा, संस्कृति, समाज ऐसे हैं जो आपको प्रगति का, तरक्की का, महत्वाकांक्षा का संदेश देते हैं, आपको आपकी हीनता का विश्वास दिलाते हैं, आपसे कहते हैं कि कुछ अर्जित करो तो तुम सम्मान और प्रेम के काबिल रहोगे, तब तक माँसाहार कायम रहेगा क्योंकि ‘क्षुद्रता’ ही माँसाहार है — अपनेआप को ‘छोटा’ जानना ही माँसाहार है।

आप यह नहीं कर पाएंगे कि एक ओर तो आप ऐसा समाज बनाएँ जो विकासोन्मुखी है, जिसमें सफलता को बड़ा मूल्य दिया जाता है, जिसमें तरक्की को केंद्र में रखकर व्यवस्था बनाई जाती है, और दूसरी ओर आप यह भी कहें कि कृपया माँस ना खाएं — यह हो नहीं पाएगा, माँसाहार कायम रहेगा। हाँ, कुछ समय के लिए हो सकता है कि आप जबरन या भयात माँसाहार पर पाबंदी लगा दें, आप कुछ ऐसी कहानियाँ गढ़ दें जो यह बताती हों कि जो माँसाहार करते हैं उन्हें नर्क मिलता है, या आप कोई ऐसा धर्म स्थापित कर दें जहाँ यह कह दिया जाए कि माँस खाने वाले लोग अतिनिकृष्ट, अधम और नीच होते हैं, तो आदमी लाज के मारे, शर्म के मारे, भय के मारे माँस ना खाए। यह हो सकता है कि आप इस तरीके से स्थूल रूप से खाए जाने वाले माँस पर पाबंदी लगा दें, या आप सरकारी नियम बना दें कि माँस नहीं खाया जाए, तो आपको लगेगा कि जनसंख्या माँसाहार से विमुख हो गयी। वो माँसाहार अब दूसरे रूपों में प्रकट होगा — वह हिंसा, वह क्षुद्रता, अन्य तरीकों से फूट-फूटकर बाहर आएगी और जहाँ भी वह मौका पाएगी, वह माँस भी खायेगी। मैं शारीरिक माँस की बात कर रहा हूँ, और शारीरिक माँस खाने का मौका ना मिले तो वह दूसरे तरीकों से दुनिया को नोचेगी-खसोटेगी।

आप किसी का माँस नहीं नोच सकते कोई बात नहीं, आप उसका पैसा नोच लीजिए। किसी का माँस नोचने के लिए उसको खंजर मारो तो कहा जाएगा कि बुरा है, लेकिन किसी के धार्मिक विश्वासों को आप बुरा समझते हों और इस ख़ातिर आप उसे खंजर मार दो तो कहा जाएगा कि यह धार्मिक कृत्य है — दोनों ही स्थितियों में आप खंजर तो चला ही रहे हो न। जो भी छोटा है, वह खंजर चलाएगा; जो भी छोटा है, वह खंजर खा चुका है — वह अब और करेगा क्या? वह लगातार चोट से बिलख रहा है। उसे कोई चाहिए जिसपर वह अपना गुस्सा निकाल सके। धर्म ही यदि ऐसा है जो आपको आपके छोटे होने का एहसास कराता है, जो बताता है कि तुम तो कुछ हो ही नहीं, तुम तो पाँव की धूल हो, अपनेआप को कभी समग्र, विशाल मत देखना, विराट से तुम्हारा संबंध हो ही नहीं सकता, तो उस धर्म के अनुयायी माँस खाने में सबसे आगे रहेंगे।

