प्रश्नकर्ता: कोई काम करते हैं या कोई बुक पढ़ते हैं, तो मन उस समय नहीं होता, वो भविष्य या भूतकाल में चला जाता है। ज़्यादातर प्रेज़ेन्ट (वर्तमान) में नहीं रहता है। तो क्या करें कि वो अधिकांशतः वर्तमान में ही रहे?
आचार्य प्रशांत: क्या करोगे तुम वर्तमान में रहकर?
प्र: जैसे कोई काम करते हैं।
आचार्य प्रशांत: क्या काम करते हो?
प्र: जैसे बैंक में केश बाँट रहे हैं।
आचार्य प्रशांत: क्यों बाँट रहे हो?
प्र: काम है सर।
आचार्य प्रशांत: तो करो, मुझसे क्यों पूछ रहे हो! ये किसने सीखा दिया कि प्रेज़ेन्ट में रहने का मतलब होता है कि कुछ भी कर रहे हो तो उसमें डूब ही जाओगे। ये सब अमेरिकन अध्यात्म है। वहाँ से एप्पल ले लो, फेसबुक ले लो, अध्यात्म मत ले लेना। गूगल वगैरह तक ठीक है कि अमेरिका से उठा लाये, ये प्रेज़ेन्ट-व्रेज़ेन्ट कहाँ से उठा लाये!



