विषयों से मुक्ति के दो उपाय || आचार्य प्रशांत, परमहंस गीता पर (2020)

गुणानुरक्त्तं व्यसनाय जन्तो: क्षेमाय नैर्गुण्य मथो मन: स्यात्। यथा प्रदीपो घृत्वर्तिमश्रन् शिखा: सधूमा भजती ह्यन्यदा स्वम्।। पदं तथा गुणकर्मानुबद्धं वृत्तीर्मन: श्रयतेऽन्यत्र तत्त्वम्।।
विषयासक्त मन जीव को संसार-संकट में डाल देता है विषयहीन होने पर वही उसे शान्ति में मोक्ष पद प्राप्त करा देता है। जिस प्रकार घी से भीगी हुई बत्ती को खाने वाले दीपक से तो धुएँ वाली शिखा निकलती रहती है और जब घी समाप्त हो जाता है तब वह अपने कारण अग्नि तत्वों में लीन हो जाता है।
~ परमहंस गीता, अध्याय दो श्लोक 8
प्रश्नकर्ता: मन तो दुनिया में आसक्त होता ही रहता है और इसी कारण परेशान रहता है। और श्लोक कह रहा है कि विषयहीन होने पर मोक्ष प्राप्ति होती है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आसक्ति हो ही न? मन विषयहीन कैसे बने? मन का घी कैसे खत्म होगा? क्योंकि बिना तपे व धुआँ किये क्या इस अग्नि को शान्त किया जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: विषयहीन सीधे-सीधे नहीं हो पाओगे भाई। कह रहे हैं कि मन विषयों में आसक्त रहता है और इसीलिए परेशान रहता है। और मोक्ष की प्राप्ति तो विषयहीन होने पर होती है तो हमें बता दीजिए कि कैसे विषयहीन हो जायें? विषयहीन नहीं हो पाओगे सीधे-सीधे। विषयहीन होने का तरीका ये है कि मन की विषयों से जो आसक्ति है, उसी का प्रयोग कर लो। सकारात्मक प्रयोग कर लो।
मन को किसी-न-किसी के पास जाकर तो बैठना ही है। यही कहलाती हैं न विषयों से आसक्ति? मन को कुछ चाहिए। किसी न किसी से तो मन को जाकर जुड़ ही जाना है। तुम सही जगह जाकर जुड़ जाओ। सही जगह जाकर के जुड़ोगे तो वो तुमको सब गलत जगहों से टूटने पर, हटने पर, कटने पर विवश कर देगा। और जब तुमको सब व्यर्थ जगहों से हटा देगा वो सही विषय, तो फिर वो स्वयं भी अदृश्य हो जाएगा, मिट जाएगा। ये सही विषय की निशानी होती है। तो विषयहीन होने का ये तरीका होता है।






