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पैसा, इज़्ज़त, या ताकत - बड़ा क्या? || आचार्य प्रशांत (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: ऐसा देखा गया है कि जो व्यक्ति धनी है, सफ़ल है, बलशाली है सिर्फ़ वही बिना डरे जी पाता है, समाज में अपनी बात रख पाता है या समाज में किसी ग़लत काम का भी विरोध कर पाता है। तो समाज में एक असली मर्द की तरह जीने के लिए भी क्या ज़रूरी है? शारीरिक बल, ऊँचा पैसा-पद, या दार्शनिक ज्ञान? कृपया बताएँ।

आचार्य: सबसे पहले चाहिए समझ। जब ये समझ जाते हो तुम कौन हो, ये दुनिया क्या है तो फिर ये भी जान जाते हो कि यहाँ तुम्हें करना क्या है। 'तुम्हें क्या करना है?' ये तुम तब तक नहीं समझ सकते, जबतक तुम्हें ये नहीं पता कि तुम चीज़ क्या हो।

'तुम क्या चीज़ हो? और कहाँ फँसे हुए हो?' जब ये समझ जाते हो न, तो फिर एकदम साफ़ हो जाता है, क्या करना है? फिर तुम कुछ भी इसीलिए नहीं कर रहे होते; किसी का दिल रखना है, कुछ भी इसीलिए नहीं कर रहे होते हो कि संस्कार है या सदाचार है या परम्परा है। फिर तुम वो इसीलिए कर रहे होते हो क्योंकि वो करना अनिवार्य है। सिर्फ़ वो करना ही पड़ेगा तुमको, वो करे बिना निस्तार ही नहीं है। और चूँकि वो करना ही करना है, तो फिर वो करने के लिए जो कुछ भी चाहिए उसका प्रबन्ध या जुगाड़ भी करना पड़ेगा न।

कोई चीज़ है जो मुझे करनी है, उसके लिए अब अगर मुझे पैसा चाहिए, तो मैं पैसा कमाऊँगा। देखो, पैसा कमाने के दो नज़रिये होते हैं, दो रास्ते होते हैं, दो अप्रोच (दृष्टिकोण) होती हैं। क्या?

एक तो ये कि पैसा कमाकर के मज़ा मारा जाता है, सब यही कर रहे हैं तो हम भी यही करेंगे—पैसा! पैसा! पैसा! पूछा ही नहीं कभी कि मैं कौन, पैसा चाहिए क्या, पैसे का करूँगा क्या; पैसा का जो भी मैं इस्तेमाल करूँगा, वो करके मुझे क्या मिलता है, ठीक-ठीक इमानदारी से ज़रा ये अपनेआप से पूछा जाना चाहिए न, आत्म-जिज्ञासा होती है; तो वो आत्म-जिज्ञासा हम करते नहीं।

हम क्या करते हैं, ‘वो बंटी भईया बहुत कमा रहे है, उनकी फ़लानी जगह वो मार्केटिंग (क्रय-विक्रय) में लग गये हैं सेल्स (बिक्री)। वो फ़लाना हमने सुना, वो बोल रहा था यूट्यूब पर कि जब तुम कमा लोगे तो तुम्हें इज़्ज़त बहुत मिलने लगेगी। तो चलो रे! हम भी कमाते हैं।‘ एक ये बात है कमाने की। ज़्यादातर लोग ऐसे ही कमाने निकल पड़ते हैं।

और दूसरा जो रास्ता है जो पैसे तक जाता है, उस रास्ते पर समझ की रोशनी पड़ रही होती है। वो रास्ता कहता है, ‘पैसा क्या चीज़ है? वो तो हम अच्छे से समझते हैं लेकिन अभी ये काम है जो करना ज़रूरी है, उस काम के लिए पैसा चाहिए, इसलिए कमा रहे हैं।‘

अब पैसा तुम्हारा संसाधन बनेगा, उपकरण बनेगा, रिसोर्स (सहारा), टूल (हथियार) बनेगा; अब पैसा तुम्हारा मालिक नहीं बनेगा। जो पहला तरीक़ा था पैसा कमाने का उसमें पैसा तुम्हारा क्या बन जाता है तुरन्त? मालिक बन जाता है। क्योंकि तुम अन्धे हो, तुम जानते ही नहीं तुम्हें पैसा चाहिए किसलिए? कोई पूछता है, ‘क्यों कमाना है?’ कह रहे हैं, ‘वो इज़्ज़त तभी मिलती है, जो पैसा कमा लेते हैं, तो इज़्ज़त मिल जाती है।‘

