प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। परिवार से ये फिर आता है कि हमने जो तुम पर इतने सारे पैसे इंवेस्ट (निवेश) किये, उसका क्या मतलब? अब वो तुम इंट्रेस्ट (ब्याज) के साथ इतने महीने में वापस करो। सीधे ऐसे ही बोल दिया जाता है, इस चीज़ को कि मतलब अगर…
आचार्य प्रशांत: नहीं, जब इस तरह व्यापार की भाषा में बात हो रही है, तो व्यापार तो कॉन्ट्रैक्ट्स (अनुबन्धों) पर चलता है। आप कहिए— कॉन्ट्रैक्ट (अनुबन्ध) दिखाओ। (श्रोतागण हँसते हैं)
भाई, प्रेम में किसी तरह का कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं होता न? प्रेम में तो आपने कहीं कोई लिखित करार करा नहीं होता है और फिर प्रेम में वसूली की भाषा में बात भी नहीं की जाती कि हमने तुम पर इतना लगाया है, लौटाओ। जैसे ही कोई वसूली की भाषा में बात करने लगे, तो अब प्यार नहीं व्यापार है। और अगर व्यापार है तो, ‘साहब, एग्रीमेंट (सहमति पत्र) दिखाइए और हमारे दिखाइए, उसमें साइन (हस्ताक्षर) कहाँ है? हमने कब सहमति दी थी कि तुम हममें इतना लगाओगे और फिर इतना माँगोगे?’
और अगर प्यार के नाते लगाया था, तो वापस माँगो मत। क्योंकि प्यार में इस तरह की माँगे तो करी नहीं जातीं। ‘हमें भी आपसे प्यार है, पिताजी। जब हमारे पास होगा और जितना होगा और जब हमें आवश्यकता समझ में आएगी, हम आपकी जितनी सेवा हो सकेगी करेंगे। लेकिन प्यार के नाते करेंगे। अभी आप वसूली की भाषा में बात कर रहे हो। वसूली की भाषा में तो दिखाइए, लीगल कान्ट्रैक्ट (वैध अनुबन्ध) दिखाइए। हमने कब अपनी सहमति दी थी कि आप हमारे ऊपर इतना लगाओगे, बचपन से आज तक और हम उसको इतने ब्याज के साथ ऐसे लौटाएँगे? दिखाइए, कहाँ है?’
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