जबतक धर्म आपको आपकी अनंतता में स्थापित नहीं करता तब तक आप हिंसक बने ही रहेंगे।

माँसाहार, हिंसा, कष्ट, लघुता, संकीर्णता — यह सब एक हैं, और जब यह जाएंगे, तब सब एक साथ ही जाएंगे। यह जाएँ, इसके लिए ‘वास्तविक धर्म’ चाहिए। इसके लिए वह धर्म चाहिए जो हुँकार भरने दे — “अहम् ब्रह्मास्मि” की। जब तक आप अपूर्ण अनुभव कर रहे हो — अपनी अपूर्णता को आप तमाम साधनों से भरते ही चलोगे — तब तक आपका सहारा सिर्फ़ संसार ही रहेगा। यह बड़ी अजीब बात है, समझिएगा! धर्म कोई ऐसा हो सकता है जो आपको बताए कि कोई ईश्वर है जो बहुत बड़ा है और तुम बहुत छोटे हो और यह बात ईश्वर की महानता का सबूत है कि वह इतना बड़ा है और तुम कुछ भी नहीं — पर ज्यों हीं उसने आपको यह बता दिया कि ईश्वर तो अतिविशाल है, तुम बहुत छोटे हो, वैसे ही आप अपनी क्षुद्रता से निजात पाने के लिए कुछ प्रयत्न शुरु कर दोगे और प्रयत्न आपके सारे होंगे संसार के ही क्षेत्र में। तो अपनी क्षुद्रता को आप कैसे हटाओगे?

आप संसार को और भोगोगे, आप संसार को अपने भीतर और जमा करोगे। यह होता है जब आपसे कह दिया जाता है कि तुम्हारा ईश्वर, तुम्हारा भगवान, तुम्हारा ख़ुदा तो परम शक्तिशाली है, परम विराट है, अनंत है, और तुम अति सीमित और संकुचित और नाकाफ़ी हो।

सीमित होना स्वभाव नहीं, क्षुद्रता स्वभाव नहीं, और अगर क्षुद्रता का विश्वास आ गया तो आपको अच्छा नहीं लगता, आप उस क्षुद्रता से मुक्ति पाने के लिए यत्न शुरू कर देते हैं — उन्हीं यत्नों को माँसाहार कहते हैं।

माँसाहार इस अर्थ में एक झूठे धर्म का दूसरा नाम है। जो धर्म आपको जितना ‘छोटा’ और ‘क्षुद्र’ साबित करता जाएगा, उस धर्म के अनुयायियों में माँसाहार उतना ज़्यादा पाया जाएगा। माँसाहार आप तभी छोड़ोगे जब आप अपने बड़प्पन में स्थापित हो जाओ। जो व्यक्ति जितना हीन-भावना में जिएगा, वह संसार को उतना ज़्यादा लालायित नज़रों से देखेगा। उसके लिए उसकी हीनता से मुक्ति पाने का एक ही साधन बचा, क्या? — संसार को नोच लो, खसोट लो — “यही तो संपदा बिखरी हुई है, यही तो एकमात्र साधन है जो मुझे हीनता के कष्ट से मुक्ति दिला सकता है”।

आप जब हिंसक होते हो तो आपका रिश्ता कुछ मात्र खाए जाने वाले जानवरों से ही हिंसक नहीं हो जाता; आपका रिश्ता सबसे हिंसक हो जाता है, और फ़िर यह भी हो सकता है कि नैतिकता के कारण आप जानवरों को ना मारें, लेकिन फ़िर आप तमाम अन्य तरीकों, परोक्ष तरीकों से, पता नहीं कितनों को मार रहे हैं। जानवर को मारने का यही तरीका थोड़े ही होता है कि भोजन के लिए उसकी हत्या कर दो — आपकी फैक्ट्री अगर दिन-रात विषैला धुआँ उत्सर्जित कर रही है, और उस धुएँ के कारण तमाम पक्षी मर रहे हैं, तो यह माँसाहार नहीं हुआ क्या?

माँसाहार बस तब थोड़े ही है जब माँस आपके मुँह में जाए और पेट में जाए। बिलकुल ऐसा हो सकता है कि आपने जीवन में कभी माँस क्या अंडा भी ना खाया हो लेकिन आपकी जीवनशैली ऐसी हो कि आपके कारण हज़ार पशुओं को कष्ट होता हो, यह माँसाहार नहीं है?

और आगे चलते हैं, यह भी हो सकता है कि पशुओं को लेकर आपमें बहुत संवेदनशीलता हो, तो आप माँस भी ना खाते हों, पशुओं का ख़्याल भी खूब रखते हों — आप हो सकता है कोई ऐसा संगठन नहीं चलाते हों जो पशुओं का हमदर्द हो, लेकिन पशुओं का ख़्याल रखने वाले मनुष्यों के प्रति आप घोर कटुता और वैमनस्य से भरे हुए हैं, यह माँसाहार नहीं हुआ?