अभी कल या आज और सरकारी नौकरी क्यों चाहिए होती है? इस पर एक शॉर्ट (छोटा) वीडियो इन लोगों (स्वयंसेवियों) ने पब्लिश (प्रकाशित) करा है। तो उस पर कमेन्ट (टिपण्णी) आ रहे हैं, कुछ तो वही है जो गाली दे रहे हैं अपना। कई हैं जो मुझसे कह रहे हैं, 'अरे! तूने कभी एक तृतीय श्रेणी की भी सरकारी नौकरी की परीक्षा पास (उतीर्ण) करी होती, तो तुझे पता होता न कि सरकारी नौकरी कितनी मुश्किल से मिलती है।' चलो! ठीक है! (मुस्कुराते हैं)

और कुछ हैं जो आकर के ईमानदारी से लिख दे रहे है कि देखिए, साहब! शादी नहीं होती बिना सरकारी नौकरी के। वो भी अगर कम उम्र की कमसिन कली चाहिए हो, तब तो सरकारी नौकरी बहुत ही ज़रूरी है। तो एक तो ये तरीक़ा होता है कोई भी चीज़ पाने के लिए कि क्यों पाना है? कह रहे हैं, ‘अब देखिए, सरकारी नौकरी लगते-लगते ३०-३५ साल के हो जाते हैं। अब उस उम्र में अगर अपने पास कोई बढ़िया, दमदार चीज़ नहीं है, तो कोई अपनी बेटी देता नहीं है। बढ़िया, दमदार चीज़ यही है कि नौकरी लग जाए।‘

तुम्हें ज़िन्दगी में जो भी हासिल करना है इसीलिए हासिल करना है, इस तरीक़े से हासिल करना है, तो जो कुछ तुम हासिल कर रहे हो मैंने कहा, 'वो चीज़ तुम्हारे सिर पर चढ़कर रहेगी, तुम्हारा मालिक बनकर रहेगी, तुम्हारे कोई काम नहीं आने की है।' जैसे— गधे के ऊपर बहुत सारा सोना, सोने के बोरे डाल दिये गए हो। काहे के बोरे? सोने के, और गधा क्या कर रहा है उन बोरों को? लेकर फिर रहा है। ज़्यादातर लोग अपना पैसा ऐसे ही लेकर फिरते हैं।

ठीक है। जो बहुत अमीर होते हैं, उनके बोरों में नोटों के बन्डल होते हैं, जो ग़रीब होते हैं उनके बोरों में पाँच-पाँच, दस-दस रूपयें के सिक्के होते हैं। ग़रीबों वाला बोरा ज़्यादा भारी हो जाएगा। चलो! दोनों का बराबर भारी है। पर ज़्यादातर लोग पैसे से यही रिश्ता रखते हैं, वो उसको ढोते हैं बस।

भर्तृहरि हैं, आज से दो-तीन साल पहले, उनके ‘निर्वाण षट्कम्’ पर पूरा कोर्स हमने करा था, पहले श्रृंगार पर और फिर निर्वाण षट्कम् पर।

श्रोतागण: ‘वैराग्य षट्कम्।‘

आचार्य: क्या? ‘वैराग्य षट्कम्’। हाँ, तो ‘श्रृंगार षट्कम्’ और ‘वैराग्य षट्कम्’ २०१७ की बात होगी। तो एक बात थी उनकी एकदम ऐसी कि खट से तीर की तरह घुस जाए। बोले कि जिसको तुम भोग रहे हो, उसे तुम नहीं भोग रहे, वो तुम्हें भोग रहा है। ये बात उन्होंने खूब भोगने के बाद बोली। ‘श्रृंगार षट्कम्’ पढ़ोगे तो ऐसा लगेगा जैसे कि क़रीब-क़रीब इरोटिक (प्रेमकाव्य) हो।

बोल रहे हैं कि मोक्ष और कहाँ होता है? सुन्दर युवती की जंघाओं में होता है, और स्तनों में होता है। इस तरह की बातें चल रही हैं, कहाँ?

