यमराज तो यमराज ठहरे। हमारे स्वार्थों और हमारी भावनाओं से क्या लेना देना? तो वह पहली बात यह स्पष्ट कर देते हैं कि श्रेय और प्रेय आपस में अलग-अलग हैं। या तो यह पकड़ लो या यह पकड़ लो। यह दो नावों पर तुम एक साथ सवारी नहीं कर पाओगे। अपनी चालाकियां अपनी जेब में रखो। दुनिया भी ना छूटे और दिलदार भी मिल जाए, ऐसा नहीं होगा। जो दिलदार दुनिया छोड़े बिना मिल जाए वो दुनिया की ही धूल होता है। वहां फिर दिल जैसा कुछ होता भी नहीं। यह किसी की फिजूल जिद नहीं है कि दो में से एक ही मिल सकता है। यह अस्तित्व का एक साधारण नियम है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: मुझे यह थोड़ा विचित्र सा लगता है कि मैं सैकड़ों श्लोकों पर आपसे एक ही बात कह चुका हूं, ‘इस श्लोक जैसा दूसरा कोई नहीं।’ लेकिन मैं झूठ नहीं बोलता। जब वो श्लोक मेरे समक्ष होता है तो मुझे सचमुच ऐसा ही दिखता है कि सारी बात तो यही कह दी गई। अगर एक यही बात किसी को समझ में आ जाए तो और कुछ कहने की जरूरत नहीं है।
तो आज कठोपनिषद का ऐसा ही एक श्लोक हमारे सामने है। इसको अगर हमें उपयोगी तौर पर समझना है तो जो हमारा पुराना मॉडल है उसका आज पुनः प्रयोग करना पड़ेगा। ठीक।
( तीन उँगलियों के माध्यम से समझाते हुए)
मैं कौन हूं इसमें? यह बड़ी उंगली। ठीक है ना?
यह क्या है? आत्मा। आत्मा माने मेरा वो हो जाना। जिसमें मुझे सचमुच चैन मिल जाए। मेरी स्थिति लगातार अशांति की है।







