ये रुपए पैसे का खेल ये आदमी द्वारा आदमी का शोषण। ये एक आदमी द्वारा ये मानकर दुख झेलना — कि मैं तो अमीर हूँ और दूसरे आदमी द्वारा ये मानकर दुख झेलना — कि मैं तो गरीब हूँ। तुम्हें ये सारा खेल समझ में आएगा कि ये कैसे चल रहा है। खेल के शिकार मत बनो, खेल के खिलाड़ी मत बनो। थोड़ा सा बाहर निकलो और इस खेल के दृष्टा बनो। ये खेल ऐसा है कि जो इसे खेलने लग जाते हैं उन्हें ये खेल कभी समझ में नहीं आता। ये खेल उन्हें खा जाता है, इस खेल को वही समझ सकता है जो इस खेल से थोड़ा बाहर आ गया है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम मधुरेंद्र है। मैं बिहार के एक अति ग्रामीण, गरीब, अशिक्षित और किसान समाज से दिल्ली विश्वविद्यालय तक आया हूँ। यहाँ कैंपस में मेरे सारे दोस्त काफी अमीर, सभ्य, शिक्षित और शहरी समाज से है। जिनका जीवन शैली और स्टेटस देखकर मैं डीमोटिवेटेड सा हो गया हूँ। और मुझे स्वयं से, अपने परिवार से और अपने समाज से नफ़रत जैसी हो गई है इस वजह से पढ़ाई में मन नहीं लगता है। कृपया मार्गदर्शन कीजिए।
आचार्य प्रशांत: नफ़रत हो गई है। खुद से नफ़रत हो गई है। इतने आशिक़ हो दौलत के? क्या-क्या बोल दिया अपने आप को। क्या-क्या बोला — अनपढ़, गरीब, गंवार, अशिक्षित, असभ्य यहाँ से मैं आता हूँ। बिहार के किसी क्षेत्र से, अभी कहाँ दिल्ली आए हो?
प्रश्नकर्ता: जी दिल्ली विश्वविद्यालय में।
आचार्य प्रशांत: दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली में क्या-क्या है? अमीर, सभ्य, सुसंस्कृत और क्या-क्या? शहरी, ये सब शिक्षित ये सब हो गए और इस वजह से खुद से नफ़रत हो गई है।