कैसे भरे हुए हैं वैमनस्य से?

आप हैं किसी संस्था के मालिक और आप ये मौका देखते रहते हैं कि कैसे किसी का दो रुपय काट लूँ — क्या माँस काटना ही माँसाहार है, किसी के दो रूपय काटना माँसाहार क्यों नहीं है?

दर्द तो उसे दोनों ही स्थितियों में हो रहा है। तो हो सकता है आपका पंथ, आपका मत, आपका धर्म आपको सिखाए कि माँस मत खाओ, और पशुओं को कष्ट मत दो! आप कहोगे — ठीक, पशुओं को कष्ट नहीं दे सकता तो ज़रा मनुष्य को कष्ट देकर देख लेता हूँ। कष्ट तो मुझे देना है, किसी न किसी को तो ज़रूर दूँगा। जो कष्ट में होता है, उसके माध्यम से सारे संसार में सिर्फ़ कष्ट ही फैलता है, और आपके लिए परम कष्ट यही है कि आपसे कह दिया जाए कि आप ‘छोटे’ हो।

धर्म का एक ही कर्तव्य है, धर्म का एक ही अंत है, धर्म के लिए एक ही साध्य है — वह आपको आपकी चिंता से मुक्ति दिला दे।

जो धर्म आपको आपकी हीनता, क्षुद्रता, संकोचों से, संशयों से मुक्ति ना दिलाता हो, वह धर्म अपवाद और क्लेश का कारण बनेगा — जो दुःख में होता है, उसीको दुःख देने में रस आता है; जो छोटा होता है, उसीको अपने से बड़े को देखकर डाह उठती है; जो तड़प रहा होता है, उसी से शांति देखी नहीं जाती।

“माँस माँस सब एक है” — ‘एक’ पर ध्यान दीजिएगा, ‘एक’ पर। ‘माँस माँस सब एक है’ अर्थात पदार्थ सब एक हैं, उन पदार्थों को भोगने की कामना रखने वाला मन भी एक है, और उस मन का एक लक्षण है कि वह मन आत्मा से छिटका हुआ है। आत्मा से छिटका हुआ मन एक भले ही है, उसका आकार-प्रकार, रंग-रूप, नाम सब अलग-अलग होंगे, और उस मन की दृष्टि एक होगी — वह जैसा भी देखेगा, दुनिया को भोगने के लिए ही देखेगा। संसारी भी जगत को अवसर की तरह देखता है और सन्यासी भी। संसारी कहता है — “जगत अवसर है अपनी जेबें भर लेने का, जगत ऐसा है जैसे बिखरी हुई संपदा, उसको लूटो और अपनी जेबें भर लो”, और सन्यासी कहता है — “जगत अवसर है जगत के ही खालीपन को देख लेने का।” दृष्टि में भेद है — संसारी को संसार में संपदा दिखाई देती है और सन्यासी को संसार में सन्नाटा दिखाई देता है। जिसे संसार में संपदा दिखाई दे रही है , वो लूटेगा, उसी लूटने को माँसाहार कहते हैं। जिसे संसार में संपदा दिखाई दे रही है — वह संसार का भक्षण करेगा, वह हत्या करेगा, वह संसार का काल्पनिक वैभव देख देखकर कुढ़ेगा, जलेगा और ललचाएगा, वह किसी भी तरीके से अपनी ज्वाला को शांत करने के लिए किसी का भी खून पी जाएगा — इसे माँसाहार कहते हैं।

आप पीड़ित ना हों तो आपसे किसी को पीड़ा दी जाएगी नहीं और आपकी पीड़ा के लिए कोई दूसरा उत्तरदायी होता नहीं। आप जब किसी पक्षी को हाथ में लेकर उसकी गर्दन रेत रहे होते हैं, तो पक्षी तो कष्ट में होता ही है, आप भी घोर कष्ट में होते हैं, जिसके कारण आपको उसका कष्ट दिखाई नहीं देता। आप इतने कष्ट में होते हैं  कि आप कहते हैं, ‘तेरा कष्ट तो बहुत छोटा है’, कहते हैं, ‘तुझे मेरे कष्ट का  कुछ पता है?’। जो कष्ट में है वह और कष्ट प्रसारित करेगा। आप जब किसी को कटु वचन बोल रहे होते हैं तो ऐसा नहीं है कि आपको नहीं पता है कि उसे चोट लग रही है, पर आपका तर्क यह होता है कि मुझे इतनी चोट लगी हुई है, मुझे किसी ने मरहम लगाया क्या?

