शरीर का तो भविष्य है, तुम्हारा कोई भविष्य नहीं है। शरीर के भविष्य के लिए, शरीर को जो करना है, करने दो। तुम क्यों परेशान हो? दुनिया का हर प्राणी थोड़ा बहुत बचा के रखता है — ठीक है? ये शरीर का काम है। वो शरीर के लिए बचा रहा है, तो बचाए। तुम अपने लिए कुछ मत बचाना, तुम सारी बचावट से मुक्त रहो।
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प्रश्नकर्ता: आज का सत्र सुनने के बाद मन में प्रश्न ये बन रहा है, कि शायद हमें आगे के लिए कुछ भी संचय नहीं करना चाहिए, जैसे धन वग़ैरह। पर संसार में तो उसके बिना काम चलता नहीं। तो ऐसे में क्या करें?
आचार्य प्रशांत: ये नियम भी तो आप आगे के लिए बना रहे हो ना — कि ‘आगे कुछ संचय नहीं करना चाहिए।’ लो, कर लिया आपने संचय! ये नियम संचय कर लिया। आगे जब आप हो ही नहीं, तो ये नियम किसके लिए बना रहे हो कि ‘आगे के लिए कुछ संचय नहीं करना चाहिए?’ वर्तमान में कोई नियम नहीं होते। वर्तमान इतना छोटा होता है कि उसमें नियम घुसेगा ही नहीं। जब तक आप वर्तमान में नियम बनाओगे, वर्तमान अतीत बन जाएगा। आप जब कह रहे हो कि 'हम ये नियम बनाना चाहते हैं कि आगे के लिए संचय नहीं करेंगे,' तो नियम भी आपने क्या वर्तमान के लिए बनाया है? ये नियम आपने किसके लिए बनाया है? — भविष्य के लिए। तो नियम किसके लिए बना रहे हो?
जब तुम्हें आगे होना ही नहीं है, तो नियम किसके लिए बना रहे हो? कोई नियम नहीं चाहिए। और वर्तमान के लिए नियम बनाना हो, तो बना लो। लेकिन वर्तमान में जब तक नियम बनाओगे, तब तक वर्तमान बचेगा ही नहीं। जीवन को नियम नहीं चाहिए, जीवन को बोध चाहिए। सही काम करो और कुछ संचय अगर करो भी, तो तुम्हें पता होना चाहिए कि किसके लिए संचय हो रहा है। जो संचय करता है, उसके संचय में बाधा भी मत बनना।




