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कितने ज़रूरी हो तुम?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, एक द्वैत है जो मुझमें लगातार बना रहता है, सदैव डरा रहता है, मुझे बचाए रखना चाहता है। मेरी जितनी भी संपदा है उसे भी बचाना चाहता है। घबराता है कि मेरी मृत्यु के पश्चात मेरे परिवार का क्या होगा। और दूसरा भी एक हिस्सा है जो उदासीन और असंवेदनशील है मृत्यु के प्रति। वो हिस्सा कोई ज़िम्मेदारी मानता नहीं क्योंकि वो जानता है कि स्थितियों को काबू नहीं किया जा सकता। आचार्य जी, कौन-सा हिस्सा सच्चा है? मैं किसके साथ रहूँ?

आचार्य प्रशांत: हम जिन्हें अपने ऊपर आश्रित मानते हैं, वो हमारे ऊपर बहुत कम आश्रित हैं। ज़रा तथ्यों का निरीक्षण करें। वो हम पर जितने आश्रित हैं, बहुत संभव है कि उससे ज़्यादा तो हम उन पर आश्रित हों।

माँ-बाप को अक्सर झटका लग जाता है। बच्चे को बच्चा समझ रहे थे, सोचते थे, "ये तो छोटा-सा है; हम इसे खिलाएँ नहीं तो खाएगा नहीं, हम इसे घूमाएँ नहीं तो घूमेगा नहीं, हम इसे बताएँ नहीं तो जानेगा नहीं।" पता भी नहीं था कि उनके पीठ पीछे बच्चा बड़ा हो गया था बिना उनकी मदद के, बिना उनके संज्ञान के। एक दिन बाज़ार जाते हैं तो देखते हैं बच्चा दोस्तों के साथ घूम रहा है, और ऐसी-ऐसी दुकानों में घूम रहा है जिनका ज्ञान उसे माँ-बाप ने तो कभी दिया नहीं; वयस्कों के गीत गा रहा है, वयस्कों-सी बातें, वयस्कों से कपड़े। फिर हमें झटका लग जाता है, हमें ठेस लग जाती है।

मैं आपको आश्वस्त करके बताता हूँ, दुनिया में कोई माँ, कोई बाप नहीं हैं जिसे वास्तव में पता हो कि उसका बच्चा कितना बड़ा हो गया है। माँ-बाप के लिए नुन्नू रह जाता है, और बच्चा गुल खिला आता है। अक्सर अविश्वसनीय लगता है जब खबर पहुँचती है घर। कहते हैं, "ये तो छोटा-सा है, इसने कैसे कर दिया? ये तो हम पर आश्रित है। ये तो एक कमरे से दूसरे कमरे नहीं जा पाता, ये उस मुहल्ले कैसे पहुँच गया?"

तुम्हारे अहंकार को पोषण मिलता था ये सोच-सोच के कि कोई तुम पर आश्रित है। कितनी अकड़ है न इस बात में? और लोग आते हैं और इसी बात का खूब हवाला देते हैं। "देखिये साहब, अभी मैं कोई काम नहीं कर सकती, मेरा एक छोटा-सा बेटा और एक छोटा-सा पति है; वो मुझपर आश्रित हैं दोनों। हाँ, दोनों की हरकतें एक जैसी ही हैं बिल्कुल। वो भी मेरे बिना नहीं खाता, ये भी मेरे बिना नहीं खाते; वो भी मेरे बिना नहीं सोता, ये भी मेरे बिना नहीं सोते।" और अभी तुम्हें पता चलेगा कि दोनों खूब सोना जानते हैं, खटिया तोड़ सुअक्कड़ हैं। फिर पाँव तले से ज़मीन खिसक जाती है। पर कितनी अकड़ है ये मानने में कि मैं न होऊँ, तो दुनिया चलेगी कैसे? मैं न होऊँ, तो दुनिया चलेगी कैसे?