और मुझे जितनी चोट लगी हुई है उसके सामने वह चोट कुछ भी नहीं जो मैं तुझे दे रहा हूँ। हिंसा का तर्क ही यही है। जब मैं इतनी चोट लेकर जी सकता हूँ तो थोड़ी चोट तुझे दूँगा भी सही — यह हिंसा का तर्क है, यही माँसाहार है। एक ही चोट है, मैं दोहराकर कह रहा हूँ, जो आपको छलनी किये जा रही है — वह चोट है बिछुड़ने की चोट, वह चोट है संकुचन की चोट, वह चोट है भय की चोट। वह चोट ही नकली है, इसीलिए समस्त माँसाहार के पीछे, समस्त उपभोक्तावाद के पीछे, समस्त भोगवाद के पीछे जो तर्क है, वह भी नकली है।

बाहर से तुम कुछ ऐसा हासिल नहीं कर पाओगे जो तुम्हें भर जाए, जो तुम्हें शांत कर जाए। तुम्हें जहाँ जाना है, तुम्हें जो पाना है, वह बाहर से हासिल नहीं होगा। तुम चाहे मुर्गे का, बकरी का भोग करो, चाहे टीवी का, फिल्मों का, इंटरनेट का — भोग, भोग है — कोई भोग तुम्हें मुक्ति ना दे पाएगा। सब भोगी एक हैं।

वही कबीर साहब कह रहे हैं — “माँस माँस सब एक है,” अंतर नहीं पड़ता कि भोग का विषय क्या है — भोग भोग एक है, भोगने वाला मन एक है, और इसीलिए बहुत आसान होगा एक प्रकार के भोगी का दूसरे प्रकार का भोगी बन जाना। जो कामवासना में गहराई से रत है, उसके लिए माँस-वासना दूर नहीं है, क्योंकि एक प्रकार की माँस-वासना में वह पहले से ही उद्यत है। कामी नर जिस तरीके से स्त्री के माँस को देखता है, उसकी नजर में और स्वादिष्ट रूप से पकाए गए मुर्गे को एक भूखे भोगी के द्वारा देखे जा रहे तरीके में कोई विशेष अंतर नहीं होता है। दृश्य साकार है, देख लीजिए सामने — एक आदमी है जो भोग के लिए स्त्री के माँस को देख रहा है और एक दूसरा आदमी है जो भोग के लिए जानवर के माँस को देख रहा है, दोनों की नज़रों को आप बहुत भिन्न न पाएंगे। जो स्त्री को भोग रहा है उसे बहुत समय नहीं लगेगा पशु को भोगने में, और जो पशुओं को भोगने की आदत पाल चुका है उसकी कामवासना अति सक्रिय होगी — उसे बलात्कार करते ज़रा कम समय लगेगा। अगर वह किसी तरह अपनेआप को बलात्कार से रोककर रखेगा तो वह तरीका ‘बल’ का ही होगा। वह बलात अपनेआप को बलात्कार से रोकेगा, ऐसे ही लोगों के लिए फ़िर कानून होते हैं, नियम होते हैं। यह नियम-कानून ना हों तो वह सड़कों पर बलात्कार कर डाले। बलात रोकना पड़ता है बलात्कार करने से।

माँस माँस सब एक है, मुर्गी हिरणी गाय

तो पहली बात, मुर्गी-हिरणी-गाय तक नहीं रुकना है, उसमें मनुष्य को भी शामिल कर लो, और दूसरी बात, माँस तक ही नहीं रुकना है, उसमें समस्त भोग्य पदार्थों को शामिल कर लो और आँख तुम्हारी अगर भोगी की है तो दुनिया का हर पदार्थ तुम्हारे लिए मात्र भोग्यवस्तु ही है, यहाँ तक कि तुम्हारी कल्पनाएँ भी तुम्हारे लिए भोगवस्तु ही हैं, तुम उन्हें भी भोग डालोगे।

