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नौकरी ना करें तो क्या करें? || आचार्य प्रशांत
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: क्या होता है जब कोई कम्पनी किसी पद के लिए कुछ लोगों को नौकरी पर रखना चाहती है? क्या वो जाती है और ज़बरदस्ती लोगों को लेकर आती है? ये लोग जो हर शाम, हर रात, अपने दफ़्तरों से अपने घर जाते हैं, अगली सुबह क्या ये ज़ंजीरों से बाँधकर दफ़्तर लाये जाते हैं? ये स्वेच्छा से ही तो आ रहे हैं। स्वेच्छा से ही ये गये थे नौकरी माँगने, उन्होंने देखा कि विज्ञापन है, उन्होंने देखा कि जगह खाली है और ये ख़ुद पहुँच गये शर्ट-पैंट-टाई पहनकर कि हमें नौकरी दे दो।

तुम मालिक को क्यों पापी बोल रहे हो? तुम नौकरी देने वाले को क्यों पापी बोल रहे हो? उसने तुम्हें रस्सी से नहीं बाँधा, वो तुमसे बेगार नहीं करवा रहा और रोज़ सुबह वो तुम्हें तमंचे के बल पर काम पर नहीं ला रहा! तुम्हारी भूख, तुम्हारी लिप्सा, तुम्हारा डर, तुम्हारा लालच तुम्हें खींचकर लाता है, असली पापी वो है।

जब तुम सहमत होते हो कि नौकरी करोगे तब अनुबन्ध या क़रार तुमने नौकरी दाता के साथ नहीं किया है, अनुबन्ध किया है तुमने अपने झूठ के साथ, अपने अहंकार के साथ, अपनी भूख के साथ। ये बात साफ़ समझ लो, जब तक वो भूख क़ायम रहेगी, ग़ुलामी क़ायम रहेगी। जब तक तुम्हारे भीतर हीनता का एहसास क़ायम रहेगा तब तक तुम किसी-न-किसी के ग़ुलाम बने रहोगे। हाँ, किसके ग़ुलाम हो ये बात बदल सकती है।

आज तुम किसी ऐसे के ग़ुलाम हो जो तुम्हारा अन्नदाता है, कल तुम किसी ऐसे के ग़ुलाम हो सकते हो जिससे तुमको मद मिलता हो, परसों किसी ऐसे के ग़ुलाम हो सकते हो जिससे तुम्हें कोई आकर्षण हो गया हो, फिर हो सकता है कि कोई ज्ञान-दाता हो, तुम उसके ग़ुलाम बन जाओ। पर भीतर जब तक भिखारी बैठा हुआ है तब तक कोई-न-कोई दाता तो तुम्हारे सिर पर चढ़ा ही रहेगा, कभी धन-दाता, कभी आश्रय-दाता, कभी प्रेम-दाता — झूठा प्रेम, वास्तविक नहीं — कभी सम्बल दाता।

नौकरी को मत छोड़ो, उसको छोड़ो जो नौकरी की तरफ़ भागा था। उसके बाद नौकरी शेष रहनी हो तो रहे और जाती हो तो जाए। उसको छोड़ो जो एक नौकरी में होते हुए दूसरी नौकरी का विज्ञापन देखता है और पाता है कि दस प्रतिशत तनख़्वाह ज़्यादा मिलेगी वहाँ तो लार टपकाने लगता है।

जब तुम किसी नौकरी में घुसते हो, तो बड़ा सीमित प्रयोजन होता है तुम्हारा कि तुम्हारे हितों की, झूठे हितों की पूर्ति होती रहे। तुम ये थोड़े ही देखते हो कि तुम किसके लिए काम कर रहे हो। ये थोड़े ही देखते हो कि तुम जिसके लिए दिन-रात एक कर रहे हो, खून-पसीना एक कर रहे हो वो कौन है और वो तुम्हारे श्रम का और तुम्हारे द्वारा उत्पादित पैसे का क्या कर रहा है। तुमने कभी जानना चाहा है कि जो महानुभाव तुम्हारी कम्पनी के ऊँचे-से-ऊँचे शिखरों पर बैठे हैं, बोर्ड में हैं, शेयर-होल्डर इत्यादि हैं, वो कौन हैं? तुम उन्हीं के लिए तो काम कर रहे हो।

तुमने कहा कॉर्पोरेट में काम कर रहे हो। कॉर्पोरेट का प्रथम सिद्धान्त है कि कम्पनी का वजूद होता है शेयर-होल्डर्स के लिए। तो तुम नौकर अगर हो तो कम्पनी के नहीं हो वास्तव में, तुम शेयर-होल्डर के नौकर हो, एक तरीक़े से उसके व्यक्तिगत नौकर हो। और किसी का नौकर भी हो जाना कोई बुरी बात नहीं है अगर मालिक उच्च कोटि का हो। मालिक में योग्यता हो तो हँसते-हँसते सिर झुका दो और नौकर हो जाओ। तुमने कभी जानना चाहा तुम्हारे मालिकों में कितनी योग्यता है?