हुमायूँ से पूछते, तो वो कहता, "मैं न होऊँ, तो मुगल सल्तनत खत्म हो जाएगी।" तुमसे कहीं आगे का बादशाह निकला अकबर, और तुम्हारी गैरमौजूदगी में निकला; तुम होते तो नहीं निकलता, भला हुआ जो तुम नहीं थे। वास्तव में तुम्हें अकबर की फ़िक्र नहीं है, तुम्हें अपनी हस्ती की फ़िक्र है। ये कहकर कि मेरे बिना मेरी दुनिया, मेरे परिवार का क्या होगा, हम अपने-आपको ज़रूरी बना रहे है न? और अपने-आपको ज़रूरी बनाने में प्रेम बहुत कम है, और हिंसा बहुत ज़्यादा है।

जानते हैं परिवार के प्रति अपने-आपको ज़रूरी बनाने की इन्तेहाँ क्या होती है? मिस्र में होती थी। राजा कहता था, "मैं इतना ज़रूरी हूँ, इतना ज़रूरी हूँ कि अगर मैं मरूँ, तो परलोक में भी मेरी सेवा इत्यादि करने के लिए लोग होने चाहिए।" तो राजा के साथ उसकी सारी चुनिंदा रानियाँ दफ़न की जाती थीं। "मैं ज़रूरी हूँ न? मेरे बिना तो वैसे भी कारोबार चलेंगे नहीं। ये अभागिनें, ये मेरे बिना तो वैसे भी जिऍंगी नहीं, तो भला है मेरे साथ ही आ जाओ।" अगर आप ज़रूरी हैं, और दुनिया आप पर आश्रित है, तो उसका तो तार्किक परिणाम यही है फिर कि आप जाएँ तो सबको साथ ही लेकर जाएँ।

आप खबरें नहीं सुनते हैं? माँ मरी, और मरने के पहले तीन बच्चों को ज़हर खिलाकर मरी—उसकी दृष्टि में शायद ये प्रेम है। और वो यही सोच रही है कि "मैं नहीं होऊँगी तो दर-दर की ठोकर खाएँगे, तो मैं इन्हें ले ही चलती हूँ।" तुम हो कौन? और तुम्हें कैसे पता कि तुम्हारे जाने के बाद ये और नहीं फलते-फूलते? लाखों उदाहरण हैं इस तरह के भी, उस तरह से भी। तुम्हें कैसे पता कि तुम्हारा उदाहरण किस तरह का होता? पर ये सब हम प्रेम के नाम पर खूब कर जाते हैं। हिटलर मर रहा था तो अपने साथ अपनी प्रियतमा को लेकर गया।

कृपया इस स्वयंभू सिंहासन से नीचे उतरें। हम उतने ज़रूरी नहीं हैं जितना हमने अपने-आपको बना रखा है। आपसे पहले भी दुनिया थी, आपके बाद भी दुनिया रहेगी, किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ने का।

कबीर साहब ने कितना मार्मिक गाया है! क्या बोल रहे हैं कबीर साहब, कितने दिन तक स्त्री रोती है? तेरह दिन तक स्त्री रोती है।

तेरह दिन तक तिरिया रोवे फिर करे घर बासा।

~ कबीर साहब

उसके बाद बसा लेती है घर। तेरह दिन रोएगी स्त्री बस, और कितने दिन बहन होती है? महीना, दो महीना, छह महीना माँ और बहन रो लेंगी बस। इतना ज़रूरी कोई नहीं कि वो मरे, तो अगले दिन सूरज न उगे। लोग आते हैं, लोग जाते हैं। बड़े-बड़े सिकंदर आ कर बह गए, कुछ नहीं हो गया।

संतो ने इसीलिए बार-बार ध्यान दिलाया है कि बेटा ही आकर तुम्हारी कपाल-क्रिया करेगा। और इतना ही दुःख होता अगर घरवालों को तुम्हारे मरने का तो स्वेच्छा से तुम्हारे साथ मर नहीं लेते? कोई मरता है किसी के लिए? पर हम अपने महत्त्व के दर्प में जीते हैं—"हम बड़े ज़रूरी हैं।" और इतना ही नहीं, हम उस दर्प को नाम देते हैं करुणा का, प्रेम का। हम कहते हैं, "हम इतने प्रेम से लबालब हैं कि हमसे मरा नहीं जा रहा।"