एक ही, एक ही व्यक्ति है: पहले राजा भर्तृहरि फिर ऋषि भर्तृहरि। तो यह सब बातें बोल रहे हैं। और फिर उन्हें ऐसा झटका लगा, ऐसा धोखा लगा, जिस रानी के लिए ये सब बातें बोल रहे थे, उसी रानी ने पटक के मारा। बड़ा ज़बरदस्त धोखा लगा होगा कि इतना रसिया आदमी राजमहल छोड़कर के सीधे हिमालय पहुँच गया। फिर वहाँ पर उन्होंने बोला कि एक चीज़ सीख ली मैंने कि मुझे लगता था कि मैं किसी को भोग रहा हूँ; या किसी चीज़ को भोग रहा हूँ पर जो कुछ मैं भोग रहा था, मैं उसे नहीं भोग रहा था; वो मुझे भोग रहा था।

पैसे के साथ, सम्मान के साथ, रुतबे के साथ हम में से ज़्यादातर लोगों का यही रिश्ता होता है। आ रही है बात समझ में? और दूसरा भी एक रिश्ता होता है कि मदन मोहन मालवीय देशभर में निकले थे, अनुदान इक्कट्ठा करते हुए, डोनेशन (अनुदान) काहे के लिए? हाँ, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय खड़ा करना था। उस पैसे ने उन्हें कोई क्षति नहीं पहुँचायी, उस पैसे ने उन्हें वश में नहीं कर लिया, वो पैसा एक शिक्षा का, विद्या का मन्दिर खड़ा करने के काम आया।

समझ लो कि क्या करना ज़रूरी है? समझ लो कि इस दुनिया में कौनसी चीज़ को किसलिए स्पर्श कर रहे हो? फिर जिस भी चीज़ को स्पर्श करोगे तुम्हें डसेगी नहीं; नहीं तो ये दुनिया नाग है।

हमारे साहब बोलते हैं, “या जग काली कूतरी, जे छेड़ै ते खाए।“ ये जग क्या है? काली कुतिया है। जो इसको छेड़ने जाएगा उसी को खा लेगी। मैं कह रहा हूँ, 'काली नागिन।' सबकुछ पूरी दुनिया में जो कुछ है काली नागिन सामान है छेड़ोगे तुम्हें डस लेगा। तुम बिलकुल अनुरक्त हो करके, वशीभूत होकर के, मेज़्मराइज़ (सम्मोहित) होकर के उसकी ओर बढ़ोगे—'आ काली नागिन सी ज़ुल्फें तेरी काली काली', वो जुल्फें हैं ही नहीं, वो नागिन ही है (हाथ से फन बनाकर डसने का इशारा करते है।)

लेकिन यही प्रकृति, यही दुनिया, यही पुरुष और यही स्त्रियाँ, तुम्हारे लिए बहुत सुन्दर संसाधन बन जाएँगे, मैं संसाधन भी क्या बोलूँ— ये अमृत सामान हो जाएँगे तुम्हारे लिए, तुम्हें लेकर होश हो तो। तुम अगर जानते हो साफ़-साफ़ तुम किसी से क्यों बात कर रहे हो? नहीं तो पैसे को छुओगे; पैसा तुम्हें खा जाएगा, आदमी को छुओगे; आदमी तुम्हें खा जाएगा, औरत को छुओगे; औरत तुम्हें खा जाएगी, घर बनवाओगे वो घर तुम्हारी क़ब्र बन जाएगा, महल बनवाओगे; महल तुम्हारा मक़बरा बन जाएगा।

पर अगर समझते हो, जानते हो, तो दो बातें होगी: पहली बात मैंने कहा, 'जो कुछ भी तुम छू रहे हो, वो तुम्हें डसेगा नहीं।' और दूसरी बात, 'जो कुछ भी तुम छू रहे हो, उसका इस्तेमाल करके तुम ऊँचे-ऊँचे और ऊँचे बढ़ते जाओगे।'

समझ रहे है?

जो कुछ भी छू रहे हो, वो तुम्हें और ऊँचा पहुँचाएगा, वो तुम्हें लपेट नहीं लेगा, वो तुम्हें अजगर की तरह तुम्हें जकड़ नहीं लेगा। वो तुम्हारे लिए रास्ता बन जाएगा कि आओ मेरे ऊपर से होकर के गुज़र जाओ, आगे बढ़ जाओ, आगे बढ़ जाओ और “चरैवेति- चरैवेति,” उर्ध्गमन है, आगे बढ़ना है, ऊपर बढ़ना है, अटक नहीं जाना है।

जो कुछ भी मिले वो इसीलिए है ताकि वो तुम्हें आगे की राह बताये, उसपर रुकना नहीं है, थमना नहीं है।

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