माँसाहारी मानवा परतक्ष राक्षस अंग

ताकि संगति मत करो, पड़त भजन में भंग

~ संत कबीर

‘कोई कैसे बनता है माँसाहारी’ — उस प्रक्रिया पर प्रकाश डाल रहे हैं कबीर साहब। कोई कैसे बन जाता है राक्षस? कोई कैसे खो देता है सुकून, चैन, शांति? कोई कैसे लिप्सा की गर्त में जा गिरता है? कारण एक ही है — संगति।

“किसके साथ हो?” — संगति सबसे पहले भीतरी होती है फिर बाहरी। बाहर तुम कुसंगति में पड़ते तभी हो जब भीतर पहले उसके साथ हो लेते हो जिसके साथ नहीं होना चाहिए था। याद रखना, तुम्हारे भीतर दो हैं — एक वह जिसके भीतर तुम हो और दूसरा वह जो तुम अपनेआप को समझते हो। दो होते हैं सदा: पहली — ‘आत्मा’, जो अनंत है, सर्वव्यापक है, जिसमें तुम समाए हुए हो, और दूसरा होता है — ‘अहंकार’, जो तुम अपनेआप को मानते हो। अहंकार का आत्मा से सतत संघर्ष होता रहता है और तुम्हें चुनाव करना होता है कि उस संघर्ष का नतीजा क्या निकलेगा। अहंता स्वयं चुनती है उस संघर्ष का नतीजा; आत्मा तो निर्विकल्प होती है; आत्मा को कोई चुनाव करना नहीं होता। तो अहंकार ने आत्मा से जो

काल्पनिक संघर्ष उठा रखा होता है, उसका परिणाम क्या निकलना है, यह स्वयं अहंकार तय करता है।

यह बात मज़ेदार है, इसको पकड़ना। तुम अहंकार हो! तुम्हारा लगातार ‘आत्मा’ के साथ आँख-मिचौली का संघर्ष चल रहा है — कभी धूप, कभी छाँव; प्यार भी तुम्हीं से, तकरार भी तुम्हीं से — यह नाता होता है ‘आत्मा’ और ‘अहंकार’ का। अब यह जो आँख-मिचौली चल रही है, यह जो पकड़म-पकड़ाई चल रही है, यह जो खेल चल रहा है, इसमें जीतेगा कौन यह आत्मा तय करने नहीं आती, क्योंकि कोई भी जीते, ‘आत्मा’ को फर्क नहीं पड़ता, वह तो सर्वदा अप्रभावित रहनी है। सत्य पर कब आँच आनी है?

प्रभाव किसपर पड़ता है?

‘अहंकार’ पर। तो जीत और हार को तय भी कौन करता है? अहंकार स्वयं तय करता है।

‘कुसंगति’ तब है जब अहंकार को अपनी संगति आत्मा की संगति से ज़्यादा प्यारी लगने लगे, इसे कुसंगति कहते हैं। जब अहंकार अपनेआप को ज़्यादा मूल्य देने लगे बजाय कि ‘सत्य’ के, बजाय कि ‘आत्मा’ के, उस स्थिति को कुसंगति कहते हैं। सुसंगति किसे कहते हैं? अहंकार को आत्मा का संग प्यारा है, इसको कहते हैं सुसंगति। अहंकार को आत्मा का संग प्यारा है, इसे कहते हैं सत्संग; अहंकार को आत्मा का संग प्यारा नहीं है, यह हुआ कुसंग। जब

अहंकार को आत्मा का संग प्यारा नहीं होता तो अहंकार अपनी ही दुनिया में कुछ ऐसे पात्र रच लेता है जिनकी संगति वह कर सके; दूसरे शब्दों में, अहंकार फ़िर खुद अपनी संगति करने लग जाता है — वह अपने द्वारा चुने गए, अपने द्वारा रचित, अपने द्वारा प्रक्षेपित किसी विषय की, किसी वस्तु या किसी व्यक्ति की संगति करने लग जाएगा — इसी को फिर कुसंग कहते हैं।

‘कुसंग’ की शुरुआत कहाँ से होती है?