घर के बुड्ढों को अक्सर आपने यही कहकर खटिया पकड़े देखा होगा। वो प्राण हीं नहीं छोड़ते कि "हम मर गए, तो इसका क्या होगा?" और वो जिसकी ओर इशारा करके 'इसका' कह रहे होते हैं, वो अक्सर कोई जवान कन्या होती है। और उनका अर्थ होता है, "हम जब तक जी रहे हैं तब तक देख लें कि इसको गाय बनाकर किसी सांड से बांध दें। हम मर गए, तो इसका क्या होगा? इसकी डोली उठ जाए, फिर हम भी उठेंगे।"

और वो मन-ही-मन गरिया रही होती है कि "अरे बुड्ढे, तू उठता, तो बगल के चुन्नीलाल के साथ मैं भी उठती; तुझे पता क्या है कि मैंने कब से टाँका भिड़ा रखा है?" पर बुढ़ऊ की नज़र में वो छोटी-सी चुनिया है अभी कि "अरे-अरे-अरे! ये तो दुनिया नहीं जानती, इसे क्या पता? मैं न इसका ब्याह करूँ, तो ये कुँवारी रह जाएगी।"

कुँवारी वो अभी भी नहीं है, बुढ़ऊ। तुम खटिया में पड़े रहते हो, तुम्हें पता क्या है? कौमार्य तो उसने कबका त्याग दिया। तुम इसी झंझट में हो कि मैं न रहूँ तो कुँवारी रह जाएगी। तुम खटिया त्यागो। तुम मुक्त हो जाओ। आ रही है बात समझ में?

फूल उगना जानते हैं, पशुओं के बच्चे पैदा होते हैं, वो अपना अन्न-भोजन-उड़ान जानते हैं। एक बहुत न्यून सुरक्षा चाहिए होती है जीव को दूसरे से, उससे अधिक नहीं। दुनिया खूब चल लेगी, झेल लेगी, खेल लेगी, फलेगी-फूलेगी; आप अपनी सुध करें। अपनी सुध आप अभी भी कर रहे हैं पर बड़े विकृत तरीके से। अभी आप अपने अहंकार की सुध कर रहे हैं, अभी आप अपने-आपको परमात्मा बनाए बैठे हैं—"मैं न रहूँ, तो कौन चलाएगा?"

मरो हे जोगी मरो, मरो मरण है मीठा।

~ कबीर साहब

खटिया छोड़ो, बुढ़ऊ!

आप जिसकी चिंता में आकुल हैं, आप उसके लिए चिंता का विषय हैं। आप उसको लेकर चिंतित हैं, और उसकी चिंता ही यही है कि कैसे इनकी चिंता से पीछा छूटे?

प्र: जैसे घर में अगर कोई समस्या आती है, तो एक तो उस समस्या का बोझ और किसी को बता दो, तो उसको भी समस्या हो जाती है। फिर एक तो आपकी समस्या, और उस समस्या से किसी को जो समस्या हो गयी, वो दूसरी समस्या। तो बहुत लोग ऐसा करते हैं कि किसी को बताना ही नहीं।

आचार्य: बिल्कुल, और ये बड़ा अच्छा है। आपको चोट लग गयी है या नुकसान हो गया है, ये बात अगर आप अर्ध-वयस्क लोगों को, अविकसित लोगों को, मानसिक रूप से अपरिपक्व लोगों को बता दें, तो पहले तो आपकी परेशानी ये थी कि आपको चोट लगी या नुकसान हुआ, और अभी आपकी एक परेशानी और जुड़ जाएगी कि जिसको बता दिया अब उसे भी संभालो क्योंकि वो अपने-आपको इतना ज़िम्मेदार मानता है कि आपकी चोट का दारोमदार अब उसके सिर पर है। झेल आप रहे हैं, और पगला वो रहा है, "हाय, हाय! हाय, हाय!" तो ऐसों के लिए अक्सर यही उचित होता है कि उन्हें तथ्य से अवगत ही न कराया जाए। ये उनकी सज़ा है क्योंकि तुमको बता दिया, तो तुम रोना-कलपना शुरु कर दोगे। अब हम अपनी चोट संभाले, अपना युद्ध संभाले, अपना नुकसान संभाले, या तुम चक्कर खा-खाकर गिर रहे हो तो तुम्हें संभाले?

