जैसे शरीर को पोषण देते हैं, वैसे ही मन को पोषण दीजिए। फ़िल्म देखने से मन को पोषण नहीं मिल जाना है, मैच देखने से नहीं मिल जाना है। पार्टी करने से, ख़रीददारी करने से भी नहीं मिल जाना है। जहाँ मिलना है, वहाँ जाइए। वो मैंने करा है, इसीलिए आपसे बड़े अधिकार और बड़े विश्वास के साथ कहता हूँ कि आप भी करिए।
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आचार्य प्रशांत: मन और जीवन के जो विशेषज्ञ हुए हैं, उनके पावों में जाकर बैठा हूँ। खेद की बात ये है कि वैसा कोई जीवित है नहीं या मिला नहीं, तो मुझे बस इतनी ही सुविधा थी कि जो हो गये अतीत में, उनके शब्दों के पास जाकर बैठ जाऊँ, उनकी वाणी सुन लूँ, उनके ग्रन्थ पढ़ लूँ। वो मैंने करा है, इसीलिए आपसे बड़े अधिकार और बड़े विश्वास के साथ कहता हूँ कि आप भी करिए। वो मैंने करा ही नहीं है, वो मैं आज भी करता हूँ।
एक समय था, कॉलेजी ज़िन्दगी में, उसके बाद भी, जब क्रिकेट और टेनिस खूब देखता था, फ़िल्में भी हो जाती थीं। अब वो सब बहुत कम है। तो मुझे अगर कभी कुछ देखना होता है तो क्या देखता हूँ? मुझे भी अगर अपना थोड़ा मनोरंजन करना होता है जो वास्तव में मनो-शुद्धि होती है तो कैसे करता हूँ? मैं उन्हीं के पास जाता हूँ जिनके पास मैं आपको भेजता हूँ।
अभी तीन-चार दिन पहले की बात है, रात में अनमोल (एक संस्थाकर्मी) कमरे में था। मैंने ज़िद करके कहा, मैंने कहा, 'सलोक महल्ला नौवाँ', गुरु तेग बहादुर साहब का लूप में (लगातार) लगाओ, ये रुकना नहीं चाहिए। वो बोला, लूप में लगाने का कोई तरीक़ा नहीं। मैंने कहा, 'नहीं, देखो कैसे लगेगा।'
'फिर कैसे लगा था?' (संस्थाकर्मी की ओर देखते हुए)







