श्री भगवान् उवाच सत्त्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धेर्न चात्मन:। सत्त्वेननान्यतमौ हन्यात् सत्त्वेन चैव हि।।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं — प्रिय उद्धव! सत्त्व, रज और तम — यह तीनों बुद्धि (प्रकृति) के गुण हैं, आत्मा के नहीं। सत्त्व के द्वारा रज और तम — इन दो गुणों पर विजय प्राप्त कर लेनी चाहिए। तदनन्तर सत्त्वगुण की शान्तवृत्ति के द्वारा उसकी दया आदि मृत्यु को भी शान्त कर देना चाहिए। ~ हंस गीता, श्लोक १
आचार्य प्रशांत: तो पूछ रहे हैं कि, ‘क्या बुद्धि के एक ही तल के गुणों से उसी तल के दूसरे गुण बेहतर होते हैं? क्या एक ही तल के एक गुण की मदद से हम उसी तल के दूसरे गुण को शान्त कर सकते हैं?’
नहीं, पता नहीं आप ‘तल’ किस चीज को बोल रहे हैं। बुद्धि का जो गुण है वही बुद्धि का तल है। एक गुण, एक तल। तो एक तल पर पाँच गुण कहाँ से आ गए? एक गुण ही बुद्धि का एक तल है। बताने का तरीका है ये एक।
तो एक है, ‘सतोगुणी बुद्धि’ वो बुद्धि का उच्चतम तल है, ‘रजोगुणी बुद्धि’ ये मध्यम तल है और फिर ‘तमोगुणी बुद्धि’ ये निचला तल है। तो एक तल पर एक गुण है न।
आपने प्रश्न पूछा है, ‘क्या एक ही तल के गुणों से उसी तल के दूसरे गुण बेहतर होते हैं?’ नहीं, ये प्रश्न ही बहुत अर्थ नहीं रखता। इस प्रश्न पर ही काम हो जाना चाहिए था पहले। चलिए अब सवाल से आगे का जवाब देता हूँ जो आपने पूछा नहीं है।







