भविष्य का डर रहता है, पैसा बचाना कितना ज़रूरी है?

Acharya Prashant

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भविष्य का डर रहता है, पैसा बचाना कितना ज़रूरी है?
शरीर का तो भविष्य है, तुम्हारा कोई भविष्य नहीं है। शरीर के भविष्य के लिए, शरीर को जो करना है, करने दो। तुम क्यों परेशान हो? दुनिया का हर प्राणी थोड़ा बहुत बचा के रखता है — ठीक है? ये शरीर का काम है। वो शरीर के लिए बचा रहा है, तो बचाए। तुम अपने लिए कुछ मत बचाना, तुम सारी बचावट से मुक्त रहो। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: आज का सत्र सुनने के बाद मन में प्रश्न ये बन रहा है, कि शायद हमें आगे के लिए कुछ भी संचय नहीं करना चाहिए, जैसे धन वग़ैरह। पर संसार में तो उसके बिना काम चलता नहीं। तो ऐसे में क्या करें?

आचार्य प्रशांत: ये नियम भी तो आप आगे के लिए बना रहे हो ना — कि ‘आगे कुछ संचय नहीं करना चाहिए।’ लो, कर लिया आपने संचय! ये नियम संचय कर लिया। आगे जब आप हो ही नहीं, तो ये नियम किसके लिए बना रहे हो कि ‘आगे के लिए कुछ संचय नहीं करना चाहिए?’ वर्तमान में कोई नियम नहीं होते। वर्तमान इतना छोटा होता है कि उसमें नियम घुसेगा ही नहीं। जब तक आप वर्तमान में नियम बनाओगे, वर्तमान अतीत बन जाएगा। आप जब कह रहे हो कि 'हम ये नियम बनाना चाहते हैं कि आगे के लिए संचय नहीं करेंगे,' तो नियम भी आपने क्या वर्तमान के लिए बनाया है? ये नियम आपने किसके लिए बनाया है? — भविष्य के लिए। तो नियम किसके लिए बना रहे हो?

जब तुम्हें आगे होना ही नहीं है, तो नियम किसके लिए बना रहे हो? कोई नियम नहीं चाहिए। और वर्तमान के लिए नियम बनाना हो, तो बना लो। लेकिन वर्तमान में जब तक नियम बनाओगे, तब तक वर्तमान बचेगा ही नहीं। जीवन को नियम नहीं चाहिए, जीवन को बोध चाहिए। सही काम करो और कुछ संचय अगर करो भी, तो तुम्हें पता होना चाहिए कि किसके लिए संचय हो रहा है। जो संचय करता है, उसके संचय में बाधा भी मत बनना।

आप आज खाना नहीं खाओ, तुरंत नहीं मर जाओगे। हफ़्ते भर चलोगे कम से कम। कम से कम हफ़्ते भर चलोगे, क्योंकि कोई है जिसने संचय कर रखा है। उसका संचय क्यों रोक रहे हो? आप आज खाना नहीं खाओ, तो कम से कम चलोगे हफ़्ता भर? कुछ लोग महीना भर भी चल सकते हैं। क्योंकि कोई है, जिसने संचय कर रखा है। किसने कर रखा है? — शरीर ने।" तुम कौन होते हो उसका संचय रोकने वाले? न मे देह: — देह तुम्हारी तो है नहीं, तुम काहे को घुस के कह रहे हो “संचय मत करो?”

गिलहरी भी संचय करती है, चिड़िया भी संचय करती है, ऊँट भी संचय करता है, सब संचय करते हैं। पर उनको पता है — वे अपने लिए संचय नहीं कर रहे। वो कह रहे हैं, "ये तो शरीर का काम है, शरीर को करने दो। हमें उसमें कोई हस्तक्षेप करना नहीं है।"

आपका संचय गड़बड़ तब हो जाता है जब अहंकार करता है। शरीर का तो भविष्य है। किसने कहा, शरीर का भविष्य नहीं है? शरीर का तो भविष्य है, तुम्हारा कोई भविष्य नहीं है। शरीर के भविष्य के लिए, शरीर को जो करना है, करने दो। तुम क्यों परेशान हो? दुनिया का हर प्राणी थोड़ा बहुत बचा के रखता है — ठीक है? ये शरीर का काम है। वो शरीर के लिए बचा रहा है, तो बचाए। तुम अपने लिए कुछ मत बचाना, तुम सारी बचावट से मुक्त रहो। मैं अपने लिए कुछ नहीं बचाता, शरीर थोड़ा बहुत अपने लिए बचाता है — बचाए रहे।

अच्छा, एक बात बताओ — अभी तुम खाना खा रहे हो क्या, उदित?