भीतर से होती है! ऐसा नहीं है बाहर से कोई आएगा और आपको खराब करके, आपको कुसंगति के दाग देकर चला जाएगा — नहीं। बाहर वाला बाद में आता है, आपने पहले भीतर निर्णय किया होता है कि मुझे ‘आत्मा’ प्यारी नहीं है, मुझे ‘सत्य’ प्यारा नहीं है, मुझे तो कुछ और ही प्यारा है, और जब आपने यह निर्णय कर लिया होता है, तब फ़िर बाहर कोई प्रकट हो जाता है आपके निर्णय को क्रियान्वित करने के लिए। वह जो बाहर वाला है, वह तो सिर्फ़ आपकी इच्छाएँ पूरी करने के लिए आया है। ‘इच्छाएँ’ आपके भीतर पहले ही जागृत हो चुकी थीं। ‘कुसंगति’ को बाहर मत समझ लेना। यह भूल हम बहुत करते हैं। हम बाहर वाले को भगा देते हैं यह सोचकर कि कुसंगति टल गई। कुसंगति टल नहीं गई है, कुसंगति भीतर है। एक बाहर वाला हटेगा, दूसरा कोई बाहर वाला, किसी और रूप में, किसी अन्य तरीके से सामने आ जाना है। आपको कुसंगति का दूसरा बहाना मिल जाना है। बाहर जो आया है वह कुसंगति का बस बहाना है, असली कुसंगति भीतर होती है। इसीलिए बाहर वाले को हटाना अक्सर निष्प्रभावी रहता है। बाहर वाला हट के भी नहीं हटता। भीतर से ज्यों ही कुसंगति हटती है, फिर बाहर वाला स्वयं ही झड़ जाता है। जैसे सूखा हुआ पत्ता, अब उसको हटाना नहीं पड़ता। आपका उससे आकर्षण, मोह ही ख़त्म हो जाता है। आप हट जाते हो उससे, उसे हटाना नहीं पड़ता। वह तो प्रतिनिधि था आपकी ही इच्छाओं का — आपकी ‘इच्छा’ गयी, वह प्रतिनिधि गया।

माँसाहारी मानवा परतक्ष राक्षस अंग।

ताकि संगति मत करो, पड़त भजन में भंग।।

किस मानव की बात कर रहे हैं कबीर साहब?

कबीर साहब कह रहे हैं — वह मानव स्वयं तुम हो। कुसंगति मत करो आंतरिक — तुम्हारे ही भीतर कोई है जो माँसाहारी है, उसे ‘अहंकार’ कहते हैं; तुम्हारे ही भीतर कोई है जो ‘परमात्मा’ है और तुम्हारे ही भीतर है ‘राक्षसों’ का पूरा एक समूह। यह तुम पर है कि तुम किसके साथ होना चाहते हो – ‘अहंकार’ और ‘आत्मा’ है। अहंकार तय करेगा कि उसको आत्मा के साथ होना है या नहीं। इतनी छूट उसे मिली हुई है। यह छूट आत्मा प्रदत्त है।

मांसाहारी मानवा परतक्ष राक्षस अंग

ये मानव कौन है?

पड़ोसी नहीं है तुम्हारा। वह कोई बगल में नहीं बैठा है। वह कोई अन्य नहीं है कि बाहर से आया हो, वह स्वयं तुम हो। कबीर साहब कह रहे हैं कि आंतरिक कुसंगति से बचना। आंतरिक कुसंगति से बच गए तो बाहरी कुसंगति तुम्हारा बिगाड़ क्या लेगी?

कहा है न संतो ने — चंदन के पेड़ पर भुजंग लिपटे रहते हैं, क्या फर्क पड़ता है?

चंदन को क्या विष व्यापद हो जाता है? 

चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग।

जे रहि उत्तम प्रकृति, का कर सकत कुसंग।।

आंतरिक कुसंगति ना हो तो बाहर की कुसंगति तुम्हारा कुछ ना बिगाड़ पाए। बाहर की कुसंगति अगर तुम्हारा कुछ बिगाड़ गई, तो उसकी एक ही वजह होती है — भीतर की कुसंगति बहुत खराब थी, वरना चंदन पर साँप, हालांकि चंदन पर साँप नहीं लिपटते हैं, जो इशारा है उसको समझो। तुम अगर भीतर से स्वस्थ हो, भीतर से सुगंधित हो, तो बाहर साँप भी तुमसे अगर लिपटे रहे तो तुम्हारा हरज़ा नहीं कर पाएंगे। लेकिन हमारा तो हरज़ा हो जाता है, हमारा तो नुकसान हो जाता है, क्योंकि कुसंगति को भी हम अपनी इन्हीं आँखों से बाहर की तरफ़ देखते हैं, भीतर को नहीं देखते। भीतरी कुसंगति समझ रहे हैं क्या होती है?