कोई तुम्हें महीने का अगर एक लाख देता है, तो तुमसे पाँच-लाख, दस-लाख उगाहता भी है। जब उतना उसे कमाकर देते हो तो एक लाख वो तुम्हें देता है। तुमने कभी जानना चाहा कि जो पैसा तुम उसे कमाकर दे रहे हो वो उसका करता क्या है? क्योंकि वो जो कुछ भी करता है उस पैसे का उससे पूरे संसार पर फ़र्क पड़ता है। उस पैसे का कमाया जाना और उस पैसे का खर्च होना किसी का व्यक्तिगत मामला नहीं है।

तुम जिनके हाथ में पैसा दे रहे हो वो तुम्हारे उन पैसों से अपनी बीवियों को लन्दन में ख़रीददारी करवाते हैं, तो तुम कर क्या रहे हो? तुम जिनको पैसा कमा-कमाकर दे रहे हो वो अगर तुम्हारे पैसे से प्राइवेट जेट ख़रीदते हैं, आलिशान बंगले बनवाते हैं, तुम क्या कर रहे हो? तुम अपना ये एकमात्र जन्म इसलिए गवाँ रहे हो ताकि किसी की मोटी बीवी जाकर लन्दन में गहने और साड़ियाँ और जो कुछ भी है, ख़रीद सके। कोई तुमसे पूछे कि तुम्हारे जन्म की सार्थकता क्या रही, तो तुम कहोगे, ‘मैं दिन के बारह घंटे काम करता हूँ, ताकि कोई अपने परिवार को हज़ार तरीक़े की अय्याशियाँ करा सकें।’

तुम्हें लाज नहीं आती? तुम इसलिए पैदा हुए थे? किसी मोटे पूँजीपति की मोटी बीवी को शॉर्ट-स्कर्ट पहनाने के लिए जन्म हुआ था तुम्हारा? जितनी भद्दी वो दिखती है उन शॉर्ट-स्कर्ट में, उतना भद्दा तुम्हारा जीवन है। और पूँजीपतियों की जो बीवियाँ होती हैं, वो आमतौर पर बड़ी मोटी और भद्दी ही होती हैं। हाँ, बीवियों के अलावा उनकी जो अन्य सहेलियाँ होती हैं, वो ज़रूर छरहरी और आकर्षक होती हैं। तुम दिन-रात इसलिए खट रहे हो ताकि कोई शेयर-होल्डर तुम्हारी कमाई से पाँच सहेलियाँ पाल सके? वो तुम्हारा अन्न-दाता है, तुम उसके सखी-दाता हो। ‘मैं कमा-कमाकर दूँगा ताकि तू रंगरेलियाँ मना सके।’

और तुम्हारे द्वारा किये गए श्रम से बहुत अनर्थ हो रहा है, वैश्विक तल पर अनर्थ हो रहा है। आज दुनिया के सामने हज़ार तरह के संकट हैं। संकटों में संकट है ये जो दुनिया का तापमान बढ़ रहा है। ये तापमान कौन बढ़ा रहा है? क्या ग़रीब लोग बढ़ा रहे हैं? ये तापमान बढ़ाने वाले दुनिया के एक प्रतिशत लोग हैं।

ग्लोबल वार्मिंग , वैश्विक तापन का कारण दुनिया के एक प्रतिशत लोग हैं। पिच्चानवे प्रतिशत जो कार्बन उत्सर्जित हो रहा है वो दुनिया के एक प्रतिशत लोगों द्वारा हो रहा है। समझो बात को, पिच्चानवे परसेंट जो कार्बन एमिशन्स (कार्बन उत्सर्जन) है वो दुनिया के एक प्रतिशत लोगों द्वारा हो रहे हैं, और वो एक प्रतिशत लोग कौन हैं? वो वही हैं जिनके लिए तुम अपनी जवानी बर्बाद कर रहे हो। और वो तुम्हारे ग्रह को नर्क बना रहे हैं, ग्रह को भी और गृह को भी; पृथ्वी को भी और तुम्हारे घर को भी। और तुम काम करे जा रहे हो।

