सब आचार्य जी जैसे हो गए तो दुनिया कैसे चलेगी? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं आपकी काफ़ी सारी यूट्यूब लेक्चर्स देखे या सेशन (सत्र) देखे। तो जो आप चेतना की जो बात करते हो, अगर जो आपकी इच्छा या आपकी कोशिश है, मुझे पता नहीं कोशिश है कि नहीं। अगर एक कामना करते हैं या एक हाइपॉथेटिकल सिचुएशन (काल्पनिक स्थिति) देखते हैं, मान लो सारे लोगों की चेतना सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गयी; अगर ऐसे दुनिया की कल्पना करें, तो आपको लगता है कोई प्रॉब्लम्स (समस्या) रहेगी, कि इश्यूज (विवाद) रहेगी, कि किस टाइप (प्रकार) की दुनिया रहेगी वो?
आचार्य प्रशांत: सबसे निकट की समस्या तो मुझे यह दिख रही है कि हम उस दुनिया की कल्पना करके, उस दुनिया की समस्याएँ जानना चाहते हैं (श्रोता हँसते हैं), जो ऊँची चेतना की होगी। पहली बात तो कल्पना करनी है ऊँची चेतना की दुनिया की। कहाँ से वो कल्पना करनी है? जहाँ हम बैठे हुए हैं, अपनी वर्तमान निचली चेतना पर।
वहाँ बैठकर के आप किसी ऊँची चीज़ की क्या कल्पना करोगे? जिस तल का व्यक्ति होता है न, उसकी ऊँची-से-ऊँची कल्पना भी उसी तल की होती है। एक कुत्ता है मान लीजिए, उसके लिए ऊँची-से-ऊँची बात क्या हो सकती है? क्या हो सकती है?
श्रोतागण: हड्डी।
आचार्य: बारिश होगी तो हड्डियाँ बरसेंगी। हम कल्पना की प्रकृति को समझ नहीं रहे हैं। ‘मैं’ केंद्र में होता है, उसके चारों ओर चेतना का माहौल निर्मित होता है। वह माहौल जहाँ ‘मैं’ है, माने जहाँ आपने अपने अस्तित्व का खूँटा गाड़ रखा है, उससे बहुत दूर नहीं जा सकता।






