प्रश्नकर्ता: ऐसा देखा गया है कि जो व्यक्ति धनी है, सफ़ल है, बलशाली है सिर्फ़ वही बिना डरे जी पाता है, समाज में अपनी बात रख पाता है या समाज में किसी ग़लत काम का भी विरोध कर पाता है। तो समाज में एक असली मर्द की तरह जीने के लिए भी क्या ज़रूरी है? शारीरिक बल, ऊँचा पैसा-पद, या दार्शनिक ज्ञान? कृपया बताएँ।
आचार्य: सबसे पहले चाहिए समझ। जब ये समझ जाते हो तुम कौन हो, ये दुनिया क्या है तो फिर ये भी जान जाते हो कि यहाँ तुम्हें करना क्या है। 'तुम्हें क्या करना है?' ये तुम तब तक नहीं समझ सकते, जबतक तुम्हें ये नहीं पता कि तुम चीज़ क्या हो।
'तुम क्या चीज़ हो? और कहाँ फँसे हुए हो?' जब ये समझ जाते हो न, तो फिर एकदम साफ़ हो जाता है, क्या करना है? फिर तुम कुछ भी इसीलिए नहीं कर रहे होते; किसी का दिल रखना है, कुछ भी इसीलिए नहीं कर रहे होते हो कि संस्कार है या सदाचार है या परम्परा है। फिर तुम वो इसीलिए कर रहे होते हो क्योंकि वो करना अनिवार्य है। सिर्फ़ वो करना ही पड़ेगा तुमको, वो करे बिना निस्तार ही नहीं है। और चूँकि वो करना ही करना है, तो फिर वो करने के लिए जो कुछ भी चाहिए उसका प्रबन्ध या जुगाड़ भी करना पड़ेगा न।
कोई चीज़ है जो मुझे करनी है, उसके लिए अब अगर मुझे पैसा चाहिए, तो मैं पैसा कमाऊँगा। देखो, पैसा कमाने के दो नज़रिये होते हैं, दो रास्ते होते हैं, दो अप्रोच (दृष्टिकोण) होती हैं। क्या?
एक तो ये कि पैसा कमाकर के मज़ा मारा जाता है, सब यही कर रहे हैं तो हम भी यही करेंगे—पैसा! पैसा! पैसा! पूछा ही नहीं कभी कि मैं कौन, पैसा चाहिए क्या, पैसे का करूँगा क्या; पैसा का जो भी मैं इस्तेमाल करूँगा, वो करके मुझे क्या मिलता है, ठीक-ठीक इमानदारी से ज़रा ये अपनेआप से पूछा जाना चाहिए न, आत्म-जिज्ञासा होती है; तो वो आत्म-जिज्ञासा हम करते नहीं।







