तुम जिसको दूसरा बोल रहे हो, तुमने उसकी खोट अगर सही वक़्त पर निकाल ली होती तो तुम वैसे आज नहीं होते जैसे तुम हो। नहीं समझ में आई बात? तुमने उसकी कभी कोई खोट निकाली नहीं, तभी तो तुमने उसको मौका दिया अपने आप को प्रभावित करने का। तुमने सही वक़्त पर उसकी खोट देख ली होती तो तुम आज इतने डरपोक नहीं होते। और अब तुम इतने डरपोक हो गए हो कि कह रहे हो, "मैं उसकी खोट देखना नहीं चाहता।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा प्रश्न है कि क्या दुनिया की बात करना भी एक तरह का आत्मवलोकन है? जैसे मैं अभी तक इसको देखता रहा कि मैं किसी चीज़ को देख रहा हूँ उसका सही-सही वैल्यू रख पाऊँ कि ये चीज़ इतनी वैल्यू की है भी, या फिर सिर्फ़ इन्फ़्लुएन्सेज़ है, उसको ऐसे देखना ये भी एक तरह का अवलोकन ही है, आत्मवलोकन?
आचार्य प्रशांत: आप अपने आप को जब भी देखते हो, आप जब एक्शन में होते हो, कुछ कर रहे होते हो, तभी देखते हो न? मान लो एकदम कुछ नहीं है भीतर, तो कोई देखने वाला भी नहीं होता है तब और देखने का उस वक़्त कोई तुक भी नहीं होता है, टोटल स्टिलनेस है अगर तो उस वक़्त क्या आत्मवलोकन करोगे।
प्रश्नकर्ता: अगर इसको मैं थोड़ा सा ज़मीनी तरीक़े से समझूँ कि मैं किसी काम में बहुत अच्छे से डूबा हुआ हूँ, तो ये आप इस तरह से रिलेट कर रहे हैं?
आचार्य प्रशांत: अभी यहाँ सत्रों में बैठे थे और अगर सुनने में तल्लीन थे, तो उस वक़्त आत्मवलोकन जैसी कोई चीज़ निरर्थक हो जाती है, क्योंकि आत्मवलोकन होता है अहम् द्वारा अहम् को देखना। जब अहम् ख़ुद ही तल्लीन है, तन्मय है, माने एकदम




