प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, कई मानसिक झंझटों से छूटने और पाँच वर्षों से चल रही रिलेशनशिप (सम्बन्ध) के टूटने के बाद मैंनें अपनी ग्यारह वर्षीय पुरानी सरकारी सेवा से त्यागपत्र इसी वर्ष मई में दे दिया। मैंने अपने जुनून को — जो कि पढ़ाना है — समय देना अधिक उचित समझा। अब रोज़गार के अवसरों तथा सच्चे रिश्तों की तलाश में भटक रहा हूँ, कृपया मार्गदर्शन कीजिए?
आचार्य प्रशांत: देखिए, कुछ बातें समझनी होंगी। जीवन में रिश्तों का महत्व क्या है? अभी आपने एक अपने सम्बन्ध विच्छेद की, ब्रेकअप की बात करी और फिर आपने कहा कि अब आप उस रिश्ते को भी छोड़कर और नौकरी भी छोड़कर नये रिश्ते और नयी नौकरी के लिए भटक रहे हैं।
रिश्तों की ज़रूरत क्या है? रिश्ते क्या होते हैं? एक रिश्ता तोड़ा है, अगले रिश्ते की तलाश में हैं, एक नौकरी छोड़ी है, अगली नौकरी की तलाश में हैं। ये रिश्ते चीज़ क्या हैं? सम्बन्धित होना माने क्या? हम सम्बन्धित होते हैं, क्योंकि हम परेशान हैं। हम सम्बन्धित होते हैं, क्योंकि कहीं कुछ कमी रहती है। कुछ अकेलापन, कुछ सूनापन, कोई अपूर्णता हो तो हम सम्बन्ध बनाते हैं।
कई बार वो अकेलापन बिलकुल प्रकट होता है, तो आप साफ़-साफ़ कह देते हैं कि बड़ा लोनली (अकेला) हूँ कोई साथी चाहिए, यही शब्द रहते हैं न? बड़ा प्रकट रहता है। और कई बार रिश्ता बनाने के पीछे जो मंशा है, नीयत है, प्रेरणा है वो इतनी प्रकट नहीं रहती, लेकिन रहती वो यही है।
अवचेतन रूप से रिश्ता बनता ही इसीलिए है, क्योंकि आदमी में कुछ अधूरा है, तो वो पूरेपन के लिए आगे बढ़ता है। जो पूरापन व्यक्ति एक रिश्ते में तलाशता है वो उसे रिश्ते में मिलता नहीं, तो इसीलिए रिश्ते हमारे या तो टूटते हैं या फिर बने भी रहते हैं तो मुर्दा होकर। जिसको रोपा था अपने आँगन में कि सुन्दर वृक्ष बनेगा और खुशबू देगा, वो मर गया।