श्रोता: नहीं आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: तो अभी खाना नहीं खा रहे, तो बोला कैसे? अभी जैसे ही तुमने बोला, तो उसमें तो ऊर्जा लगी। वो कैसे बोल दिया तुमने फिर? खाना तो अभी-अभी खाया नहीं।

श्रोता: शरीर में पहले से ही संचित है।

आचार्य प्रशांत: वो संचित ना हो, तो ये बातचीत भी नहीं हो पाएगी। आचार्य जी यहीं डिस्चार्ज होकर गिर जाएँगे। शरीर का काम है। शरीर ने मेरे लिए कुछ संचित कर रखा है, मैंने कुछ नहीं कर रखा। मैं यहाँ वर्तमान में उपस्थित हूँ, खाना जिसके पास है होगा। बताओ आगे।

प्रश्नकर्ता: जी, इसी से कुछ जुड़ा हुआ प्रश्न है। यदि एक साल बाद एक बिल्कुल ही नया 'मैं' स्थापित हो जाएगा, तो फिर मैं अभी कुछ ऐसा क्यों ना करूँ जो उसके लिए भविष्य में काम का हो, वैल्यूड हो या बेनिफिशियल हो? अपने भविष्य को लेकर सोचने में फिर दिक्कत कहाँ है?

आचार्य प्रशांत: वो आपका नहीं है न! आप तो अभी हो। आपका भविष्य थोड़ी है वो किसी और का है। और अगर परायों के लिए कुछ करना है, तो सब पराए हैं — सबके लिए कर दो। एक के लिए क्यों कर रहे हो? क्योंकि उसकी शक्ल आपसे मिलती-जुलती है थोड़ी-थोड़ी? "अपना भविष्य" — जैसा कुछ नहीं होता, ये ऑक्सीमोरॉन है। मेरा भविष्य — ऐसा कुछ नहीं होता। जो आप हो, उसका कोई भविष्य नहीं होता, वो कालातीत है। और जिसका भविष्य है, वो प्रकृति है वो आप नहीं हो।

तटिनी का भविष्य है। तटस्थ का क्या भविष्य, बताओ? जो तटस्थ है, वो तो जहाँ है, वहीं रहेगा ना! आगे कौन बह जाएगी? नदी बह जाएगी और नदी का भविष्य है। आज यहाँ है नदी, कल वहाँ है नदी। जो तटस्थ बैठा हुआ — उसका क्या भविष्य? वो तो जहाँ है, वहीं रहेगा। तो भविष्य निश्चित रूप से है, पर जिसका भविष्य है — वो आप नहीं हो। और आप जो हो, उसका कोई भविष्य नहीं है। तो अपने भविष्य की मत चिंता करो, क्योंकि तुम्हारा कोई भविष्य नहीं है। सॉरी टू डिसअपॉइंट यू, सन बट यू हैव नो फ्यूचर, एंड नो पास्ट आइदर। टू सम पीपल — दैट स्ट्रैंग्युलेट्स: "मर गया! कुछ नहीं भविष्य!" सम पीपल — दैट लिबरेट्स। डिपेंड्स।

भविष्य बनाना नहीं होता। वर्तमान में जो गलत है, उसे छोड़ना होता है। आप रचने के लिए नहीं पैदा हुए हो।

हमें कविताएँ सुना-सुना के बता दिया गया है ना, कि सुंदर भविष्य गढ़ो, नूतन संसार रचो। कवियों ने सब ऐसे ही रची हैं, पर ये कवियों की बातें हैं। ऋषियों की बातें बिल्कुल अलग हैं। ऋषि कहते हैं — तुम पैदा हुए हो अपने आप को तोड़ने को, कुछ गढ़ने को नहीं पैदा हुए हो। कवि इस भाषा में बात करेंगे कि — "तुम्हें अपनी एक सुंदर प्रतिमा उकेरनी है, तुम्हें अपना एक बड़ा प्यारा, गौरवशाली चित्र खींचना है।" ऋषि कहेंगे — “कुछ नहीं करना है।” ऋषि कहेंगे — “तुम बंधनों में पैदा हुए हो, तुम्हें बस बंधन काटने हैं।” तुम्हारा जो पूरा एजेंडा है, वह डिस्ट्रक्टिव होना चाहिए। मैं पैदा हुआ हूँ — कुछ हटाने को, लगातार हटाते रहना है।

भविष्य की बेहतरी का ख़्याल छोड़ दो, वर्तमान मरा जा रहा है — उसको बचाओ।

ये ऐसी-सी बात है कि एक आदमी है — वो कैंसर की लास्ट स्टेज में है, और उसे कहा जा रहा है — पैसे दे दे, तुझे दवाइयाँ ले आ दें। वो कह रहा — "नहीं, पैसे नहीं दूँगा।" बोले क्यों? — बोला "भविष्य का भी तो ख़याल रखना पड़ता है ना! सब आज ही खर्च कर दें क्या?" सन, यू हैव नो फ्यूचर, यू ओनली हैव दिस मोमेंट। जो कुछ है, इसी में लगा दो।

तुम सब कैंसर के रोगी हो। किसी के पास कोई फ्यूचर नहीं। कैंसर वाले को तो फिर भी होता है — कम से कम दो-चार महीने होते हैं। हमारे पास तो दो-चार महीने भी नहीं हैं, एक पल है। कैंसर वाले को मूर्ख बोलोगे कि नहीं? उससे पैसे माँग रहे हो कि — "ले आ दो दादा, तुम्हारी दवाई दें।" तो बोल रहा है — "नहीं! तुम सब फिज़ूलखर्च लोग हो, अरे 10–20 साल आगे की भी तो सोचनी है!" समझ में आ रही हैं बातें?

