अध्यात्म पैसे का विरोधी नहीं है। अध्यात्म कहता है कि पैसा न अच्छा है, न बुरा; मुक्ति अच्छी है। मुक्ति के लिए जितना पैसा चाहिए, उतना अर्जित करो, पर अतिरिक्त धन बंधन बनता है। पैसा बोझ नहीं बनना चाहिए। दुर्भाग्य की बात ये है कि निर्धन धन की कमी का बोझ उठाता है—कि पैसा नहीं है, कम है। धनवान अधिक धन का बोझ उठाता है—कि इसे सुरक्षित रखना है। पैसे की कमी या अधिकता अगर बेचैनी लाए, तो दोनों ही गड़बड़ हैं।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सफल जीवन क्या है? एक इंसान का दुनिया में आने का उद्देश्य क्या है? जीवन की सफलता निर्धारित करने में पैसे का कितना महत्व है?
आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सफल जीवन क्या है? यह जानना है तो देखिये कि जीवन असफल कब हो जाता है। असफल जीवन वो है जो दुःख में बीत रहा है। दुःख आता है तमाम तरह की सीमाओं से और बंधनों से। तो आध्यात्मिक दृष्टि से सफल जीवन वो है जो अपने बंधन काट सके, जो दुःख के कारणों को मिटा सके।
और इसी बात से दूसरे प्रश्न का उत्तर भी मिल जाएगा। दूसरा प्रश्न कह रहा है, "जीवन में आने का उद्देश्य क्या है?" बच्चा पैदा ही होता है बंधनों के साथ, बच्चा पैदा ही होता है अनगिनत शारीरिक वृत्तियों के साथ। और जैसे-जैसे वो बड़ा होता जाता है, उस पर बंधन और कड़े होते जाते हैं। तो जीवन का उद्देश्य और जीवन की सफलता निहित है बंधनों को काटने में—भीतर के भी बंधनों को काटने में और बाहर के भी बंधनों को काटने में।
और यही बात हमें फिर ले जाती है तीसरे प्रश्न पर। तीसरा प्रश्न कह रहा है, "पैसे का कितना महत्व और आवश्यकता है?" जिस हद तक पैसा आपके बंधनों को काटने में सहायक हो, उपयोगी हो, पैसा अति आवश्यक है। और जब पैसा खुद एक बंधन बन जाए, तब पैसा अनावश्यक ही नहीं है घातक है।