जब अहंकार कहे कि मुझे आत्मा की संगति नहीं चाहिए, यह कुसंगति है। और यह आपके साथ खूब होगा, सतर्क रहिएगा! कोई-न-कोई कारण मिलेगा, कोई-न-कोई बहाना मिलेगा आत्मा से दूर जाने का, छिटकने का। यही कुसंगति है। आत्मा से आप जहाँ दूर हुए नहीं, तहाँ बाहर आपको कोई मिल जाएगा जो आपके मंतव्य को पूरा करने में सहायक हो जाएगा। यह ऐसी सी बात है कि आपको घर से दूर जाना है और आप आकर के सड़क पर खड़े हो जाते हो कि कोई-न-कोई बस तो मिल ही जाएगी। इसका यह अर्थ नहीं है कि बस आई थी आपको अगवा करने। आप पहले घर से निकलकर के सड़क पर खड़े हो गए थे कि कोई-न-कोई वाहन तो मिल ही जाना है। वाहन को दोष मत दे दीजिएगा। संसार में अगर कोई आपको गंदा कर देता है, संसार में कोई स्थिति, कोई व्यक्ति, कोई विचार, कुछ भी आकर के अगर आपको मैला कर जाता है तो वह बस मैलेपन की अभिव्यक्ति है, मैलापन पहले ही मौजूद था आपके भीतर। उस बाहर वाले व्यक्ति के ज़रिए वह सिर्फ़ अभिव्यक्त हो गया है, दिखाई दे गया है। बाहर वाला नहीं मैला कर गया, मैलापन पहले ही मौजूद था भीतर। भीतर का मैलापन यही है — “मुझे आत्मा के साथ नहीं होना, मुझे अपनी चलानी है, मेरे अपने तरीके हैं, मेरे अपने विचार हैं, मेरी अपनी नीतियाँ हैं, मेरा अपना जीवन, मैं अपने हिसाब से देख लूँगा”। आप आत्मा के पास जाओ तो फ़िर तो झुकना पड़ता है, अपनेआप को खोना पड़ता है, वहाँ मालिक तो बस एक होता है।

माँसाहारी मानवा परतक्ष राक्षस अंग

तुम्हारे भीतर ही वह माँसाहारी बैठा हुआ है, तुम्हारे भीतर ही वह क्षुद्रता की भावना बैठी हुई है, उसी को ‘माँसाहारी मानवा’ कह रहे हैं कबीर साहब। राक्षस वही है जो सोचे कि दूसरे का माँस खा लेने पर उसे सुख मिल जाना है। वह तुम्हारे ही भीतर बैठा हुआ है। तुम्हारे ही भीतर बैठी हुई  है वो वृत्ति जो सोचती है कि संसार बड़ी ख़ास जगह है और यहाँ से कुछ बहुत ख़ास हासिल किया जा सकता है। ‘मैं’ है वो ‘माँसाहारी मानवा’ जिसके विरुद्ध कबीर साहब तुम्हें सतर्क होने के लिए कह रहे हैं।

ताकि संगति मत करो, पड़े भजन में भंग

‘भजना’ किसको?

सत्य को, आत्मा को। उसके (अहंकार) साथ रहोगे तो आत्मा को थोड़े ही भज पाओगे। वो तो यही कह रहा है कि आत्मा को मत भजो। अपने ही ‘विकारों’ की संगति करोगे तो ‘सत्य’ को नहीं भज पाओगे — भजना माने समर्पित होना; भजना माने उसपर एकाग्र हो जाना; भजना माने मात्र उसी के ध्यान में रहना। तुम कैसे शून्यता के ध्यान में रह पाओगे जब भीतर जो माँसाहारी है, वह तुम्हारे चित्त को विविध वस्तुओं से और विचारों से भरे दे रहा है?