रघुराम की बहू प्रसूति कक्ष में है, और रघुराम चक्कर खा-खाकर गिरे जा रहे हैं, गिरे जा रहे हैं। उसे क्या हो रहा है, प्रसव पीड़ा तो इन्हें हो रही है। बड़ी बात नहीं थोड़ी देर में ये भी जन दें। तो ऐसों को अस्पताल वाले बिल्कुल बाहर रखते हैं, दूर। एक-दो बार उन्हें मीठे तरीके से समझाया जाता है, "बाबा, बाहर जाओ," और न माने, तो दो आते हैं वार्डबॉय और पकड़कर "चलो, तुम बाहर चलो, तुम्हारी अस्पताल में कोई जगह नहीं।" देखी है न इस तरह की नौटंकी? अब डॉक्टर इलाज करे कि नौटंकी पर ताली बजाए, दस रुपया डालकर आए, "वाह!"?

कुछ लोग ये सुनकर बड़े आहत हो रहे होंगे। कह रहे होंगे, "इन्हें भावनाओं की कद्र नहीं है। ये समझ ही नहीं रहे हैं कि वो हमारी बहू के प्रति संवेदनशीलता है।" हम परमहंस हुए, जैसे किसी को कोड़ा लगा था, दर्द उन्हें होता था, वैसे ही वेदना उसे उठ रही है, और प्रजनन हमें हो रहा है। जुड़वा पैदा हुए। ये हमारे हंसत्व का प्रमाण है।"

ये सब कुछ नहीं है, ये वही भावनाऍं हैं कि हम बड़े ज़रूरी हैं। तुम नहीं ज़रूरी हो, बाबा। जगह खाली करो, लोगों को उनका काम करने दो, तुम बाहर जाकर घर बैठो। जानता नहीं मैं, पर कुछ मौतें तो ज़रूर ऐसे ही होती होंगी कि हम इतने ज़रूरी हैं कि हमें ऑपरेशन थिएटर में भी घुसना है। कुछ मौतें, तो ज़रूर ऐसे होती होंगी।

प्र: आचार्य जी, बिल्कुल ऐसा हुआ है। एक एक्सीडेंट (दुर्घटना) हो गया था, तो उसमें सिटी स्कैन चल रहा था तो घर की औरतें होती हैं ना, वो ज़बरदस्ती करके अस्पताल आ गयी, सिटी स्कैन में भी चली गयी और वहीं बेहोश होकर गिर गयी। अब डॉक्टर मरीज़ को छोड़कर इनको देख रहा है।

आचार्य: अब वो गाड़ी चला रहे हैं, और श्रीमती जी का फ़ोन आ रहा है और ये उठा नहीं रहे हैं, उठा नहीं रहे हैं तो फ़ोन आए जा रहा है, आए जा रहा है। फ़ोन उठाकर पूछे, "क्या है? क्यों फ़ोन करे जा रहे हो?" कहे, "हम बहुत डर रहे थे तुम्हें कुछ हो न जाए।" और जहाँ ये फ़ोन पर बात कर रहे हैं, तहाँ पीछे से ट्रक भो! हो गया। "हम बहुत डर रहे थे तुम्हें कुछ हो न जाए इसलिए फ़ोन करे जा रहे थे।" तुम्हारे फ़ोन करने से हो गया, वैसे नहीं होता।

तुम बहुत ज़रूरी हो क्या? तुम्हें पता नहीं लगेगा कि वो कहाँ है, तो उनका कुछ नुकसान हो जाएगा। तो तुम फ़ोन पर फ़ोन मिला रहे हो। ये अहंकार है। ये परमात्मा के लिए विरुद्ध विद्रोह है तुम्हारा कि "परमात्मा थोड़े ही ख्याल रखेगा, ख्याल रखने वाले हम हैं।"

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