आचार्य प्रशांत: जो ग़ुलामी की रोटी खा रहा हो, उसे परममुक्ति की बातें शोभा ही नहीं देतीं। परमात्मा भी मुस्कराकर पूछेगा कि रोटी तक तो तू ग़ुलामी की खाता है और बातें करता है मुक्ति की।
समझ रहीं हैं?
और मैं नहीं कह रहा हूँ कि पूँजीवादी हो जाओ, धन्नासेठ हो जाओ, लाखों–करोड़ों कमाओ। पर इतना तो कमाओ कि रोटी मात्र के लिए तुम्हें सिर न झुकाना पड़े, इतना तो कमाओ कम-से-कम। लालचवश मत कमाओ, धर्मवश कमाओ। दोनों में अन्तर है। तुम रोटी नहीं कमा रहे तो कहीं से तो लाओगे रोटी।
प्र: माँग कर लाओगे फिर।
आचार्य: कोई मुफ़्त में देगा, कितने दिन मुफ़्त में देगा?
प्र: भारतीय परम्परा भी कुछ मदद कर देती है, कई बार।
आचार्य: भारतीय परम्परा ये भी कहती है कि जो बोलो सोच–समझकर बोलो (हँसते हुए)। ऐसे नहीं होता कि तुम्हें जीवनभर हट्टा–कट्टा, जवान आदमी देखकर भी, कोई रोटी ही दिये जाए।
ये बड़ा रूमानी सपना रहता है कि हम सन्यासी हो जाएँगे और जैसे बुद्ध के चेले थे, बोलेंगे, ‘भिक्षाम् देहि।‘ और द्वार से सुन्दरी प्रकट होगी, पात्र लेकर के दाल–चावल और हमारी अंजुली में डाल देगी। और हम बिलकुल नैन नीचे करे, मुक्त पुरुष की तरह खड़े रहेंगे।