तुम्हारे खालीपन को गंदा किए दे रहा है?

यह सब प्रतीक हैं इनको स्थूल-तौर पर मत ले लेना।

“माँसाहारी मानवा” का ये अर्थ नहीं है कि एक पड़ोसी है बगल में जो माँस खाता है, उसकी संगति से बचने के लिए कह रहे हैं कबीर साहब — ना! कबीर साहब स्वयं ऐसा ना करें, तुम्हे क्यों कहेंगे? कबीर साहब यह नहीं कह रहे हैं कि बगल में अगर कोई माँसाहारी पड़ोसी हो तो उससे बातचीत वगैरह ना करो, उससे रिश्ते तोड़ लो, यह नहीं कह रहे हैं। कबीर साहब बल्कि कहेंगे कि जाओ उससे मिलो — उसे प्रेम की बहुत ज़रूरत है। प्रेम यदि मिल जाए उसे तो हिंसा उसके जीवन से तिरोहित हो जाएगी। अपने भीतर के माँसाहारी की संगति मत करो, फ़िर बाहर फर्क नहीं पड़ेगा किसकी संगति कर रहे हो — “चंदन विष व्यापत नहीं”, फ़िर बाहर तुम मुक्त हो जाओगे हर प्रकार की संगति करने के लिए। तुम जिसकी भी संगति करोगे, उसी का कल्याण करोगे।

प्रश्नकर्ता: ये चुनाव तो अहंकार ही करेगा। तो अहंकार क्यों चुनेगा माँस को छोड़ना?

आचार्य जी: जब तक वह यह प्रश्न पूछ रहा है, तब तक तो मुश्किल है! चुनाव अहंकार करेगा तो अपने हित में ही तो करेगा?

हित कहाँ है यह देख लो, और उसी के अनुसार चुनाव कर लो। बात होश की है, बोध की है, अपना हित जानने की है और इस विश्वास से मुक्त हो जाने की है कि तुम्हारा हित हो ही नहीं सकता। हम अपना हित इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि हम यह माने ही बैठे हैं, बड़ी दृढ़ता-पूर्वक हमें विश्वास है कि मेरा कुछ हो सकता नहीं! अहित तो हो ही चुका है और अहित तो होना ही है, तो जब अहित हो ही रहा है तो चलो थोड़ा खून और बहा देते हैं।

प्रश्नकर्ता: यह विश्वास कैसे आए कि कुछ अहित नहीं होगा?

आचार्य जी: विश्वास लाना नहीं होता है। आत्मा के पास आने के लिए कोई विश्वास नहीं चाहिए। विश्वास तुम्हारे पास है कि ‘अहित’ आवश्यक है — इस विश्वास का गिरना ज़रूरी है। यह विश्वास व्यर्थ है। ‘जीवन का अर्थ ही दुःख है’ — यह विश्वास पकड़ कहाँ से लिया? इस विश्वास को गिरना होता है। कुसंगति है इस विश्वास को और पकड़ कर रखना।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सांसारिक परिभाषा ही यही है जीवन की। इस विश्वास का गिरना आवश्यक है।

आचार्य जी: ‘दुःख अनिवार्य है’, जब तक कि यह धारणा गिरेगी नहीं, तब तक तुम आत्मा को समर्पित होगे नहीं। अगर दुःख अनिवार्य है ही, तो फ़िर समर्पण किसलिए? समर्पण के बाद भी बना रहेगा। जब तक यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि आत्मा समाधान है दुःख की समस्या का, तब तक तुम दुःख को सत्य ही मानते रहोगे। सत्य माने क्या?

वो जो अनिवार्य है, नित्य है, जो हट ही नहीं सकता। जो हट ही नहीं सकता, उसी को तो सत्य कहते हैं। अगर दुःख हट ही नहीं सकता तो दुःख को तुमने क्या बना दिया?

तुमने दुःख को सत्य का दर्जा दे दिया। अब आत्मा के पास क्यों जाओगे? आत्मा तो सत्य थी। अब तो तुम दुःख के पास ही रहोगे क्योंकि दुःख को तुमने सत्य का दर्जा दे दिया, यह कुसंगति है। जो सत्य नहीं है उसे सत्य का दर्जा देना और फिर उसके पास बने रहना, यही कुसंगति है।

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