मज़ेदार बात ये है कि अधिकांश लोग वास्तव में जिनके लिए काम करते हैं उनकी उन्होंने शक्ल भी नहीं देखी होती है। क्योंकि वो बहुत दूर बैठे होते हैं, बहुत ऊँचे। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा तुम किसके लिए काम कर गये। तुम बहुत निचले पायदान पर काम करते हो। वो ऊँचे लोग कभी-कभार कम्पनी के सारे बारह हज़ार कर्मचारियों को नये साल इत्यादि पर एक मेल भेज देते हैं और तुम उनकी शक्ल उस मेल में देख लेते हो और खुश हो जाते हो। कि मैं भारत में काम कर रहा था और अमेरिका से, हेड क्वार्टर्स से मुझे भी ई-मेल आयी।

या कि जब बहुत बड़ा ले ऑफ़ होना होता है, जब बहुत सारे कर्चारियों की छटनी होनी होती है, तब आती है ई-मेल, जो बताती है कि देखो, हम कितने संकट के दौर से गुज़र रहे हैं। और संकट का दौर क्या है? संकट का दौर ये है कि पूरा एक देश ख़रीदना था अमेरिका में बैठे उस धन-पशु को, वो ख़रीद नहीं पाया। बीवी कह रही थी कि पूरा एक शहर ख़रीदकर दो, वो ख़रीद नहीं पाया, बड़ा संकट आ गया है। कम्पनी इतना पैदा ही नहीं कर पायी कि उसकी सारी लालसाएँ और भोग-विलास पूरे हो सकें, बड़ा संकट आ गया।

तो फिर वो लिखकर भेजेगा कि अब आर्गेनाईज़ेशनल रिस्ट्रक्चरिंग (संस्थागत पुनर्संरचना) होगी। वो ये बताएगा भी नहीं सीधे से कि तुम्हें लात मारी जा रही है। वो बड़े चिकने-चुपड़े और संयमित शब्दों में तुम्हारा काम तमाम कर देगा। ऐसों के द्वार के कुत्ते क्यों बने हुए हो? क्योंकि पापी तुम्हारे भीतर बैठा है, तुम लालची हो। वो टुकड़ा डालते हैं तुम्हारे सामने और तुम लालच में दुम हिलाना शुरू कर देते हो। और बहुत बड़ा टुकड़ा भी नहीं डालना पड़ता, ऐसे भूखे कुत्ते हैं।

किसी को बता दो कि आठ फ़ीसदी इज़ाफ़ा हो गया है तनख़्वाह में, वो नाचना शुरू कर देता है। किसी को पाँच प्रतिशत बोनस दे दो, वो पगला जाता है। बस इतनी सी ही रोटी डालनी पड़ती है। लालच न होता अगर आम आदमी में तो उसका शोषण क्यों होता? और इस सिद्धान्त को दिल से लगा लो।

कभी भी पाओ कि तुम्हारा शोषण हो रहा है तो उसकी वजह सिर्फ़ और सिर्फ़ लालच और डर होगी।

जिस कुत्ते की हम बात कर रहे हैं उस कुत्ते के गले में जो पट्टा है उसका नाम है लालच। नहीं तो कुत्ता भी आज़ाद रहने के लिए ही पैदा होता है। लालच है कि हज़ार तरह की ठोकरें खाने के लिए, बे-ग़ैरत होने के लिए, निर्लज्ज होने के लिए मजबूर कर देता है। वो लालच कोई भी हो सकता है — पैसे का लालच तो है ही, सुरक्षा का लालच, देह का लालच, काम-वासना, दूसरों की नज़र में अच्छा बने रहने का लालच, ज़िम्मेदार कहलाने का लालच। और लालच का ही दूसरा नाम डर भी है। एक-से-एक लोग होते हैं, पूछो, ‘क्यों फँसे हुए हो, क्या कर रहे हो?’ तो कहेंगे, ‘ज़िम्मेदारियाँ पूरी कर रहे हैं।’

कर्म का सिर्फ़ एक उचित आधार हो सकता है, वो है सत्यनिष्ठा। उसके अलावा तुम जिस भी वजह से काम कर रहे हो, तुम्हारा काम ग़लत है, मत करो! ऊँचे-ऊँचे शब्दों के पीछे मत छिपो। मत कहो कि मैं ज़िम्मेदारी पूरी करने के लिए काम करता हूँ, कि मैं प्रेम के लिए काम करता हूँ।

एक से पूछा मैंने कि तुम ये काम क्यों करते हो? कहा, ‘देखिए, केमिकल इंजीनियरिंग की डिग्री है मेरे पास। चार साल मैंने वहाँ लगाये थे। तो वो चार साल व्यर्थ कैसे जाने दूँ? तो मैं जीवन भर केमिकल इंडस्ट्री में ही काम करूँगा।’ ये तर्क है! किसको बेवकूफ़ बना रहे हो? तुम कह रहे हो दूसरी भूल इसलिए करनी है क्योंकि पहली कर दी। तुम कह रहे हो एक झूठ जिया है तो अब उसके कारण सौ और झूठ जीने हैं। ये क्या तर्क है!

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