आचार्य प्रशांत: क्या होता है जब कोई कम्पनी किसी पद के लिए कुछ लोगों को नौकरी पर रखना चाहती है? क्या वो जाती है और ज़बरदस्ती लोगों को लेकर आती है? ये लोग जो हर शाम, हर रात, अपने दफ़्तरों से अपने घर जाते हैं, अगली सुबह क्या ये ज़ंजीरों से बाँधकर दफ़्तर लाये जाते हैं? ये स्वेच्छा से ही तो आ रहे हैं। स्वेच्छा से ही ये गये थे नौकरी माँगने, उन्होंने देखा कि विज्ञापन है, उन्होंने देखा कि जगह खाली है और ये ख़ुद पहुँच गये शर्ट-पैंट-टाई पहनकर कि हमें नौकरी दे दो।
तुम मालिक को क्यों पापी बोल रहे हो? तुम नौकरी देने वाले को क्यों पापी बोल रहे हो? उसने तुम्हें रस्सी से नहीं बाँधा, वो तुमसे बेगार नहीं करवा रहा और रोज़ सुबह वो तुम्हें तमंचे के बल पर काम पर नहीं ला रहा! तुम्हारी भूख, तुम्हारी लिप्सा, तुम्हारा डर, तुम्हारा लालच तुम्हें खींचकर लाता है, असली पापी वो है।
जब तुम सहमत होते हो कि नौकरी करोगे तब अनुबन्ध या क़रार तुमने नौकरी दाता के साथ नहीं किया है, अनुबन्ध किया है तुमने अपने झूठ के साथ, अपने अहंकार के साथ, अपनी भूख के साथ। ये बात साफ़ समझ लो, जब तक वो भूख क़ायम रहेगी, ग़ुलामी क़ायम रहेगी। जब तक तुम्हारे भीतर हीनता का एहसास क़ायम रहेगा तब तक तुम किसी-न-किसी के ग़ुलाम बने रहोगे। हाँ, किसके ग़ुलाम हो ये बात बदल सकती है।
आज तुम किसी ऐसे के ग़ुलाम हो जो तुम्हारा अन्नदाता है, कल तुम किसी ऐसे के ग़ुलाम हो सकते हो जिससे तुमको मद मिलता हो, परसों किसी ऐसे के ग़ुलाम हो सकते हो जिससे तुम्हें कोई आकर्षण हो गया हो, फिर हो सकता है कि कोई ज्ञान-दाता हो, तुम उसके ग़ुलाम बन जाओ। पर भीतर जब तक भिखारी बैठा हुआ है तब तक कोई-न-कोई दाता तो तुम्हारे सिर पर चढ़ा ही रहेगा, कभी धन-दाता, कभी आश्रय-दाता, कभी प्रेम-दाता — झूठा प्रेम, वास्तविक नहीं — कभी सम्बल दाता।
नौकरी को मत छोड़ो, उसको छोड़ो जो नौकरी की तरफ़ भागा था। उसके बाद नौकरी शेष रहनी हो तो रहे और जाती हो तो जाए। उसको छोड़ो जो एक नौकरी में होते हुए दूसरी नौकरी का विज्ञापन देखता है और पाता है कि दस प्रतिशत तनख़्वाह ज़्यादा मिलेगी वहाँ तो लार टपकाने लगता है।




