मन इतना अशांत क्यों रहता है?
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, आज मेरा प्रश्न फिर से मुझसे ही जुड़ा हुआ है, कि मेरा मन इतना अशांत क्यों रहता है। एकसाथ मेरे दिमाग में बहुत चीज़ें चलती रहती हैं, मेरे दिमाग में कुछ-न-कुछ चलता ही रहता है, मैं ध्यान केंद्रित नहीं कर पाती सिर्फ़ एक चीज़ पर। जैसे मैं सुनती तो रहती हूँ, पर मेरे दिमाग में बहुत सारी चीज़ें चलती रहती हैं। तो मैं क्या करूँ कि किसी एक चीज़ पर ध्यान लगा पाऊँ?
आचार्य प्रशांत: बच्चों को कभी स्कूल से लेने तो गई होंगी? और बच्चों की अभी-अभी छुट्टी हुई है स्कूल से, और बहुत सारे बच्चे एकसाथ बाहर को निकल पड़े हैं, कुछ तो दौड़ ही पड़े हैं। और सब एक ही उम्र के हैं करीब, और एक सी ही सबने यूनिफॉर्म पहन रखी है, और उन्हीं के बीच में आपके सुपुत्र भी हैं। तो फिर आपकी आँखों की क्या दशा रहती है? वो सौ, दो-सौ, चार-सौ चले आ रहे हैं, अभी-अभी घंटी बजी है, अभी-अभी दरवाज़ा खुला है स्कूल का, और वो सौ, दो-सौ, चार-सौ हैं, एकसाथ बाहर को निकल पड़े हैं। आपकी आँखों की क्या दशा रहती है फिर, कैसे देख रही होती हैं बच्चों को?
देखकर बताइए!
चार-सौ आ रहे हैं आपकी ओर, और आप आई हैं उठाने अपने बच्चे को, और चार-सौ आपको दिखाई पड़े जो आपकी ओर बढ़े चले आ रहे हैं। आपकी आँखों की कैसी दशा रहती है?
प्रश्नकर्ता: जो बच्चा आता है उसको देखती हूँ।
आचार्य प्रशांत: तो अब आप क्या देख रही होती हैं, किसी एक चेहरे को देख रही होती हैं?




