श्रोता १: वास्तविक में कुछ नया नहीं है। लेकिन हम उसे नया बनाना चाह रहें हैं। जैसे कि मैं आज आया हूँ यहाँ पर, वैसे काफ़ी समय बाद आया हूँ। और कहीं-न-कहीं मैं ये चाह रहा था कि आज मैं जाऊँ। क्योंकि आज न्यू ईयर वाला है दिन और मैं चाहता हूँ मेरा ये साल काफ़ी अच्छे से जाए और जो भी मेरी समस्याएँ हैं वो सब कम हों। तो इसीलिए मैं इस आशा के साथ में यहाँ पर आया हुआ हूँ।
लेकिन जब यहाँ पर मैंने, सर ने जैसे कि अभी यहाँ पर एक्ट किया है, तो उसमें ये बताया गया है कि हम अपनी आदतों से बड़ी हैबिचुअल हैं। जैसे हम मतलब चाहते हैं कि ऐसा हो और फिर हम उस चीज़ के लिए काम करना भी शुरू करते हैं। जैसे कि आपकी जो बुक है ‘आचार्य प्रशांत विथ स्टूडेंट्स’ उसमें ये है कि मैं कुछ पाना चाहता हूँ लेकिन मैं कैसे जानूँ अगर मैं कुछ भी चीज़ पाना चाहता हूँ। तो वो धीरे-धीरे ग़ायब होने लगती है जब मैं उसके पास जाता हूँ।
श्रोता २: जब ये प्रसन्न भी हैं कुछ ऐसा सा लगता है जैसे एक और मौक़ा आ गया है अपने बिजनेस को फैलाने का और और संपर्कों को बनाए रखने का। जिनको हम जानते हैं और काफ़ी दिनों से नहीं भी मिल पाये, कभी ख़ोज-ख़ोजकर के उनको वाट्सएप करना और जिनका आया है सबको रिप्लाई करना। रिप्लाई नहीं किया तो कहीं ऐसा न हो कि जो हमारी बात चल रही है वो इस वजह से ख़राब हो जाए कि हमने हैप्पी न्यू इयर नहीं मनाया। वो एक तरीक़े से वही मेंटेन करना है, जो अपना ऱोज का चल रहा है बिजनेस।
आचार्य प्रशांत: कहिए, बोलिए। बोलते रहिए।
श्रोता ३: ये एक ऐसे दिन की तरह आ जाता है! कभी-कभी जब लगता है कि आप बहुत कुछ चीज़ों को जिनको बिखेर चुके थे। और एक अजीब सी धारा में बह जा रहे थे। और उन चीज़ों को समेटने के लिए रुक नहीं रहे थे। तो ऐसा लगने लगता है कि चलिए अच्छा! आज से हम इन सब बिखरी हुई चीज़ों को किनारे करके, समेट करके चलो! आज से फिर से सम्भलकर के शुरू करते हैं। तो ये उस तरह के