काल खड़ा है तुम्हारे सामने, तुम्हारी कनपटी पर पिस्तौल रख के। वही, अपने वहाँ हाईवे रॉबरी चल रही हो — भैंसे पे पीछा करते हैं और गाड़ी रोक के लूटते हैं। अब वो आए और तुम्हारी कनपटी पर रख दिया ऐसे — और बोल रहे हैं "जो कुछ भी फिज़ूल है, दे दो।" क्योंकि —

मौत वही सब ले जाती है — जो फिज़ूल है। जो असली है, मौत उसको छू भी नहीं सकती।

तो यमाचार्य आए — ऐसे लगा दिया (कनपटी पर पिस्तौल), बोले — "जो कुछ फिज़ूल है, दे दो।" और तुम बोल रहे हो — "नहीं देंगे!" यमराज बोले — "मैं मार दूँगा! मेरा काम यही है! पेशेवर हूँ!" बोले — "नहीं देंगे!" यमराज को भी कुछ रोचक लगा। बोले — "क्यों नहीं दोगे, ये तो बताओ?" बोले — "अरे, भविष्य के लिए भी तो कुछ बचाना है ना! तो मार भले दो, पर भविष्य के लिए हम बचा के रखेंगे!" यमराज बोले — "अगर मैं तुझे मार दूँ, तो तेरा भविष्य कहाँ है?" बोले — "वो सब हम नहीं जानते पर हम तुझे नहीं देंगे। फ्यूचर की सिक्योरिटी भी तो सोचनी पड़ती है ना। हम ऐसे लोग हैं।"

यही पल है जो तुमसे कह रहा है कि अपनी सारी गंदगी त्याग दो। तुम कह रहे हो — "नहीं त्यागेंगे, गंदगी मेरी जान है। जान चली गई तो भविष्य कहाँ बचेगा? तू जान भले ले ले मेरी, भविष्य नहीं छोड़ूँगा!"

प्रश्नकर्ता: वो कौन है जो स्वयं को बोधस्वरूप जानता है?

आचार्य प्रशांत: वो, वो है — जो अब अपने आप को शरीरस्वरूप नहीं जानता है। आप किसी सकारात्मक सत्ता की उम्मीद कर रहे हो, आप किसी विधायक उत्तर की उम्मीद कर रहे हो। उत्तर नकार में ही आएगा। वो अभी है ना — जो अपने आप को देह जानता है? वो है न? वो तो है कम से कम।

आपने पूछा — "वो कौन है जो अपने आप को बोधस्वरूप जानेगा?" मैं कह रहा हूँ — उसकी तुम चर्चा बंद करो। वो तो अभी है जो अपने आप को देह जानता है। उसका क्या नाम है? क्या नाम बताया? विपिन जी — वो तो है ना जो अपने आप को कहता है — "मैं ये रहा, मैं विपिन हूँ!"

तो उसका मिटना ही 'वो' है। जो विपिन अपने आप को देह मानता है — जब उसकी आँखें खुल जाएँ और बोले — “ये सब तो ऐसे ही था, बुलबुले से आशिकी कर रहे थे! सोचो बुलबुला उड़ रहा है, और तुम दिल, जान, जिगर तुझ पर निसार किया है!" बुलबुलों से आशिकी चल रही है।

तो वो विपिन जब हट जाए — तो उसी को ही सत्य, बोध, या आत्मा कहते हैं। वो एक 'नकार' का नाम है। उसका कोई विधायक, सकारात्मक अस्तित्व नहीं है। तो पूछोगे बार-बार — "वो कौन है जिसको ब्रह्म बोलते हैं?" तो कोई उत्तर नहीं आएगा। दूसरा क्या है यक्ष प्रश्न?

प्रश्नकर्ता: जी, दूसरा-तीसरा लगभग जुड़े हुए ही हैं — कि वो कौन है जिसे कैवल्य मुक्ति प्राप्त होती है?

आचार्य प्रशांत: यही है — पहला ही है। "वो कौन है जिसे मुक्ति प्राप्त होती है?" अरे भाई, जो बंधन में होगा — वही तो मुक्त होगा ना! और कौन मुक्त होगा? जो मुक्त है — वो तो मुक्त होगा नहीं। जो बंधन में है — वो 'विपिन' है उसका नाम। "वो कौन है जिसे मुक्ति प्राप्त होती है?" उसका नाम है — विपिन। उक्ताते उपनिषद, बिल्कुल इसको आप लिख लीजिए, ये उपनिषदों की श्रंखला का उत्तर है। अब तीसरा बचा या प्रश्नकर्ता का लोप हो गया?

प्रश्नकर्ता: तीसरा यही था — कि वो कौन है जो बंधन में है, जिसे मुक्ति चाहिए?

आचार्य प्रशांत: उसका नाम विपिन है। खोजो — वो कहाँ है? खोजो। मिले तो हमें ही बताना।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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